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भारत, चीन और अति-वैश्वीकरण (Hyper-Globalisation) की सीमाएँ

भारत, चीन  और अति-वैश्वीकरण (Hyper-Globalisation) की सीमाएँ 4 Jun 2026

संदर्भ: 

यह चर्चा भारत की 1991 के बाद की आर्थिक रणनीति की पुनर्समीक्षा करती है तथा यह विश्लेषण करती है कि चीन किस प्रकार विनिर्माण और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरा है।

वर्ष 1991 के बाद भारत का आर्थिक मार्ग

  • उदारीकरण एवं वैश्विक एकीकरण:  भुगतान संतुलन संकट के बाद भारत ने आर्थिक सुधारों, व्यापार उदारीकरण तथा वैश्विक बाजारों के साथ अधिक गहन एकीकरण की नीति अपनाई।
  • असेंबली-आधारित विनिर्माण का उदय:  अनेक कंपनियाँ मुख्यतः उत्पादों के संयोजन और विपणन तक सीमित हो गईं तथा आयातित पुर्जों, मध्यवर्ती वस्तुओं और विदेशी प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भर रहने लगीं।

भारत बनाम चीन: तुलनात्मक विश्लेषण

  • वर्ष 1980 में भारत और चीन लगभग समान तकनीकी स्तर पर थे।
  • चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग, मुद्रा अवमूल्यन तथा आक्रामक औद्योगिक रणनीतियों का उपयोग करके स्वयं को वैश्विक निर्यात महाशक्ति में परिवर्तित कर लिया।
  • दूसरी ओर, भारत “असेंबलरों और विपणनकर्ताओं” का देश बनकर रह गया तथा हार्डवेयर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर बना रहा।
  • वर्ष 1991 से अब तक चीन की अर्थव्यवस्था लगभग 46 गुना बढ़ी है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 15 गुना बढ़ी है। इसी अवधि में चीन की प्रति व्यक्ति आय में लगभग 38 गुना वृद्धि हुई, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय में लगभग 8 गुना वृद्धि दर्ज की गई।

चीन की वैकल्पिक रणनीति

  • आक्रामक औद्योगिक नीति:  चीन ने वैश्विक व्यापार एकीकरण को घरेलू औद्योगिक विकास, तकनीकी क्षमता निर्माण तथा प्रौद्योगिकी अधिग्रहण की सशक्त नीतियों के साथ जोड़ा, जिससे उसकी विनिर्माण और नवाचार क्षमता में तीव्र वृद्धि हुई।
  • विनिर्माण पारितंत्र का विकास :  घरेलू उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करके चीन ने वैश्विक विनिर्माण मूल्य शृंखलाओं में प्रभुत्व स्थापित किया।
  • निर्यात-उन्मुख विकास:  चीन ने वैश्विक बाजारों का उपयोग मुख्यतः अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए किया, साथ ही घरेलू उत्पादन क्षमता, औद्योगिक आधार और प्रतिस्पर्धात्मकता को निरंतर सुदृढ़ किया।

सीढ़ी को हटाने” (Kicking Away the Ladder) की अवधारणा

  • विकसित देश एवं संरक्षणवाद:  अर्थशास्त्री हा-जून चांग के अनुसार, आज के विकसित देशों ने अपने विकास के दौरान प्रायः संरक्षणवादी नीतियों, सरकारी समर्थन और औद्योगिक संरक्षण का सहारा लिया, किंतु विकसित होने के बाद वे अन्य देशों को मुक्त व्यापार और उदारीकरण अपनाने की सलाह देने लगे।

अति-वैश्वीकरण के समक्ष उभरती चुनौतियाँ

  • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का विखंडन:  भू-राजनैतिक तनाव, व्यापार प्रतिबंध और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने अत्यधिक एकीकृत वैश्विक उत्पादन नेटवर्क को कमजोर किया है।
  • आर्थिक राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान:  विश्व के अनेक देश अब घरेलू विनिर्माण, आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता  तथा रणनीतिक उद्योगों के विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं।
  • निर्यात पर निर्भरता में कमी:  वैश्विक व्यापार के बदलते स्वरूप और बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच केवल निर्यात-आधारित विकास पर अत्यधिक निर्भरता अब कम टिकाऊ और कम विश्वसनीय होती जा रही है।

वाशिंगटन सहमति  की आलोचना

  • बाजार-केंद्रित दृष्टिकोण:  वाशिंगटन सहमति ने निजीकरण, विनियमन-मुक्ति, व्यापार उदारीकरण तथा राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप पर जोर दिया।
  • बदलती वैश्विक सहमति:  वैश्विक स्तर पर अब सरकारें  औद्योगिक नीतियों, रणनीतिक सब्सिडी तथा महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए लक्षित संरक्षण  को अपनाने पर अधिक बल दे रही हैं।

भारत के लिए प्रमुख सबक

  • घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ बनाना:  आयातित पुर्जों पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया जाए।
  • क्रय शक्ति में वृद्धि:   स्थायी आर्थिक विकास के लिए आय में वृद्धि और मजबूत घरेलू मांग आवश्यक है।
  • सम्मानजनक रोजगार का सृजन:  ऐसे उच्च-गुणवत्ता वाले रोजगारों को बढ़ावा दिया जाए जो कौशल, उत्पादकता और दीर्घकालिक आर्थिक गतिशीलता को बढ़ाएँ।
  • ग्रामीण आय में वृद्धि:  किसानों की आय बढ़ाने से ग्रामीण मांग को प्रोत्साहन मिल सकता है तथा घरेलू बाजार का विस्तार हो सकता है।
  •  रणनीतिक औद्योगिक नीति अपनाना:  राज्य को उन क्षेत्रों का सक्रिय समर्थन करना चाहिए जिनमें उच्च तकनीकी क्षमता और रोजगार सृजन की संभावना हो, साथ ही वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता भी बनी रहे।
  • केवल गिग अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय ऐसे रोजगार मॉडल विकसित किए जाएँ जो कार्य के साथ कौशल विकास और सीखने के अवसर भी प्रदान करें।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न:  निर्यात-आधारित अति-वैश्वीकरण (Export-led Hyper-Globalisation) का युग समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। हालिया भू-राजनीतिक परिवर्तनों तथा चीन के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों के परिप्रेक्ष्य में समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए कि क्या भारत को वर्ष 1991 की आर्थिक सहमति से आगे बढ़कर घरेलू औद्योगिक गहनता का निर्माण करना चाहिए

(15 अंक, 250 शब्द)

भारत, चीन  और अति-वैश्वीकरण (Hyper-Globalisation) की सीमाएँ

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