संदर्भ:
हालिया संघर्षों जैसे कि रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष, हौथिस द्वारा लाल सागर में किए गए हमलों और अमेरिका-इरान संघर्ष ने युद्ध में ड्रोन की बढ़ती भूमिका को प्रदर्शित किया है।
- कम लागत वाली मानव रहित प्रणालियाँ टैंकों, लड़ाकू विमानों और बड़े पैमाने पर पारंपरिक बलों पर आधारित पारंपरिक सैन्य सिद्धांतों को तेजी से चुनौती दे रही हैं।
ड्रोन क्रांति क्या है?
ड्रोन क्रांति का तात्पर्य मानव रहित प्रणालियों (Unmanned Systems), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वायत्त प्रौद्योगिकियों और नेटवर्क वाले निगरानी तंत्र के व्यापक उपयोग के माध्यम से युद्ध परिदृश्य में आए परिवर्तनों से है।
- पारंपरिक सैन्य शक्ति इस पर निर्भर थी:
- लड़ाकू विमान
- टैंक
- युद्धपोत
- बैलिस्टिक मिसाइल
- आधुनिक युद्ध तेजी से इस पर निर्भर हो रहा है:
- ड्रोन
- एआई-सक्षम लक्ष्यीकरण
- स्वार्म सिस्टम
- वास्तविक समय की निगरानी
विकासक्रम : UAV से UAS तक
- UAV (Unmanned Aerial Vehicle- मानव रहित हवाई वाहन): यूएवी (UAV) एक ऐसा ड्रोन है, जो बिना किसी ऑनबोर्ड मानव पायलट के काम करता है, जिसके प्रमुख उदाहरण – हेरॉन (Heron), प्रीडेटर (Predator) और MQ-9 रीपर (Reaper) हैं।
- UAS (Unmanned Aerial System – मानव रहित हवाई प्रणाली): यूएएस (UAS) में संपूर्ण परिचालन पारितंत्र शामिल होता है, जिसमें ड्रोन प्लेटफॉर्म, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन, संचार नेटवर्क, सेंसर और डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम शामिल हैं। यह एकल (standalone) ड्रोन से एकीकृत मानव रहित क्षमताओं की ओर आए बदलाव को दर्शाता है।
सैन्य ड्रोन के प्रमुख कार्य:
- ISR (इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रीकॉनिसेंस – खुफिया जानकारी, निगरानी और टोह): सैन्य ड्रोन युद्धक्षेत्र की खुफिया जानकारी जुटाकर, दुश्मन की गतिविधियों तथा सीमा पर निगरानी रखकर ISR कार्यों को पूर्ण करते हैं, जिससे सैन्य अभियानों के लिए वास्तविक समय की स्थितिजन्य जागरूकता प्राप्त होती है।
- लक्ष्य अधिग्रहण और सटीक हमले: ड्रोन लक्ष्य की पहचान और सटीक हमलों के माध्यम से सैन्य प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं, जिससे संपार्श्विक क्षति कम होती है और परिचालन सटीकता तथा दक्षता में सुधार होता है।
- रसद सहायता: ड्रोन दूरदराज या दुर्गम क्षेत्रों में आपूर्ति पहुंचाने, चिकित्सा सहायता प्रदान करने और आपातकालीन परिवहन के माध्यम से रसद संचालन को सुगम बनाते हैं।
- आपदा प्रबंधन: ड्रोन आपातकालीन स्थितियों के दौरान खोज और बचाव कार्यों, क्षति के आकलन और राहत सहायता के वितरण में मदद करके आपदा प्रबंधन का समर्थन करते हैं।
सैन्य ड्रोन के प्रकार
- निगरानी ड्रोन (Surveillance Drones): निगरानी ड्रोन, जैसे कि हेरॉन यूएवी (Heron UAV), मुख्य रूप से निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और टोही मिशनों के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- लड़ाकू ड्रोन (Combat Drones): लड़ाकू ड्रोन, जैसे कि MQ-9 रीपर (MQ-9 Reaper), निर्दिष्ट लक्ष्यों के खिलाफ हथियार ले जाने और उन्हें तैनात करने की क्षमता रखते हैं।
- लोइटरिंग म्यूनिशन्स (कामीकाजे ड्रोन): लोइटरिंग म्यूनिशन्स (Loitering munitions) किसी लक्षित क्षेत्र के ऊपर मंडरा सकते हैं और उपयुक्त लक्ष्य की पहचान होने पर हमला कर सकते हैं। यह एक ही प्लेटफॉर्म के भीतर निगरानी और आक्रामक क्षमताओं को प्रभावी ढंग से जोड़ता है।
- FPV (फर्स्ट पर्सन व्यू) ड्रोन: लाइव वीडियो फीड के माध्यम से नियंत्रित होने वाले एफपीवी (FPV) ड्रोन अत्यधिक सटीक लक्ष्यीकरण प्रदान करते हैं और इन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संघर्षों में प्रमुखता हासिल की है।
ड्रोन क्रांति के स्तंभ
- लागत प्रभावशीलता : लड़ाकू विमानों और टैंकों जैसे महंगे पारंपरिक उपकरणों की तुलना में, ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत वाली सैन्य क्षमताएँ प्रदान करते हैं। ये निर्माण और प्रतिस्थापन में आसान होने के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण असममित लाभ प्रदान करते हैं।
- युद्ध का लोकतांत्रीकरण: सस्ती ड्रोन प्रौद्योगिकियों के प्रसार ने युद्ध का लोकतांत्रीकरण कर दिया है, जिससे छोटे देश और गैर-राज्य अभिकर्ता भी सैन्य रूप से श्रेष्ठ विरोधियों को चुनौती देने में सक्षम हो गए हैं, जैसा कि हौथिस द्वारा ड्रोन के उपयोग से सिद्ध हुआ है।
- निरंतर निगरानी: ड्रोन द्वारा युद्धक्षेत्र की निरंतर निगरानी करने की क्षमता ने सैन्य परिसंपत्तियों को छिपाने की संभावना को कम कर दिया है, और युद्ध को लगभग 24×7 निगरानी परिदृश्य में बदल दिया है।
उभरती हुई प्रवृत्तियाँ
- एआई-सक्षम ड्रोन (AI-Enabled Drones): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में प्रगति ड्रोन को स्वायत्त नेविगेशन, स्वचालित लक्ष्य पहचान और निर्णय-सहायता कार्यों को करने में सक्षम बना रही है, हालाँकि यह नैतिक जवाबदेही और अनपेक्षित लक्ष्यीकरण से जुड़ी चिंताओं को भी बढ़ाती है।
- ड्रोन स्वार्म वारफेयर (Drone Swarm Warfare): ड्रोन स्वार्म वारफेयर में बड़ी संख्या में ड्रोन का समन्वित (coordinated) रूप से उपयोग शामिल है जो परिष्कृत हवाई रक्षा प्रणालियों को पंगु बना सकते हैं, जिससे संख्या बल स्वयं में एक रणनीतिक लाभ बन जाता है।
- मल्टी-डोमेन स्वायत्त युद्ध: हवाई ड्रोन, ग्राउंड रोबोट और मानव रहित नौसैनिक जहाजों का एकीकरण आपस में जुड़े स्वायत्त युद्ध पारितंत्र का निर्माण कर रहा है, जो कई डोमेन (क्षेत्रों) में कार्य करने में सक्षम हैं।
ड्रोन युद्ध द्वारा उत्पन्न चुनौतियाँ
- सुरक्षा चुनौतियाँ: ड्रोन के बढ़ते उपयोग ने सीमा पार घुसपैठ, आतंकवादी गतिविधियों और हथियारों तथा नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे खतरों को बढ़ा दिया है।
- नैतिक चुनौतियाँ: स्वायत्त ड्रोन संचालन जवाबदेही, नागरिक हताहतों और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून (IHL) के अनुपालन को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
- तकनीकी चुनौतियाँ: ड्रोन प्रणालियाँ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर हमलों और जीपीएस स्पूफिंग के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं, जो उनकी परिचालन प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती हैं।
काउंटर-ड्रोन प्रौद्योगिकियाँ
- इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ: शत्रुतापूर्ण ड्रोन के नियंत्रण प्रणालियों में हस्तक्षेप करके उन्हें निष्क्रिय करने के लिए, सिग्नल जैमिंग और संचार व्यवधान प्रौद्योगिकियों का उपयोग किया जाता है।
- विशेषीकृत रडार प्रणालियाँ: उन्नत रडार प्रणालियों को छोटे हवाई लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए डिज़ाइन किया गया है जिन्हें पारंपरिक सेंसरों का उपयोग करके पहचानना अक्सर कठिन होता है।
- काइनेटिक समाधान: काउंटर-ड्रोन उपायों में बंदूकें, मिसाइलें और इंटरसेप्टर ड्रोन शामिल हैं, जो भौतिक रूप से शत्रुतापूर्ण हवाई प्लेटफॉर्मों को नष्ट कर देते हैं।
- गैर-काइनेटिक समाधान: निर्देशित-ऊर्जा हथियार और लेजर सिस्टम जैसी उभरती प्रौद्योगिकियाँ, ड्रोन को निष्क्रिय करने के लिए गैर-काइनेटिक तरीके प्रदान करती हैं।
भारत की चिंताएँ
- सीमा सुरक्षा: पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी, हथियारों की तस्करी और निगरानी के लिए ड्रोन का उपयोग भारत की सीमा सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
- स्वदेशी विनिर्माण की आवश्यकता: आयात निर्भरता को कम करने और युद्ध के समय आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहलों के अनुरूप एक स्वदेशी ड्रोन निर्माण पारिस्थितिक तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
- सैन्य आधुनिकीकरण: भविष्य की युद्ध तैयारियों को बढ़ाने के लिए भारत को ड्रोन को अपनी सेना के सिद्धांत (Army doctrine), वायु सेना के संचालन और नौसेना की रणनीति में एकीकृत करना चाहिए।
- अनुसंधान और विकास: तकनीकी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वार्म तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और काउंटर-ड्रोन प्रणालियों में अधिक निवेश महत्त्वपूर्ण है।
आगे की राह
- स्वदेशी ड्रोन पारिस्थितिक तंत्र का विकास: भारत को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी ड्रोन उद्योग स्थापित करने के लिए घरेलू नवाचार, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ावा देना चाहिए।
- काउंटर-ड्रोन बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना: उभरते हवाई खतरों का मुकाबला करने के लिए उन्नत पहचान (detection), ट्रैकिंग और अप्रभावी करने (neutralisation) वाली प्रणालियों की तैनाती आवश्यक है।
- सैन्य सिद्धांत का आधुनिकीकरण: पारंपरिक सैन्य परिसंपत्तियों के साथ ड्रोन को एकीकृत करने से परिचालन लचीलापन, स्थितिजन्य जागरूकता तथा युद्ध प्रभावशीलता में सुधार हो सकता है।
- एआई और स्वायत्त प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना: उचित नैतिक सुरक्षा उपायों के साथ एआई-सक्षम और स्वायत्त प्रणालियों को अपनाने से भविष्य की सैन्य क्षमताओं में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
निष्कर्ष
ड्रोन क्रांति युद्ध परिदृश्यओं में एक प्रतिमान बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है। कम लागत वाली मानव रहित प्रणालियाँ पारंपरिक सैन्य संतुलनों को बदल रही हैं, जिससे छोटे अभिकर्ता भी पारंपरिक शक्तियों को चुनौती देने में सक्षम हो रहे हैं। भारत के लिए, भविष्य की राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु स्वदेशी ड्रोन क्षमताओं, काउंटर-ड्रोन प्रौद्योगिकियों और एआई-सक्षम रक्षा प्रणालियों को सुदृढ़ करना अनिवार्य है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्र. हालिया वैश्विक संघर्ष पारंपरिक हथियार प्रणालियों से विघटनकारी मानव रहित हवाई प्रणालियों की ओर एक निश्चित बदलाव को रेखांकित करते हैं। इस संदर्भ में, ‘ड्रोन क्रांति’ का विश्लेषण कीजिए तथा भारत को असममित ड्रोन खतरों से अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
|