संदर्भ:
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली के अभूतपूर्व विस्तार ने एक संरचनात्मक श्रम संकट को जन्म दिया है, जहाँ लगभग हर तीन में से एक स्नातक बेरोजगार है। यह स्थिति पूँजी-गहन आर्थिक विकास तथा वास्तविक रोजगार सृजन के मध्य एक गंभीर असंतुलन को उजागर करती है।
पूँजी-गहन बनाम श्रम-गहन का असंतुलन
- संरचनात्मक परिवर्तन: सार्वजनिक और निजी पूँजी तेजी से सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और उन्नत रक्षा प्रणालियों की ओर स्थानांतरित हो रही है।
- ये अग्रणी क्षेत्र पारंपरिक क्षेत्रों की तुलना में प्रति रुपये निवेश पर बहुत कम रोजगार उत्पन्न करते हैं।
- रोजगार-घनत्व अंतराल: जहाँ ₹100 करोड़ के निवेश वाला एक पारंपरिक कपड़ा कारखाना लगभग 1,000 रोजगार सृजित करता है, वहीं ₹1,000 करोड़ के निवेश से समर्थित एक आधुनिक सेमीकंडक्टर सुविधा केवल लगभग 500 रोजगार ही उत्पन्न कर पाती है।
- उद्योग 4.0 का प्रभाव: स्वचालन, रोबोटिक्स और डिजिटल विनिर्माण प्रणालियों ने कारखानों के स्वरूप को बदल दिया है। इसके चलते संयंत्र कम परिचालन और पर्यवेक्षी कर्मियों की आवश्यकता के साथ अपने कुल उत्पादन का विस्तार करने में सक्षम हो गए हैं।
कौशल असंतुलन तथा शैक्षणिक विसंगति
- विश्वविद्यालयों का पुराना पाठ्यक्रम: उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम अभी भी पूरी तरह से सैद्धांतिक बने हुए हैं, जो स्नातकों को आवश्यक एआई साक्षरता तथा तकनीकी कौशल से युक्त करने में पूरी तरह विफल हैं।
- जनसांख्यिकीय विडंबना: एक विशाल जनसांख्यिकीय लाभांश होने के बावजूद भारत रोजगारहीन विकास के एक गंभीर मामले का साक्षी बन रहा है, क्योंकि कॉलेज की डिग्रियाँ उद्योग की परिवर्तित आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं।
- सुधारात्मक प्रशिक्षण का बोझ: वास्तविक दुनिया के परिवेश और व्यावहारिक ज्ञान की कमी के कारण, कंपनियों को प्रवेश स्तर के बुनियादी कौशल घाटे को ठीक करने के लिए व्यापक आंतरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने हेतु बाध्य होना पड़ता है।
वैश्विक निर्भरता तथा नवाचार का अभाव
- असेंबली (एकत्रण) का जाल : भारत अन्य देशों में डिजाइन किए गए उत्पादों की असेंबली (एकत्रण) करने में अत्यधिक कुशल बना हुआ है। केवल प्रोडक्शन लाइनों पर ध्यान केंद्रित करने से देश का मुनाफा अत्यंत कम रह जाता है, जबकि बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) पूरी तरह से विदेशों के पास रहते हैं।
- संप्रभुता का जोखिम: विदेशी तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता बड़े राष्ट्रीय जोखिम उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी संकट के दौरान किसी विदेशी एआई मॉडल को उसकी गृह सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय उपयोग से प्रतिबंधित कर दिया जाता है, तो भारत को एक गंभीर तकनीकी ठहराव का सामना करना पड़ सकता है।
- इंजीनियरिंग पैमाने की चुनौती: हालाँकि विशिष्ट घरेलू कॉरपोरेट्स ने विश्व स्तरीय डिजाइन प्लेटफॉर्म बनाए हैं, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले इंजीनियरिंग स्नातकों की संख्या वर्तमान में उपलब्ध उन्नत अनुसंधान एवं विकास (R&D) भूमिकाओं की तुलना में कहीं अधिक है।
पुनर्रचना के लिए रणनीतिक स्तंभ
- शैक्षणिक कोर का आधुनिकीकरण: सभी संकायों में व्यावहारिक एआई साक्षरता तथा एआई के नैतिक उपयोग को सिखाने के लिए उच्चतर शिक्षा में व्यापक सुधार होने चाहिए, जिससे उद्योग-अकादमिक सहयोग को सीधे पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके।
- असेंबलर से निर्माता बनना: नीति निर्माताओं को केवल उत्पादन से जुड़े भौतिक असेंबली की बजाय स्वदेशी अनुसंधान और विकास (R&D) में भारी निवेश करने के लिए प्रोत्साहनों को स्थानांतरित करना चाहिए।
- उद्यम पूँजी (Venture Capital) मार्गों में सुधार: युवाओं को नौकरी चाहने वालों से नौकरी प्रदाता में बदलने के लिए, भारत को मजबूत घरेलू स्टार्टअप नेटवर्क स्थापित करने चाहिए जो डीप-टेक नवाचार के लिए उच्च जोखिम वाली, प्रारंभिक चरण पूँजी तक आसान पहुँच प्रदान करें।
निष्कर्ष
भारत के शिक्षित बेरोजगारी संकट में सुधार के लिए केवल डिग्रियों की संख्या बढ़ाने के दृष्टिकोण से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को सही ढंग से अवशोषित करने के लिए, देश को उच्च शिक्षा को उद्योग की आवश्यकताओं के साथ एकीकृत करता होगा, घरेलू अनुसंधान एवं विकास (R&D) को आक्रामक रूप से बढ़ाना, तथा व्यवस्थित रूप से तकनीकी उपयोगकर्ताओं के आधार से स्वदेशी डिजाइन और उत्पाद नवप्रवर्तकों के एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्वयं को परिवर्तित करना होगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. “नौकरी चाहने वाले (job-seeking) से नौकरी प्रदाता (job-creating) बनने के संक्रमण में बाधा विचारों की कमी के कारण नहीं, बल्कि एक मजबूत जोखिम-पूँजी पारिस्थितिक तंत्र की अनुपस्थिति के कारण है।” भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश और बढ़ती शिक्षित बेरोजगारी के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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