मैंग्रोव वह कर दिखाते हैं जो समुद्री दीवारें नहीं कर पातीं

मैंग्रोव वह कर दिखाते हैं जो समुद्री दीवारें नहीं कर पातीं 5 Jun 2026

संदर्भ:

चक्रवात दाना के दौरान ओडिशा के मैंग्रोव वनों ने सुरक्षा प्रदान करने में महंगे बुनियादी ढाँचों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। इससे यह तथ्य उजागर हुआ कि भारत के महत्वपूर्ण तटीय पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी मुख्यधारा की जलवायु अनुकूलन नीतियों और वित्तीय व्यवस्थाओं में पर्याप्त रूप से न तो उपयोग किए जा रहे हैं और न ही उन्हें उचित मान्यता मिल रही है।

पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित तटीय अनुकूलन (EbA) के बारे में

  • परिभाषा: पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का उपयोग करके लोगों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के अनुरूप ढलने में सहायता करता है।
  • पारिस्थितिक सुरक्षा कवच: भारत की 11,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर मैंग्रोव, समुद्री घास के मैदान, प्रवाल भित्तियाँ तथा आर्द्रभूमियाँ जैसे विविध पारिस्थितिकी तंत्र विद्यमान हैं, जो समुद्री आपदाओं और खतरों के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा -अवशोषक के रूप में कार्य करते हैं।
  • वैश्विक हॉटस्पॉट: शोधों के अनुसार भारत तटीय EbA का एक वैश्विक हॉटस्पॉट है। भारत के मैंग्रोव अत्यंत प्रभावी हैं और प्रति हेक्टेयर संरक्षित जनसंख्या के आधार पर विश्व के लगभग सभी देशों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक सह-लाभ: कंक्रीट संरचनाओं के विपरीत, पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) स्थानीय आजीविकाओं को सुदृढ़ बनाता है। उदाहरण के लिए, सुंदरबन में 18,000 से अधिक महिलाओं द्वारा संचालित एक सामुदायिक पहल के तहत 4,600 हेक्टेयर मैंग्रोव वनों का पुनर्स्थापन किया गया। इससे अम्फान और यास जैसे चक्रवातों के प्रभावों को सफलतापूर्वक कम किया गया, साथ ही शहद संग्रहण और केकड़ा पालन के माध्यम से आय सृजन भी हुआ।

भारत की तटीय जलवायु अनुकूलन रणनीति में विद्यमान चुनौतियाँ

  • व्यय में असंतुलन: सार्वजनिक व्यय से यह स्पष्ट होता है कि इंजीनियरिंग आधारित “ग्रे” (Grey) उपायों को अत्यधिक प्राथमिकता दी जा रही है। पिछले एक दशक में तटीय राज्यों ने कठोर अवसंरचना पर ₹2,641 करोड़ खर्च किए। इसके विपरीत, राष्ट्रीय तटीय मिशन का बजट ₹195 करोड़ (2022–23) से घटाकर मात्र ₹50 करोड़ (2024–25) कर दिया गया।
  • जोखिमों का स्थानांतरण: यद्यपि समुद्री दीवारें, ग्रोयन्स, टेट्रापॉड्स और तटबंध जैसी ग्रे अवसंरचनाएँ घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों के लिए आवश्यक हैं, लेकिन इनके रखरखाव की लागत अधिक होती है और ये अक्सर जोखिम को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर देती हैं। उदाहरण के लिए, केरल में कठोर तटीय सुरक्षा उपायों ने कुछ स्थानों को तो सुरक्षित किया, परंतु समीपवर्ती असुरक्षित तटीय क्षेत्रों में कटाव और क्षति को बढ़ा दिया।
  • वैचारिक अस्पष्टता: राष्ट्रीय नीतिगत परिदृश्य में प्रकृति-आधारित समाधान (NbS), पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित तटीय अनुकूलन (EbCA) तथा पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Eco-DRR) जैसे परस्पर आच्छादित शब्दों का व्यापक उपयोग होता है। यह शब्दावली संबंधी जटिलता इस बात को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न करती है कि आधिकारिक रूप से किन उपायों को पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) की श्रेणी में शामिल किया जाए।
  • वर्गीकरण संबंधी असंगति: अनेक प्रमुख पहलों का अक्सर गलत वर्गीकरण किया जाता है। मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इनकम्स (MISHTI) कार्यक्रम का उद्देश्य नौ राज्यों में 540 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव वनों का पुनर्स्थापन करना है, ताकि तटीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। किंतु इसे मुख्यतः पुनर्स्थापन पहल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, न कि जलवायु अनुकूलन कार्यक्रम के रूप में।

तटीय अनुकूलन में संस्थागत एवं रिपोर्टिंग संबंधी चुनौतियाँ

  • नीतिगत परिधीय स्थिति: खंडित संस्थागत दायित्वों, कमजोर निगरानी प्रणालियों तथा दृश्य रूप से आकर्षक कंक्रीट अवसंरचना के प्रति राजनीतिक प्राथमिकता के कारण पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित हस्तक्षेप व्यापक क्षेत्रीय कार्यक्रमों के भीतर दबकर रह जाते हैं और उन्हें अपेक्षित नीतिगत महत्व नहीं मिल पाता।
  • छिपा हुआ अनुकूलन पोर्टफोलियो: चूँकि पारिस्थितिकी तंत्र आधारित परियोजनाएँ सामान्य विकास अथवा संरक्षण योजनाओं के अंतर्गत लागू की जाती हैं, इसलिए उनके जलवायु अनुकूलन संबंधी लाभों का अलग से मूल्यांकन या अभिलेखन बहुत कम किया जाता है। परिणामस्वरूप, भारत का वास्तविक तटीय पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) पोर्टफोलियो उसकी वास्तविक क्षमता और प्रभावशीलता की तुलना में कहीं अधिक कमजोर दिखाई देता है।
  • रिपोर्टिंग का जोखिम: इन हस्तक्षेपों की पहचान और निगरानी के लिए स्पष्ट तंत्र के अभाव में भारत अपनी सबसे प्रभावी जलवायु अनुकूलन पहलों का वास्तविक आकलन करने में विफल हो सकता है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य (GGA) के तहत अनुकूलन परिणामों के मापन और रिपोर्टिंग पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) शासन को सुदृढ़ बनाना

  • संज्ञान (Cognisance): राज्य को पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) को केवल एक पर्यावरणीय या संरक्षण संबंधी उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु लचीलापन और सतत विकास की एक केंद्रीय रणनीति के रूप में औपचारिक मान्यता प्रदान करनी चाहिए।
  • गणना: भारत को ऐसी स्पष्ट कार्यप्रणालियाँ विकसित करनी चाहिए जिनसे पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित हस्तक्षेपों के विशिष्ट अनुकूलन तथा सामाजिक-आर्थिक परिणामों का पृथक आकलन और मूल्यांकन किया जा सके तथा उन्हें राष्ट्रीय आँकड़ों में उचित रूप से दर्शाया जा सके।
  • वर्गीकरण: एक एकीकृत राष्ट्रीय नीति ढाँचा विकसित किया जाना चाहिए जो EbA परियोजनाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित और वर्गीकृत करे। इससे उन्हें सामान्य क्षेत्रीय योजनाओं की श्रेणी से बाहर लाकर प्रत्यक्ष जलवायु वित्तपोषण प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

निष्कर्ष

चुनौती अब यह नहीं है कि पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (EbA) प्रभावी है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारे नीतिगत ढाँचे इसे पहचानने, मापने और व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए तैयार हैं। बिखरी हुई और अलग-अलग परियोजनाओं से आगे बढ़कर एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपनाने से भारत अपनी प्राकृतिक पूँजी को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध सबसे अधिक लचीली, लागत-प्रभावी और न्यायसंगत सुरक्षा-पंक्ति के रूप में स्थापित कर सकेगा।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: लागत-प्रभावी एवं सामाजिक रूप से लाभकारी रणनीति होने के बावजूद, पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन ( EbA) भारत की तटीय प्रबंधन नीतियों में अभी भी हाशिये पर बना हुआ है। इसके पीछे के कारणों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा आगे की राह सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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