संदर्भ
हाशिए पर मौजूद समुदायों के बारे में बार-बार यह आरोप लगाया जाता है कि वे “पीड़ित होने का कार्ड (victim card)” खेलकर आगे बढ़ते हैं। यह धारणा इतिहास और संवैधानिक नैतिकता दोनों की गहरी गलतफहमी को दर्शाती है।
पीड़ितता बनाम संवैधानिक न्याय (Victimhood vs Constitutional Justice)
- दलित आवाज़ को गलत रूप में प्रस्तुत करना: दलित विमर्श को “पीड़ित मानसिकता” कहकर खारिज करना संरचनात्मक भेदभाव को नजरअंदाज करता है और समानता की मांग को अवैध ठहराता है।
- संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality): यह संविधान के मूल्यों, सिद्धांतों और भावना को बनाए रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, भले ही वे प्रचलित सामाजिक परंपराओं, बहुसंख्यक विचारों, या व्यक्तिगत विश्वासों के विरोध में हों।
- लोकतंत्र में, अन्याय की व्याख्या को सुधार और संस्थागत जवाबदेही की शुरुआत के रूप में मान्यता प्रदान की जाती है।
दासता बनाम अस्पृश्यता: अंबेडकर का दृष्टिकोण
- उत्पीड़न का स्वरूप: डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने अमेरिका में अश्वेत लोगों के उत्पीड़न (दासता) और भारत में दलितों के उत्पीड़न (अस्पृश्यता) के बीच विद्यमान अंतर का उल्लेख किया।
- दासता (Slavery): यद्यपि यह दमनकारी था, लेकिन कानूनी उन्मूलन या सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से स्वतंत्रता की सैद्धांतिक संभावना मौजूद थी।
- अस्पृश्यता (Untouchability): अंबेडकर ने जाति व्यवस्था को “क्रमबद्ध असमानता (graded inequality)” कहा—एक कठोर पदानुक्रम जिसमें व्यक्ति जन्म से ही निश्चित सामाजिक स्थिति में बंधा रहता है और सामाजिक गतिशीलता की संभावना बहुत कम होती है।
- गहरा सामाजिक समावेशन: अस्पृश्यता धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं में गहराई से समाहित है, जिससे दीर्घकालिक अलगाव, कलंक और बहिष्कार उत्पन्न होता है।
- आरक्षण का उद्देश्य: आरक्षण कोई दान या गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) का एक उपकरण है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित समुदायों को समान नागरिकता और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
उच्च संस्थानों में प्रतिनिधित्व
- संयुक्त राज्य अमेरिका: हार्वर्ड विश्वविद्यालय में लगभग 25% संकाय सदस्य अल्पसंख्यक समूहों (ब्लैक, हिस्पैनिक, एशियाई) से आते हैं, फिर भी संस्थान विश्व-स्तरीय गुणवत्ता बनाए रखता है।
- भारत: इसके विपरीत, शीर्ष IIT संस्थानों में लगभग 98% प्रोफेसर सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त जातियों से संबंधित हैं।
- संस्थागत बाधाएँ: यह असमानता रिक्तियों के रोस्टर की जटिलता और “नॉट फाउंड सूटेबल (NFS)” क्लॉज के कारण भी होती है, जिसे अक्सर आरक्षित सीटों को खाली रखने के लिए उपयोग किया जाता है, भले ही उम्मीदवार लिखित परीक्षा पास कर लें।
कार्यबल में प्रतिनिधित्व और स्तरीकरण
- अमेरिका के आँकड़े: श्वेत अमेरिकी लगभग 61% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं और संघ स्तरीय रोजगार में 59% की हिस्सेदारी रखते हैं।
- काले अमेरिकी 18% जनसंख्या का हिस्सा हैं और नौकरियों में 12% हिस्सेदारी रखते हैं, जो व्यापक रूप से संतुलित प्रतिनिधित्व को दर्शाता है।
- भारत के आँकड़े: अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) मिलकर लगभग 80% जनसंख्या का गठन करते हैं, लेकिन केंद्रीय सरकारी सेवाओं में केवल 50% से थोड़ा अधिक हिस्सेदारी रखते हैं, जिससे 28% का प्रतिनिधित्व अंतर उत्पन्न होता है।
- स्तरीकरण की समस्या: आरक्षित वर्ग के अधिकांश कर्मचारी ग्रुप C और D पदों (जैसे चपरासी, सफाईकर्मी, क्लर्क) में केंद्रित हैं।
- ग्रुप A सेवाओं (जैसे IAS, IPS और वरिष्ठ सेवाएँ) में उनका प्रतिनिधित्व काफी कम है, जो राज्य व्यवस्था के भीतर “ग्लास सीलिंग” को दर्शाता है।
सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र में सकारात्मक भेदभाव
- अमेरिकी मॉडल: सकारात्मक कार्रवाई निजी क्षेत्र तक भी विस्तारित होती है, जहाँ कंपनियों को संघीय सरकार के अनुबंधों के लिए अर्हता प्राप्त करने हेतु अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आवश्यक होता है।
- भारतीय मॉडल: भारत में आरक्षण नीति मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित है, जबकि निजी क्षेत्र में इसका प्रभाव बहुत सीमित है।
- निजीकरण का प्रभाव: जैसे-जैसे सार्वजनिक क्षेत्र छोटा हो रहा है, वैसे-वैसे अनिवार्य सामाजिक समावेशन के अवसर भी कम हो रहे हैं।
संरचनात्मक शैक्षिक असमानता
- प्रारंभिक शिक्षा में असमानता: सामाजिक असमानता की शुरुआत पहले होती है क्योंकि कई हाशिए पर रहने वाले बच्चे कम संसाधन वाले सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जिससे उच्च शिक्षा या रोजगार के अवसरों से पहले ही सीखने में अंतर उत्पन्न हो जाता है।
- पीढ़ीगत असमानता: भूमि स्वामित्व, साक्षरता, संपत्ति वितरण और पेशेवर प्रतिनिधित्व में लगातार पीढ़ीगत असमानताएँ बनी हुई हैं।
निष्कर्ष
आरक्षण एक सुधारात्मक तंत्र है, जो ऐसी समाज के लिए निर्मित किया गया है जहाँ सामाजिक पूंजी और नेटवर्क जीवन के परिणाम तय करते हैं।
- भारत की वास्तविक प्रगति के लिए ठोस समानता (Tangible Parity) आवश्यक है—जहाँ शिक्षा, रोजगार और संस्थागत अधिकार में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के वास्तविक अनुपात को दर्शाए।
- एक बार जब यह समानता प्राप्त हो जाती है, तो “पीड़ित होने” पर चल रही बहस अपने आप समाप्त हो जाएगी।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारतीय संविधान में सकारात्मक भेदभाव की नीतियाँ, जैसे आरक्षण, हाशिए पर स्थित समुदायों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक और संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने के साधन के रूप में परिकल्पित की गई थीं। इस संदर्भ में, उच्च शिक्षा तथा सार्वजनिक संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के पर्याप्त प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने में आने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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