संदर्भ:
भारत में जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) निर्माण के लिए शहरी शासन को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि शहरों की वर्त्तमान स्थिति नीति के उद्देश्यों और जमीनी वास्तविकताओं के बीच गहरे अंतर को दर्शाती है।
रहने योग्य शहरों की परिकल्पना
- रहने योग्य शहरों की परिभाषा: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-2026 जीवनयोग्य भारतीय शहरों की आवश्यकता पर बल देता है, जहाँ रहने योग्य की मुख्य कसौटी यह होती है कि एक शहर बाढ़ और हीटवेव जैसी जलवायु संबंधी आघातों का सामना करने में सक्षम हो।
- विद्यमान नीतियाँ: जलाशयों के पुनर्जीवन, हीटवेव एक्शन प्लान के क्रियान्वयन, सतत गतिशीलता (इलेक्ट्रिक वाहनों) को बढ़ावा देने, अपशिष्ट प्रबंधन तथा जलवायु-सहनशील अवसंरचना निर्माण जैसे क्षेत्रों में नीतिगत प्रयास किए गए हैं।
वर्त्तमान संकट और शासन की विफलता
- सख़्त/भयानक वास्तविकता: अनेक शहरी जलवायु नीतियों के बावजूद, दिल्ली में प्रत्येक 7 में से लगभग 1 मृत्यु वायु प्रदूषण से जुड़ी है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत के 40% शहर “डे ज़ीरो” भूजल संकट का सामना कर सकते हैं, जो शहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
- डे ज़ीरो वह स्थिति है जब किसी शहर का जलस्तर इतना गिर जाता है कि नलों से जल आपूर्ति बंद करनी पड़ती है और जल को आपातकालीन वितरण केंद्रों के माध्यम से राशन/वितरण करना पड़ता है।
- अस्वस्थ शहरी शासन: सबसे बड़ी बाधा कमजोर शहरी शासन है, जो वित्तीय स्वायत्तता और संस्थागत जवाबदेही की कमी से चिह्नित होता है, और जो सहनशीलता नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन को रोकता है।
“3 Fs” की कमी और विधायी अंतर
- अपूर्ण संविभाजन: हालाँकि 74वें संवैधानिक संशोधन ने शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को 18 कार्य सौंपे हैं, लेकिन प्रभावी संविभाजन अभी भी कमजोर है।
- इसके परिणामस्वरूप, शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) अभी भी 3 F में घाटों का सामना कर रहे हैं: धन (Funds), कार्य (Functions), और कार्मिक(Functionaries)।
- निर्णय लेने की सीमित शक्ति: भूमि उपयोग, जल आपूर्ति और जलवायु-सहनशील योजना जैसे मुख्य क्षेत्रों में ULBs केवल क्रियान्वयन एजेंसियों के रूप में कार्य करते हैं।
- नीति और विनियामक शक्तियाँ राज्य सरकारों या स्वायत्त एजेंसियों के पास केंद्रित रहती हैं।
- राजकोषीय बाधाएँ: वर्ष 2050 तक जलवायु-सहनशील अवसंरचना हेतु भारतीय शहरों को लगभग 260 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। किंतु ULBs के पास पर्याप्त कराधान अधिकार नहीं हैं और वे राज्य सरकारों के अनुदानों पर निर्भर हैं।
बाजार-आधारित समाधानों की विफलता
- नगरपालिका बांड की सीमित सफलता: वित्तपोषण उपकरण के रूप में प्रचारित होने के बावजूद, लगभग 6,000 शहरी स्थानीय निकायों में से केवल 21 ने ही (नवंबर 2025 तक) नगरपालिका बॉन्ड जारी किए, जिनकी कुल कीमत केवल $42 मिलियन थी।
- उदाहरण: नगरपालिका बॉन्ड के माध्यम से जुटाए गए $42 मिलियन की राशि, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के $8 अरब वार्षिक व्यय की तुलना में नगण्य है।
- SPV मॉडल की अप्रभाविता: स्मार्ट सिटी मिशन के तहत विशेष उद्देश्य वाहनों (SPVs) का उद्देश्य निजी पूंजी जुटाना था, लेकिन ये अभी भी मुख्यतः केंद्र और राज्य की वित्तीय सहायता पर निर्भर हैं, और वित्तीय स्वायत्तता सुनिश्चित करने में असफल रहे हैं।
वैश्विक तुलना और सीख
- चीन का “स्पंज सिटीज” मॉडल: चीन ने लगभग 560 अरब डॉलर शहरी अवसंरचना में निवेश किए हैं, जिसमें बाढ़ शमन हेतु “स्पंज सिटीज” शामिल हैं, जो वर्षाजल अवशोषण और जलवायु सहनशीलता को बढ़ावा देती हैं।
- भूमि-आधारित राजस्व मॉडल: चीनी स्थानीय सरकारों के पास शहरी भूमि का स्वामित्व और विकास अधिकार होते हैं, जिससे वे भूमि पट्टे और बिक्री से राजस्व अर्जित कर सकती हैं।
- सावधानीपूर्ण सीख: हालाँकि, स्थानीय सरकारों द्वारा अत्यधिक ऋण ने वित्तीय जोखिम उत्पन्न किए हैं, जो यह दर्शाता है कि ULBs को सशक्त बनाते समय अस्थिर ऋण संचय से बचना आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत की जलवायु सहनशीलता की चुनौती मूलतः शासन की चुनौती है। जब तक शहरी स्थानीय निकायों को वास्तविक रूप से ‘फंड, कार्य और कार्मिक’ का विकेंद्रीकरण नहीं किया जाएगा, तब तक शहर बढ़ते जलवायु जोखिमों का प्रभावी ढंग से सामना करने में सक्षम नहीं होंगे।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies) की भूमिका का मूल्यांकन करें कि वे जलवायु-सहनशील और समान शहरी विकास सुनिश्चित करने में कैसे योगदान देते हैं। शहरी जवाबदेही और क्षमता को मजबूत करने के लिए आवश्यक शासन और वित्तीय सुधारों पर चर्चा करें।
(15 अंक, 250 शब्द)
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