भारत की महिला किसानों के लिए अधिकार, न्याय और कार्रवाई

भारत की महिला किसानों के लिए अधिकार, न्याय और कार्रवाई 7 Mar 2026

संदर्भ

8 मार्च 2026 को विश्वभर की महिलाएँ और लड़कियाँ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर समान अधिकार और न्याय की मांग करेंगी। यह वर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2026 को “महिला किसान का अंतरराष्ट्रीय वर्ष” के रूप में भी मनाया जा रहा है।

कृषि का स्त्रीकरण (Feminisation of Agriculture) और उससे संबंधित चुनौतियाँ

  • अर्थ: कृषि में महिलाओं की भागीदारी और जिम्मेदारी का बढ़ना, क्योंकि पुरुष रोज़गार के लिए गैर-कृषि क्षेत्रों, खासकर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
  • मान्यता का अभाव: हालाँकि महिलाएँ खेती के अधिकांश कार्य करती हैं—बुवाई और रोपाई से लेकर कटाई और मजदूर प्रबंधन तक—फिर भी उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में “किसान” के रूप में लगभग कभी मान्यता नहीं प्राप्त हुई है।
  • “टाइटल ट्रैप” (Title Trap): किसान की कानूनी पहचान मुख्यतः भूमि स्वामित्व से जुड़ी होती है, लेकिन अधिकांश कृषि भूमि पुरुषों के नाम पर पंजीकृत होती है।
  • पितृसत्तात्मक उत्तराधिकार व्यवस्था: हालाँकि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 बेटियों को समान संपत्ति अधिकार प्रदान करता है, लेकिन सामाजिक मान्यताएँ, कानूनी जागरूकता की कमी और प्रशासनिक बाधाएँ अभी भी कई महिलाओं को भूमि का स्वामित्व प्राप्त करने से रोकती हैं।

बहिष्करण का श्रृंखलाबद्ध प्रभाव (Domino Effect of Exclusion)

  • संस्थागत ऋण तक सीमित पहुँच: भूमि के स्वामित्व के प्रमाण (जमानत) के अभाव में महिला किसानों को बैंक ऋण और औपचारिक क्रेडिट प्राप्त करने में विभिन्न कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
  • बीमा और सब्सिडी से बहिष्कार: फसल बीमा, सिंचाई योजनाओं और कृषि सब्सिडी का लाभ आमतौर पर पंजीकृत भूमि स्वामी (अक्सर पुरुष) को मिलता है, जिससे महिलाओं की पहुँच सीमित हो जाती है।
  • अदृश्य और कम आँका गया श्रम: किसान के रूप में औपचारिक पहचान न होने के कारण कृषि-खाद्य प्रणाली में महिलाओं का योगदान नीतियों और आँकड़ों में अक्सर अनदेखा और कम मूल्यांकित रह जाता है।

पोषण विरोधाभास और महिला किसानों पर दोहरा बोझ

  • कार्य का दोहरा बोझ: महिला किसान उत्पादक कार्य (कृषि श्रम) के साथ-साथ प्रजनन/घरेलू संबंधी जिम्मेदारियाँ (जैसे बच्चों की देखभाल) भी निभाती हैं, जिससे उनका कार्यभार अत्यधिक बढ़ जाता है।
  • कृषि में कठिन श्रम (Drudgery): महिलाओं के अनुकूल कृषि उपकरणों और श्रम-बचाने वाली तकनीकों की कमी के कारण उन्हें अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है।
  • पोषण संबंधी विरोधाभास: भोजन उत्पादन में केंद्रीय भूमिका होने के बावजूद कई ग्रामीण महिलाएँ कुपोषण और एनीमिया से पीड़ित रहती हैं।
    • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) महिलाओं में उच्च एनीमिया स्तर को “मूक आपात स्थिति (Silent Emergency)” बताता है।
  • पीढ़ीगत कुपोषण का चक्र: कुपोषित माताएँ अक्सर कम वजन वाले बच्चों को जन्म देती हैं, जिससे बौनेपन (stunting) और लगातार कुपोषण का चक्र बना रहता है। वर्त्तमान सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), जो मुख्यतः गेहूँ और चावल पर केंद्रित है, इस समस्या को पूरी तरह हल नहीं कर पाती।

कृषि में महिलाओं के लिए एम. एस. स्वामीनाथन के 4Cs:

यह कृषि मूल्य श्रृंखला के सभी चरणों में महिलाओं की भूमिका पर बल देता है— संरक्षण (Conservation), खेती/उत्पादन (Cultivation), उपभोग (Consumption) और व्यावसायीकरण (Commercialisation)।

चार प्राथमिक समाधान (The Four Priority Solutions)

  • किसान की नई परिभाषा: नीतियों में किसान की पहचान केवल भूमि स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक कृषि कार्य करने के आधार पर की जानी चाहिए।
    • इस परिभाषा में भूमिहीन मजदूरों और बटाईदार किसानों (Tenant farmers) को भी शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही लिंग-आधारित (Gender-Disaggregated) आँकड़ों का उपयोग किया जाए ताकि नीतियों में महिला किसानों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जा सके।
  • सुरक्षित भूमि अधिकार (Secure Land Rights): सरकार को पति-पत्नी के संयुक्त भूमि स्वामित्व (Joint Spousal Titles) को बढ़ावा देना चाहिए और महिलाओं के नाम पर संपत्ति पंजीकरण के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए।
    • सफल मॉडलों जैसे केरल का कुदुम्बश्री मॉडल, जिसके तहत महिला समूह खेती के लिए भूमि पट्टे पर लेते हैं, को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  •  पोषण-संवेदनशील कृषि (Nutrition-Sensitive Agriculture): सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का विस्तार करके उसमें मिलेट्स (श्री अन्न), दालें और अन्य प्रोटीन स्रोत को शामिल किया जाना चाहिए।
  • सरकारों को आंगनवाड़ी और मध्याह्न भोजन योजनाओं के लिए सब्जियाँ और दालें सीधे महिला किसानों से खरीदनी चाहिए, साथ ही किचन गार्डन और महिलाओं द्वारा संचालित बीज बैंक को बढ़ावा देना चाहिए।
  • तकनीक और विस्तार सेवाओं तक पहुँच (Tech and Extension Access): शारीरिक श्रम कम करने के लिए सस्ती और महिलाओं के अनुकूल कृषि मशीनरी की आवश्यकता है।
    • साथ ही कॉल सेंटर, मौसम संबंधी डिजिटल प्रशिक्षण और बाज़ार जानकारी जैसी विस्तार सेवाएँ महिलाओं के लिए सुलभ बनाई जानी चाहिए ताकि डिजिटल विभाजन (Digital Divide) को कम किया जा सके।

निष्कर्ष

यदि महिलाओं को अधिकार, ज्ञान और संस्थागत सहयोग प्रदान किया जाए, तो वे जलवायु-सहिष्णु, जैव विविधता से समृद्ध और पोषण-संवेदनशील कृषि प्रणाली की प्रमुख प्रेरक बन सकती हैं।

  • “अधिकार, न्याय और कार्रवाई” को सुनिश्चित करना एक समानतापूर्ण और पोषित भारत के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत में कृषि और खाद्य प्रणालियों में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद महिला किसानों के पास अक्सर भूमि स्वामित्व और संस्थागत सहायता का अभाव होता है। भारत में महिला किसानों की अदृश्यता और बहिष्करण के लिए जिम्मेदार संरचनात्मक कारकों पर चर्चा कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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