संदर्भ:
जून 2026 में नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक सहकारी संघवाद में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सिद्ध हुई, जिसमें प्रधानमंत्री ने नीचे से ऊपर की ओर आर्थिक योजना को संरचनात्मक रूप से बदलने के लिए सूक्ष्म, जिला-स्तरीय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) अनुमानों का आह्वान किया।
आर्थिक मापन में संरचनात्मक बदलाव:
- ऊपर से नीचे (top-down) के पूर्वाग्रह को समाप्त करना: दशकों से, भारतीय आर्थिक नियोजन प्रक्रिया ने यह मान लिया था, कि राष्ट्रीय विकास स्वाभाविक रूप से ऊपर से नीचे की ओर पहुँचेगा; जिला-स्तरीय जीडीपी कुल राष्ट्रीय योग से ध्यान हटाकर जमीनी स्तर के आर्थिक आधारों पर केंद्रित करके इसे औपचारिक रूप से चुनौती देती है।
- उत्पादन में विद्यमान असमानताएँ: एसडीजी इंडिया इंडेक्स का डेटा व्यापक क्षेत्रीय असमानता को दर्शाता है, जिसमें शीर्ष 100 जिले भारत के कुल उत्पादन में लगभग 40% का योगदान करते हैं, जबकि निचले 400 जिले 15% से भी कम का योगदान करते हैं।
- कार्यप्रणाली संबंधी त्रुटियों को सुधारना: वर्तमान उप-राष्ट्रीय डेटा अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है; स्थानीय अनुमान अक्सर राज्य-स्तरीय गुणांकों को केवल नीचे की ओर अनुमानित करके गलत तरीके से प्राप्त किए जाते हैं, जिससे वास्तविक समय में जिले के प्रदर्शन में गंभीर डेटा खामियाँ रह जाती हैं।
स्थानीयकृत डेटा का रणनीतिक मूल्य:
- निर्यात केंद्रों को क्रियान्वित करना: ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) पहल के माध्यम से जिलों को वैश्विक निर्यात केंद्रों में बदलने का केंद्रीय दृष्टिकोण प्रत्येक जिले द्वारा वास्तव में क्या उत्पादित किया जाता है, इसके सटीक, डेटा-समर्थित ज्ञान के बिना सफल नहीं हो सकता।
- राजकोषीय हस्तांतरण को सुदृढ़ करना: जबकि 15वें और 16वें वित्त आयोगों ने जिला प्रशासनों को सीधे संसाधन हस्तांतरण का आग्रह किया था, जिला जीडीपी ढाँचे द्वारा प्रदान की गई स्थानीय आवश्यकताओं की स्पष्ट तस्वीर के बिना वित्तीय पूँजी अक्सर अप्रभावी रूप से बिखर जाती है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाना: भारत की विशाल युवा आबादी को एक उत्पादक कार्यबल में बदलने के लिए स्थानीयकृत रणनीति की आवश्यकता होती है, क्योंकि जिले वे प्राथमिक स्थान हैं जहाँ उद्योग संचालित होते हैं, ऋण का अवशोषण तथा श्रम प्रवसन होता है।
कार्यप्रणाली संबंधी चुनौतियाँ तथा संस्थागत बाधाएँ:
- अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की पहेली: कृषि, छोटे व्यापार, निर्माण और घरेलू सेवाओं जैसे अत्यधिक असंगठित क्षेत्रों की सटीक गणना करना, डेटा संग्रह के लिए सबसे तात्कालिक बाधा बनी हुई है।
- प्रशासनिक क्षमता की कमी: अधिकांश जिलों में व्यापक आय अनुमान के लिए आवश्यक अत्यधिक जटिल डेटा बिंदुओं का एकत्रण, सत्यापन और व्यवस्थित रूप से संसाधित करने की आंतरिक क्षमता का अभाव है।
- संस्थागत सामंजस्य की कमी: जमीनी स्तर पर एक संरचनात्मक अलगाव बना हुआ है, जहाँ नीति आयोग, राज्य-स्तरीय नीति इकाइयाँ और जिला योजना समितियाँ नियमित रूप से एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करने में विफल रहती हैं।
चार-स्तरीय सुधार फ्रेमवर्क
- मापन (Measurement): सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) तथा अपडेटेड आधार-वर्ष दिशानिर्देशों का उपयोग करने वाले पर्याप्त कर्मचारियों से युक्त राज्य सांख्यिकीय निदेशालयों के नेतृत्व में एक नीचे से ऊपर (bottom-up) का डेटा आर्किटेक्चर विकसित करना।
- क्षमता (Capacity): क्षेत्रीय प्राथमिकता और डेटा सत्यापन में कर्मियों को प्रशिक्षित करने के लिए जिला-स्तरीय प्रशासनिक तंत्र में भारी निवेश।
- सामंजस्य (Coherence): सुचारू लंबवत (vertical) और क्षैतिज (horizontal) नीति निष्पादन सुनिश्चित करने के लिए, योजना नेटवर्क के सभी तीन स्तरों में कठोर परिचालन संबंध निर्मित करना।
- बाह्य दृष्टिकोण (Outward imagination): व्यक्तिगत जिलों को भारत के अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक जुड़ाव और व्यापार के अवसरों के लिए आधारभूत इकाइयों के रूप में स्पष्ट रूप से मानना।
निष्कर्ष:
2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ‘ट्रिकल-डाउन’ सिद्धांत से डेटा-समर्थित स्थानीयकरण की ओर बढ़ने की आवश्यकता है; जिला-स्तरीय जीडीपी आर्थिक उत्पादन के साथ-साथ मानव कल्याण का मापन, ट्रैकिंग तथा ऊपर उठाने के लिए एक अनिवार्य प्रारंभिक बिंदु के रूप में कार्य करती है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. “जिला स्तर पर आर्थिक विकास को मापना विकसित भारत@2047 के दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए एक अनिवार्य प्रारंभिक बिंदु है।” भारत के टॉप-डाउन आर्थिक मापन में ऐतिहासिक त्रुटियों के आलोक में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। |