संदर्भ:
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) द्वारा हाल ही में उत्तर-पूर्वी राज्यों में 43 क्रिटिकल मिनरल्स अन्वेषण परियोजनाओं की घोषणा भारत के इस क्षेत्र के प्रति दृष्टिकोण में एक प्रतिमानात्मक परिवर्तन को दर्शाती है। यह परिवर्तन इसे एक सुरक्षा-केंद्रित सीमांत क्षेत्र से हटाकर एक रणनीतिक संसाधन सीमांत के रूप में स्थापित करता है, जो आर्थिक और प्रौद्योगिकीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रमुख शब्दावली
- क्रिटिकल मिनरल्स: ऐसे खनिज जो आर्थिक विकास, स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, सेमीकंडक्टर, रक्षा विनिर्माण तथा अन्य सामरिक उद्योगों के लिए आवश्यक होते हैं और जिनके विकल्प सीमित होते हैं।
- संसाधन सीमांत: एक ऐसा क्षेत्र जिसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों के स्रोत के रूप में देखा जाता है तथा जिसकी महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक क्षमता होती है।
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक): भूमि का एक संकीर्ण हिस्सा जो मुख्यभूमि भारत को उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ता है, जिससे यह राष्ट्रीय सुरक्षा और संपर्क के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
उत्तर-पूर्व भारत के प्रति बदलती धारणा
पूर्व: सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण
परंपरागत रूप से उत्तर-पूर्व भारत को मुख्यतः निम्नलिखित दृष्टिकोणों से देखा जाता था:
- चीन और म्यांमार के साथ सीमा प्रबंधन
- उग्रवाद-विरोधी अभियान
- सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा
- क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
उभरता दृष्टिकोण: सामरिक संसाधन क्षेत्र
क्रिटिकल मिनरल्स की खोज और अन्वेषण ने इस क्षेत्र को पुनः परिभाषित किया है:
- सामरिक संसाधनों के केंद्र के रूप में
- भारत की खनिज सुरक्षा के महत्वपूर्ण घटक के रूप में
- एक्ट ईस्ट नीति के अंतर्गत दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में
- औद्योगिक एवं आर्थिक विकास के संभावित चालक के रूप में
क्रिटिकल मिनरल्स अन्वेषण का महत्व
- सामरिक संसाधन सुरक्षा: ग्रेफाइट, दुर्लभ मृदा तत्व, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों का अन्वेषण भारत की आयात निर्भरता कम कर सकता है। विशेष रूप से चीन पर निर्भरता घटाने में सहायता मिलेगी।
- ऊर्जा संक्रमण: क्रिटिकल मिनरल्स निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए अनिवार्य हैं:
- इलेक्ट्रिक वाहन (EVs)
- बैटरियाँ
- सौर पैनल
- पवन टर्बाइन
- सेमीकंडक्टर निर्माण
- आर्थिक विकास: खनन और उससे जुड़े सहायक उद्योग उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में रोजगार, अवसंरचना और निवेश को बढ़ावा दे सकते हैं।
- आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करना: क्रिटिकल मिनरल्स की घरेलू उपलब्धता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में होने वाले व्यवधानों के विरुद्ध लचीलापन को बढ़ावा देती है।
उत्तर-पूर्व को एक संसाधन सीमांत के रूप में विकसित करने में विद्यमान चुनौतियाँ
- भूमि और जनजातीय पहचान: उत्तर-पूर्व में भूमि केवल एक आर्थिक संपत्ति नहीं है, बल्कि यह जनजातीय पहचान, संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक अधिकारों से गहराई से जुड़ी हुई है।
- संवैधानिक सुरक्षा प्रावधान: विशेष संवैधानिक प्रावधान स्वदेशी/आदिवासी भूमि अधिकारों की सुरक्षा करते हैं:
- अनुच्छेद 371A नागा समुदाय के प्रथागत कानूनों और भूमि अधिकारों की सुरक्षा करता है।
- अनुच्छेद 371G मिजो समुदाय के प्रथागत कानूनों और भूमि अधिकारों की सुरक्षा करता है।
- खनन के प्रति स्थानीय विरोध: खनन परियोजनाओं को अक्सर निम्नलिखित चिंताओं के कारण विरोध का सामना करना पड़ता है:
- भूमि से विस्थापन की आशंका
- सांस्कृतिक व्यवधान
- पर्याप्त परामर्श का अभाव
- लाभों का असमान वितरण
- संघर्ष और सामाजिक तनाव: मणिपुर में हाल की जातीय हिंसा ने भूमि और क्षेत्रीय मुद्दों की संवेदनशीलता को उजागर किया है, जिससे बड़े पैमाने पर संसाधन निष्कर्षण राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो गया है।
- पारिस्थितिक संवेदनशीलता: उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पूर्वी हिमालय का हिस्सा है, जो विश्व के जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक है। बड़े पैमाने पर खनन से निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं:
- वनों की कटाई
- मृदा अपरदन
- आवासीय क्षेत्रों का विनाश
- जल प्रदूषण
- अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति
शासन संबंधी चुनौतियाँ
- संस्थागत क्षमता की सीमाएँ: स्थानीय शासन संस्थाओं को मजबूत किए बिना तीव्र खनिज निष्कर्षण सामाजिक संघर्षों और पर्यावरणीय क्षरण को और बढ़ावा दे सकती है।
- राष्ट्रीय और स्थानीय प्राथमिकताओं के बीच संतुलन: खनिज सुरक्षा से जुड़े राष्ट्रीय उद्देश्य हमेशा आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित स्थानीय आकांक्षाओं के साथ मेल नहीं खाते।
- विश्वास की कमी: स्थानीय समुदाय अक्सर संसाधन परियोजनाओं को निम्नलिखित दृष्टिकोण से देखते हैं:
- प्रतिनिधित्व
- सहभागिता
- स्वामित्व
- लाभ-साझेदारी
भारत के लिए अवसर
- चीन पर निर्भरता कम करना: चीन कई महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभुत्व रखता है; घरेलू उत्पादन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर सकता है।
- क्षेत्रीय विकास को गति देना: संसाधन-आधारित विकास निम्नलिखित में सुधार ला सकता है:
- संपर्कता
- औद्योगिकीकरण
- रोजगार के अवसर
- मानव विकास संकेतक
- रणनीतिक उद्योगों का समर्थन: क्रिटिकल मिनरल्स निम्नलिखित के लिए अत्यंत आवश्यक हैं:
- रक्षा विनिर्माण
- नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण
- इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सेमीकंडक्टर
- उन्नत विनिर्माण
आगे की राह
- जन-केंद्रित विकास मॉडल अपनाना: संसाधन विकास में स्थानीय भागीदारी, सहमति और लाभ-साझेदारी तंत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- स्थानीय संस्थाओं को सशक्त बनाना: निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में ग्राम पंचायतों, जनजातीय निकायों और स्वायत्त संस्थाओं को सशक्त किया जाना चाहिए।
- सतत खनन सुनिश्चित करना: कठोर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) लागू किए जाने चाहिए तथा पर्यावरण-अनुकूल खनन प्रौद्योगिकियों को अपनाया जाना चाहिए।
- मूल्य संवर्धन उद्योगों का विकास: केवल खनिजों के निष्कर्षण के बजाय, क्षेत्र के भीतर ही प्रसंस्करण और विनिर्माण उद्योग स्थापित किए जाने चाहिए ताकि स्थानीय रोजगार सृजित हो सके।
- राष्ट्रीय और स्थानीय प्राथमिकताओं का समन्वय: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संसाधन निष्कर्षण से प्राप्त राजस्व पारदर्शी लाभ-साझेदारी व्यवस्था के माध्यम से सीधे स्थानीय विकास में योगदान दे।
- समावेशी शासन को बढ़ावा देना: परियोजना योजना और क्रियान्वयन के प्रत्येक चरण में जनजातीय समुदायों के साथ परामर्श को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
उत्तर-पूर्व भारत एक संवेदनशील सीमांत क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण सामरिक संसाधन केंद्र के रूप में उभर रहा है। क्रिटिकल मिनरल्स का विकास भारत की आर्थिक और सामरिक सुरक्षा के लिए अपार अवसर प्रदान करता है। हालाँकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संसाधन दोहन को पारिस्थितिक स्थिरता, संवैधानिक सुरक्षा प्रावधानों और स्थानीय समुदायों की आकांक्षाओं के साथ किस प्रकार संतुलित किया जाता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: उत्तर-पूर्व भारत को एक सुरक्षा-केंद्रित सीमांत क्षेत्र के बजाय एक सामरिक संसाधन क्षेत्र के रूप में देखने का दृष्टिकोण आर्थिक अवसरों के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है। भारत की क्रिटिकल मिनरल्स रणनीति तथा स्थानीय भूमि अधिकारों के संदर्भ में इसका विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
|