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शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम एवं सामाजिक समावेशन

शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम एवं सामाजिक समावेशन 29 Apr 2026

संदर्भ:

शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009, जो अनुच्छेद 21A को लागू करता है, का उद्देश्य निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है, साथ ही सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना है, विशेषकर निजी स्कूलों में 25% आरक्षण (धारा 12(1)(c)) के माध्यम से।

शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के बारे में

  • शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 अनुच्छेद 21A को लागू करता है, जो 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।
  • धारा 12(1)(c) — अधिनियम का मुख्य आधार
    • प्रत्येक निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल को प्रवेश स्तर (कक्षा 1/केजी) में कम से कम 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूहों के लिए आरक्षित करनी होती हैं।
  • अनुसंधान निष्कर्ष: अध्ययन (जैसे राव एवं गौतम) दर्शाते हैं कि मिश्रित कक्षाओं का स्कूल के प्रदर्शन या अनुशासन पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता; बल्कि, ये आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों के जीवन परिणामों में सुधार करती हैं, जिसमें 90% तक की प्रतिधारण दर (विद्यालय में बने रहने की दर) देखी गई है।

सामाजिक समावेशन का दर्शन

  • RTE का मूल उद्देश्य एकीकृत कक्षाओं को बढ़ावा देना है, जहाँ विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चे साथ में पढ़ते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय (2026) ने स्पष्ट किया कि यह कोई दान का कार्य नहीं है, बल्कि समानता की स्थिति और अवसर सुनिश्चित करने के लिए एक सुनियोजित संवैधानिक रणनीति है, जो सहानुभूति, गरिमा और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है।
  • सामाजिक पूँजी पर प्रभाव: प्रतिष्ठित निजी स्कूलों तक पहुँच से वंचित बच्चों को सहपाठी नेटवर्क और उच्च आकांक्षाओं के माध्यम सेसामाजिक पूंजी” बनाने का अवसर मिलता है, जिससे वे गरीबी के चक्र को तोड़ने में सक्षम होते हैं—यह अवधारणा पियरे बॉर्दियू से जुड़ी हुई है।

महत्त्व

  • सामाजिक एकीकरण: मिश्रित कक्षाएँ बच्चों में समानता, सहानुभूति और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती हैं।
  • असमानता में कमी: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और नेटवर्क तक पहुँच से सामाजिक गतिशीलता बढ़ती है।
  • संवैधानिक दायित्व: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे राज्य के दायित्व के रूप में मान्यता दी गई है, न कि दान के रूप में।

चुनौतियाँ

  • सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढाँचे की कमी, जिससे निजी स्कूलों की ओर झुकाव बढ़ता है।
  • निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति में देरी।
  • छिपी हुई लागत (यूनिफॉर्म, किताबें, परिवहन) गरीब परिवारों पर बोझ डालती हैं।
  • असमान कार्यान्वयन और कमजोर शिकायत निवारण प्रणाली।
  • निजी संस्थानों का विरोध।

आगे की राह 

  • कठोर नियम और दंड: केवल नैतिक अपील पर्याप्त नहीं; कठोर कानूनी अनुपालन आवश्यक है।
  • डिजिटल प्रवेश प्रणाली (MIS): राजस्थान, गुजरात, दिल्ली मॉडल को पूरे देश में पारदर्शिता के लिए लागू किया जाए।
  • समय पर प्रतिपूर्ति एवं छिपी हुई लागत का वहन: सरकार को निजी स्कूलों को समय पर भुगतान करना चाहिए तथा यूनिफॉर्म/किताबों का खर्च राज्य को उठाना चाहिए।

निष्कर्ष

RTE समावेशी विकास का एक शक्तिशाली साधन है, लेकिन इसकी सफलता प्रभावी कार्यान्वयन और सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर निर्भर करती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) को अक्सर सार्वजनिक शिक्षा से राज्य की वापसी के रूप में गलत समझा जाता है, जबकि वास्तव में यह सामाजिक एकीकरण के लिए एक सुविचारित संवैधानिक रणनीति है। सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम एवं सामाजिक समावेशन

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