संदर्भ:
जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों से जुड़ा दल-बदल संकट, जो ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) के साथ एक सुनियोजित विलय को रेखांकित करता है, दसवीं अनुसूची के निरंतर दुरुपयोग को उजागर करता है। यह दिखाता है, कि कैसे विधायक दल-बदल विरोधी दंड से बचने और लोकतांत्रिक जनादेश को पलटने के लिए विधिक खामियों का लाभ उठाते हैं।
दल-बदल विरोधी कानून का उद्भव और विकास
- “आया राम, गया राम” का दौर: राजनीतिक अस्थिरता 1967 से 1985 के बीच अपने चरम पर थी, जब भारत में विधायकों द्वारा 1,500 से अधिक दल-बदल के मामले देखे गए। कुछ जनप्रतिनिधियों ने तो एक ही दिन में कई बार अपनी राजनीतिक निष्ठा बदली।
- 1985 का संरचनात्मक ढाल: संसदीय स्थिरता की रक्षा के लिए, 52वें संविधान संशोधन द्वारा दसवीं अनुसूची को जोड़ा गया, जिसने दलीय अनुशासन को तोड़ने वाले प्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित करने के लिए एक स्पष्ट विधिक तंत्र निर्मित किया।
- संगठनात्मक बनाम विधायी स्वरूप: विधिक स्वरूप “राजनीतिक दल” (मूल राष्ट्रीय या राज्य संगठनात्मक निकाय) को “विधायक दल” (Legislature Party – किसी विशेष सदन के भीतर बैठे निर्वाचित सदस्यों का विशिष्ट समूह) से अलग करता है।
- ‘विभाजन’ की कमी को समाप्त करना: 91वें संविधान संशोधन (2003) ने मूल पैरा 3 के उस अपवाद को पूरी तरह से हटा दिया जो एक-तिहाई (1/3) सदस्यों के मामूली विभाजन को संरक्षण देता था। इसके बाद, अयोग्यता से बचने के लिए पैरा 4 के तहत दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का विलय ही एकमात्र मार्ग था।
अयोग्यता के मूल नियम तथा विस्तार
- सार्वभौमिक विधायी अनुप्रयोग: ये संरचनात्मक नियम संसद के दोनों सदनों और भारत की प्रत्येक राज्य विधानसभा के सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होते हैं।
- अयोग्यता के नियमित कारण: एक निर्वाचित सदस्य अपनी सीट खो देता है – यदि वह स्वेच्छा से अपने दल से इस्तीफा दे, स्पष्ट विरोधी आचरण प्रदर्शित करे, या सदन के भीतर पार्टी व्हिप (whip) के खिलाफ मतदान करे।
- निर्दलीय और मनोनीत सदस्य: एक निर्दलीय विधायक को चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने पर तत्काल निष्कासन का सामना करना पड़ता है, जबकि मनोनीत सदस्यों को किसी पार्टी से जुड़ने के लिए छह महीने का समय दिया जाता है।
संशोधन पश्चात दुरुपयोग तथा विधिक खामियाँ
- विलय के रूप में सामूहिक दल-बदल: छोटे विभाजन (1/3) की छूट को हटाने का अनपेक्षित परिणाम यह हुआ, कि विद्रोही समूह विधायी विंग के भीतर ही दो-तिहाई (2/3) बहुमत जुटाकर स्थानीय दल-बदल को वैध संगठनात्मक विलय का रूप देने लगे।
- मूल पार्टी के नाम और ब्रांड पर कब्जा: शिवसेना (2022) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP – 2023) से जुड़े ऐतिहासिक विवादों ने दिखाया, कि कैसे अलग हुए समूह विधानसभा के भीतर शुद्ध संख्यात्मक बहुमत का उपयोग करके मूल राजनीतिक दल की पहचान पर कानूनी रूप से दावा करते हैं।
- पृथक विधायी विलय: हालिया घटनाक्रम—जैसे राजस्थान में बसपा विधायक (2019), गोवा में कांग्रेस प्रतिनिधि (2022), और अप्रैल 2026 में आप (AAP) के राज्यसभा सांसद—यह दर्शाते हैं कि समूह सदन के भीतर विधायी विंग का किसी बड़े दल में विलय कर देते हैं, जबकि वास्तविक संगठनात्मक पार्टी सदन के बाहर पूरी तरह से अलग रहती है।
जून-2026 का तृणमूल (TMC) विवाद
- दुहरा संस्थागत विभाजन: राज्य चुनावों के बाद, विधानसभा में 80 में से 60 टीएमसी विधायकों ने एक अलग गुट बना लिया, साथ ही लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों ने अपने विधायी विंग का NCPI में विलय करने का कदम उठाया।
- विकृत कानूनी बचाव: विद्रोही सांसद सदन की सदस्यता का दो-तिहाई (2/3) का आँकड़ा पार करने के कारण संरचनात्मक छूट का दावा कर रहे हैं।
- ट्विन-टेस्ट (दुहरा परीक्षण): हालाँकि, दसवीं अनुसूची का शाब्दिक पाठ एक सख्त ‘ट्विन-टेस्ट’ का निर्देश देता है—पहले मूल राजनीतिक दल को संगठनात्मक रूप से विलय करना चाहिए, जिसे बाद में दो-तिहाई विधायक दल के समूह द्वारा अनुमोदन किया जाना आवश्यक है।
संस्थागत खामियाँ तथा प्रस्तावित सुधार
- पक्षपातपूर्ण पीठासीन अधिकारी: दल-बदल के मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार अध्यक्ष या सभापति के पास होता है, जो राजनीतिक पूर्वाग्रह, निर्णय की कोई निश्चित समय-सीमा न होने और सत्तारूढ़ गठबंधनों को लाभ पहुँचाने वाले प्रणालीगत विलंब से प्रभावित है।
- विलंबित न्यायिक हस्तक्षेप: उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तब तक दल-बदल विवादों की समीक्षा नहीं कर सकते, जब तक कि पीठासीन अधिकारी अंतिम निर्णय न ले ले। यह एक बड़ा प्रवर्तन अंतराल उत्पन्न करता है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार समस्याग्रस्त बताया है।
- आंतरिक असंतोष का दमन: पार्टी व्हिप के अनियंत्रित प्रवर्तन के कारण सांसदों को सामान्य विधेयकों पर भी कठोरता से पार्टी लाइन पर मतदान करना पड़ता है, जो स्वतंत्र विचारों को रोकता है और लोकतांत्रिक चर्चा के स्थान को कमजोर करता है।
- स्वतंत्र न्यायिक अधिकरण: संरचनात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने के.एम. सिंह (2020) मामले में सिफारिश की थी, कि संसद अयोग्यता की शक्तियों को अध्यक्ष से हटाकर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के नेतृत्व वाले एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण को सौंप दे।
- विलय के अपवादों को पूरी तरह हटाना: विधि आयोग की 1999 की सिफारिशों के अनुरूप, संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि पैराग्राफ 4 को पूरी तरह से हटा दिया जाना चाहिए। इस शून्य-सहिष्णुता मॉडल के तहत, अपने मूल दल से अलग होने वाले किसी भी विधायक को तत्काल अयोग्यता का सामना करना पड़ेगा और उन्हें नए सिरे से सार्वजनिक जनादेश (चुनाव) प्राप्त करने हेतु बाध्य होना पड़ेगा।
निष्कर्ष
दसवीं अनुसूची का विद्यमान दुरुपयोग इसकी पुष्टि करता है, कि दल-बदल विरोधी ढाँचा एक अवसरवादी नंबर गेम में बदल गया है। चुनावी अखंडता की रक्षा के लिए, भारत को विधायी विलय की छूट को पूरी तरह से समाप्त करना चाहिए तथा स्वतंत्र न्यायाधिकरणों की स्थापना करनी चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि निर्वाचित प्रतिनिधि उन्हें चुनने वाले मतदाताओं के प्रति पूरी तरह जवाबदेह रहें।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. दल-बदल विरोधी कानून निर्वाचित सदस्यों को अपनी राजनीतिक संबद्धता बदलने से रोककर सरकारों की स्थिरता बनाए रखने का प्रयास करता है। हालाँकि, कुछ आलोचकों का तर्क है कि यह अंतःकरण की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करके संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांत पर चोट करता है। विस्तार से चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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