जनसंख्या परिसीमन और संसदीय विस्तार

जनसंख्या परिसीमन और संसदीय विस्तार 16 Apr 2026

संदर्भ :

16 अप्रैल, 2026 को संसद के एक विशेष सत्र में प्रस्तुत किया गया ‘131वाँ संविधान संशोधन विधेयक’ आपातकाल के बाद से एक बड़े संरचनात्मक सुधार का प्रतीक है। यह 33% महिला आरक्षण को क्रियान्वित करने के साथ-साथ प्रतिनिधित्व को वर्तमान जनसंख्या प्रवृत्तियों से जोड़कर 50 वर्षों के सीटों के स्थिरीकरण को समाप्त करता है।

भारतीय परिसीमन – मूल अवधारणा

परिसीमन नवीनतम जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करने की प्रक्रिया है।

  • मूल सिद्धांत: “एक वोट, एक मूल्य”—यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक नागरिक के मतदान का मूल्य लगभग समान हो, चाहे वे कहीं भी रहते हों।
  • क्षेत्र विस्तार: यह लोकसभा में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की कुल संख्या निर्धारित करता है, क्षेत्रीय सीमाओं को पुनः तैयार तथा SC और ST के लिए आरक्षित सीटों की पहचान करता है।
  • प्राधिकरण: यह ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा संचालित किया जाता है, जो एक उच्चाधिकार प्राप्त अर्द्ध-न्यायिक निकाय है। इसके आदेशों का कानून के समान मूल्य होता है, और राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए किसी भी अदालत में इन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ – सीटों का स्थिरीकरण

लगभग पाँच दशकों से, भारत एक चुनावी संरचना पर कार्य कर रहा है, जो एक जनसांख्यिकीय दुविधा के कारण समय के साथ स्थिर हो गया है:

  • 1970 के दशक की दुविधा: उत्तरी राज्यों में तीव्र जनसंख्या वृद्धि देखी गई, जबकि दक्षिणी राज्यों (जैसे- केरल और तमिलनाडु) ने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया। जनसंख्या-आधारित परिसीमन प्रभावी रूप से उत्तरदायी राज्यों को उनकी लोकसभा सीटों को कम करके ‘दंडित’ करता है।
  • विधायी स्थिरीकरण (The Legislative Freeze):
    • 42वाँ संविधान संशोधन (1976): 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के आवंटन को 2001 तक स्थिर कर दिया गया।
    • 84वाँ संविधान संशोधन (2001): फ्रीज को 2026 तक बढ़ा दिया गया, यह तर्क देते हुए कि परिवार नियोजन प्रोत्साहन जारी रहना चाहिए।
    • 87वाँ संविधान संशोधन (2003): 2001 की जनगणना के आधार पर ‘इंट्रा-स्टेट’ परिसीमन (एक राज्य के भीतर सीमाओं को पुनः निर्धारित करना) की अनुमति दी गई, लेकिन प्रति राज्य कुल सीटों की संख्या को अपरिवर्तित रखा गया।

131वें संविधान संशोधन विधेयक के प्रमुख प्रावधान:

यह विधेयक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ के लिए परिचालन इंजन और आपातकाल के बाद से शक्ति के पहले बड़े पुनर्वितरण के रूप में कार्य करता है।

  • अनुच्छेद 170 में संशोधन: विधेयक “तीसरे परंतुक” (Third proviso) को हटा देता है, जिससे अंततः 1976 की बाधा दूर हो जाती है। यह संसद द्वारा निर्दिष्ट प्रकाशित जनगणना के आधार पर सीटों के नए पुनर्समायोजन की अनुमति देता है।
  • 850 सीटों तक विस्तार: ‘जीरो-सम गेम’ (जहाँ बढ़ते राज्यों को सीटें तभी प्राप्त होती हैं जब अन्य राज्य उन्हें खो देते हैं) से बचने के लिए लोकसभा की क्षमता बढ़ाकर 850 सीटें कर दी गई है।
  • महिला आरक्षण को क्रियान्वित करना: विधेयक अनुच्छेद 334A को प्रतिस्थापित करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस संशोधन के बाद आयोजित पहले परिसीमन अभ्यास के तुरंत बाद महिलाओं के लिए एक तिहाई कोटा लागू हो जाए।
  • विधायी लचीलापन: संसद को ‘सामान्य कानून’ द्वारा यह निर्धारित करने की शक्ति प्रदान की गई है, कि किस विशिष्ट जनगणना डेटा का उपयोग किया जाएगा, जो जनगणना 2021 की देरी के लिए एक समाधान प्रदान करता है।

मुख्य अवधारणाएँ और शब्दावलियाँ:

  • जनसांख्यिकीय दंड : यह भय, कि निम्न जन्म दर वाले राज्य पूरी तरह से जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधि प्रणाली में राजनीतिक प्रभाव खो देंगे।
  • सीटों का रोटेशन (चक्रण): अनुच्छेद 334A के तहत, महिलाओं के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र का, ठहराव को रोकने के लिए, प्रत्येक परिसीमन के बाद रोटेशन होता रहेगा।
  • एक वोट, एक मूल्य: लोकतांत्रिक आदर्श – एक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसे आवंटित सीटों की संख्या के बीच का अनुपात, जहाँ तक व्यावहारिक हो, पूरे राज्य में समान होना चाहिए।

परिसीमन आयोग-2026

यह अर्द्ध-न्यायिक निकाय “एक वोट, एक मूल्य” के लोकतांत्रिक आदर्श को सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है। राजनीतिक ‘गेरीमेंडरिंग’ (Gerrymandering) को रोकने के लिए इसकी स्वतंत्रता आवश्यक है।

  • नेतृत्व: आयोग की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व या वर्तमान न्यायाधीश द्वारा की जाती है, जो विधिक तटस्थता सुनिश्चित करते हैं।
  • मुख्य सदस्यता: इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं।
  • संबद्ध सदस्य: प्रत्येक राज्य 10 सलाहकार (5 सांसद और 5 विधायक) प्रदान करता है। वे स्थानीय संदर्भ प्रदान करते हैं, लेकिन उनके पास मतदान का अधिकार नहीं होता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अंतिम निर्णय निष्पक्ष रहें।
  • विधिक उन्मुक्ति: अनिश्चितकालीन देरी को रोकने के लिए, आयोग के आदेशों में विधि सम्बद्ध प्रभाव होता है, और किसी भी अदालत में उन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।

संबंधित निहितार्थ:

  • एक वोट, एक मूल्य : प्राथमिक लक्ष्य उस लोकतांत्रिक आदर्श को बहाल करना है, जहाँ प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य समान हो, जिससे उच्च जनसंख्या वाले क्षेत्रों के वर्तमान कम प्रतिनिधित्व को सुधारा जा सके।
  • लैंगिक समावेशिता: परिसीमन को 106वें संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) से जोड़कर, विधेयक महिलाओं के लिए विधायी सीटों के 33% भाग को नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट, संवैधानिक मार्ग प्रदान करता है।
  • कार्यकारी विस्तार: 91वें संविधान संशोधन के अनुसार, एक बड़ी लोकसभा (850 सीटें) मंत्रिपरिषद के अनुमेय आकार को 81 से बढ़ाकर 122 कर देती है, जिससे संभावित रूप से अधिक विशिष्ट लेकिन ‘जंबो’ कैबिनेट बन सकती है।
  • अवसंरचनात्मक विकास: इसके लिए नए संसद भवन के पूर्ण उपयोग और प्रतिनिधियों की बढ़ी हुई संख्या को समायोजित करने के लिए, राज्य विधानसभा भवनों के बड़े पैमाने पर उन्नयन की आवश्यकता है।
  • जनजातीय संरक्षण (अनुच्छेद 332): अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में, विधेयक यह सुनिश्चित करता है कि ST आरक्षित सीटें उनके वर्तमान अनुपात से कम नहीं होंगी।

संबंधित चुनौतियाँ और चिंताएँ:

  • उत्तर-दक्षिण विभाजन: अपडेटेड जनगणना डेटा का उपयोग करने से राजनीतिक महत्त्व उत्तरी राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार) की ओर बढ़ जाता है, तथा प्रदर्शन-उन्मुख दक्षिणी राज्यों (केरल, तमिलनाडु) से दूर हो जाता है, जिन्होंने सफलतापूर्वक जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया। इसे ‘जनसांख्यिकीय दंड’ कहा जाता है।
  • राज्यसभा का हाशिए पर जाना: लोकसभा और राज्यसभा के आकार का अनुपात 2.2:1 से बदलकर 3.3:1 हो जाएगा, जिससे संभावित रूप से एक जंबो लोकसभा संयुक्त बैठकों (अनुच्छेद 108) के दौरान “राज्यों की परिषद” को ओवरराइड कर सकती है।
  • राजनीतिक विवेक: विधेयक संसद को ‘सामान्य कानून’ द्वारा यह निर्धारित करने की शक्ति देता है, कि कौन सी जनगणना अपनानी है और अभ्यास कब शुरू करना है, जिससे ‘सॉफ्ट राजनीतिक गेरीमेंडरिंग’ के संबंध में चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
  • विमर्श का संकट: 850 सदस्यों के साथ, प्रश्नकाल या शून्यकाल के दौरान व्यक्तिगत फ्लोर समय कम हो जाएगा। वर्तमान में, भारतीय संसद वर्ष में 70 से कम दिन बैठती है, जिससे यह भय उत्पन्न होता है कि एक बड़ा सदन कम कुशल हो सकता है।

विशेषज्ञ टिप्पणी:

  • एम.आर. माधवन (PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च): इस बात पर बल देते हैं, कि इन परिवर्तनों का संसदीय कार्यों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा और गहन प्रक्रियात्मक जाँच के बिना प्रक्रिया में शीघ्रता करने से समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • डॉ. बी.आर. अंबेडकर : संवैधानिक विशेषज्ञ अक्सर अंबेडकर की इस चेतावनी का उल्लेख करते हैं, कि “एक संविधान केवल उतना ही अच्छा होता है, जितने उसे चलाने वाले लोग।” यह चुनौती प्रकट करते हुए, कि केवल संख्यात्मक विस्तार के साथ संवैधानिक नैतिकता पर अधिक महत्त्वपूर्ण चर्चा प्रारंभ होनी चाहिए।
  • प्रदर्शन संबंधी तर्क: विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं, कि पूरी तरह से जनसंख्या आधारित मॉडल ‘क्षेत्रीय समानता’ की अनदेखी करता है; उनका सुझाव है कि राज्यों को परिवार नियोजन जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

आगे की राह

  • संघीय आम सहमति: केंद्र सरकार को दक्षिणी राज्यों के साथ व्यापक संवाद करना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम न हो।
  • द्विसदनीय पुनर्संतुलन: संसद को एक संघीय चेक के रूप में अपनी भूमिका बनाए रखने के लिए राज्यसभा के संबंधित विस्तार या सशक्तीकरण पर विचार करना चाहिए।
  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण: लोकतंत्र की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए, सदस्यों में वृद्धि के साथ-साथ प्रति वर्ष अधिक बैठकें और संसदीय समितियों को सभी विधेयकों का अनिवार्य प्रेषण होना चाहिए।
  • पारदर्शी परिसीमन: परिसीमन आयोग को अधिकतम पारदर्शिता और जन-परामर्श सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि उस निष्पक्षता को बनाए रखा जा सके जो ऐतिहासिक रूप से उसकी सबसे बड़ी विशेषता रही है।

निष्कर्ष

131वाँ संविधान संशोधन जनसांख्यिकीय यथार्थवाद को लैंगिक न्याय के साथ एकीकृत करने का प्रयास करता है। जबकि 850 संसदीय सीटों का विस्तार दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा के लिए एक गणितीय समस्या उत्पन्न करता है, इस सुधार की वास्तविक परीक्षा पाँच दशक पुराने प्रतिनिधित्व असंतुलन को ठीक करते हुए अंतर-राज्यीय संघीय सद्भाव बनाए रखने की क्षमता में होगी।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया के पितृसत्तात्मक चरित्र पर सीमित प्रभाव पड़ा है।” टिप्पणी कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

Follow Us

Explore SRIJAN Prelims Crash Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.