संदर्भ
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और एलएनजी (LNG) के लिए विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स (मार्ग अवरोध बिंदुओं) में से एक बना हुआ है। भारत के लिए, जो पश्चिम एशियाई ऊर्जा आपूर्ति पर अधिक निर्भर है, इस मार्ग में कोई भी व्यवधान ऊर्जा सुरक्षा, मुद्रास्फीति प्रबंधन, शिपिंग लागत, व्यापार स्थिरता तथा रणनीतिक स्वायत्तता के लिए गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
समुद्री शक्ति तथा वैश्विक समृद्धि
- समुद्री मार्गों पर नियंत्रण: जो देश प्रमुख समुद्री मार्गों को नियंत्रित करते हैं, वे व्यापार, संसाधनों, नौसैनिक गतिशीलता तथा वैश्विक शक्ति पर प्रभाव प्राप्त करते हैं।
- ऐतिहासिक उदाहरण: यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और चीन जैसे देश यह दर्शाते हैं कि कैसे समुद्री शक्ति आर्थिक उत्थान तथा रणनीतिक प्रभाव को आकार दे सकती है।
- भारत की समुद्री स्थिति: भारत हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के केंद्र में स्थित है, जो पश्चिम एशिया, अफ्रीका, यूरोप और पूर्वी एशिया को जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों के समीप है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्त्व
- महत्त्वपूर्ण चोकपॉइंट: हॉर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है।
- ऊर्जा पारगमन मार्ग: यह पश्चिम एशिया से वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों, एलएनजी और एलपीजी के संचलन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- सड़क भूगोल (संकीर्ण भूगोल): इसके संकीर्ण नौवहन चैनल इसे सैन्य तनाव, नौसैनिक नाकेबंदी, समुद्री डकैती के जोखिम, माइनिंग (सुरंगें बिछाने), बीमा दरों में उछाल और शिपिंग देरी के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
भारत की संवेदनशीलता
- ऊर्जा आयात निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल और गैस की आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे पश्चिम एशियाई आपूर्ति मार्ग उसकी ऊर्जा टोकरी के लिए केंद्रीय बन जाते हैं।
- मुद्रास्फीति का प्रभाव: तेल और गैस की आपूर्ति में किसी भी व्यवधान से ईंधन की कीमतें, परिवहन लागत, उर्वरक लागत तथा समग्र मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- शिपिंग निर्भरता: भारत के पास भारतीय ध्वज वाले वाणिज्यिक शिपिंग क्षमता सीमित है, और वह व्यापार संचलन के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से के लिए विदेशी जहाजों पर निर्भर रहता है।
- भारतीय नाविकों का जोखिम: विदेशी जहाजों पर काम करने वाले भारतीय नाविकों को फारस की खाड़ी, लाल सागर, अदन की खाड़ी और सोमालिया क्षेत्र जैसे संघर्ष-प्रवण तथा समुद्री डकैती-प्रवण गलियारों में जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
- सीमित रणनीतिक पेट्रोलियम बफर: भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPRs) बनाए हैं, लेकिन संभावित दीर्घकालिक व्यवधानों की तुलना में इसकी मात्रा सीमित है।
- भाड़ा और बीमा झटके: चोकपॉइंट्स के आसपास भू-राजनीतिक तनाव माल ढुलाई दरों (freight rates), समुद्री बीमा लागत और वितरण अनिश्चितता को बढ़ाता है।
व्यापक रणनीतिक चिंताएँ
- चोकपॉइंट्स का शस्त्रीकरण: समुद्री चोकपॉइंट्स का उपयोग संघर्ष या प्रतिबंधों के दौरान बाध्यकारी (Coercion) साधनों के रूप में किया जा सकता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता में कमी: एक ही समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता पश्चिम एशियाई संकट के दौरान भारत के नीतिगत लचीलेपन को कम करती है।
- आपूर्ति-शृंखला की संवेदनशीलता: हॉर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान से ऊर्जा, उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स, शिपिंग तथा औद्योगिक उत्पादन सभी प्रभावित हो सकते हैं।
- बाह्य शक्तियों की प्रतिस्पर्धा: खाड़ी क्षेत्र में ईरान, खाड़ी राजशाही, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और यूरोपीय शक्तियों सहित कई देश शामिल हैं, जिसके कारण भारत को राजनयिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता होती है।
अन्य देशों से सबक
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का मार्ग विविधीकरण: यूएई ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी अनन्य निर्भरता को कम करने के लिए, पाइपलाइन अवसंरचना का विकास किया है।
- वैकल्पिक निकासी मार्ग: संकीर्ण चोकपॉइंट्स से बाहर स्थित पाइपलाइनें तथा बंदरगाह समुद्री संकट के दौरान संवेदनशीलता को कम करते हैं।
- रणनीतिक भंडारण: प्रमुख शक्तियाँ अस्थायी आपूर्ति व्यवधानों के प्रबंधन के लिए बड़े आपातकालीन ऊर्जा भंडार बनाए रखती हैं।
भारत की मौजूदा शक्तियाँ
- रणनीतिक स्थिति: भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता (net security provider) के रूप में कार्य करने की अनुमति देती है।
- कुशल नाविक आधार: भारतीय नाविक विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी हैं, और समुद्री जनशक्ति तथा विदेशी मुद्रा प्रवाह में योगदान देते हैं।
- बढ़ती नौसैनिक क्षमता: भारतीय नौसेना समुद्री डकैती विरोधी अभियानों, निकासी मिशनों, समुद्री डोमेन जागरूकता और समुद्री मार्गों की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- पश्चिम एशिया कूटनीति: भारत ईरान, सऊदी अरब, यूएई, कतर, ओमान और इजराइल के साथ संबंध बनाए रखता है, जो उसे महत्त्वपूर्ण राजनयिक लचीलापन प्रदान करता है।
आगे की राह
- ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं का विविधीकरण: भारत को कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी के स्रोतों में विविधता लाकर किसी भी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना चाहिए।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार: कच्चे तेल, गैस और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए आपातकालीन भंडारण क्षमता का विस्तार किया जाना चाहिए।
- वैकल्पिक गलियारों को सुदृढ़ करना: भारत को चाबहार बंदरगाह, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), और मध्य एशिया, रूस तथा यूरोप के साथ कनेक्टिविटी को मजबूत करना चाहिए।
- भारतीय ध्वज वाले शिपिंग को बढ़ाना: विदेशी जहाजों और भाड़े की अस्थिरता पर निर्भरता कम करने के लिए, भारत को मजबूत घरेलू शिपिंग क्षमता की आवश्यकता है।
- खाड़ी देशों के साथ साझेदारी का विकास: भारत को ओमान, यूएई, सऊदी अरब और कतर के साथ समुद्री तथा ऊर्जा सहयोग को मजबूत करना चाहिए।
- संतुलित ईरान नीति बनाए रखना: भारत को प्रतिबंधों से संबंधित बाधाओं का प्रबंधन करते हुए चाबहार, मध्य एशिया कनेक्टिविटी तथा क्षेत्रीय संतुलन के लिए ईरान के साथ संबंध बनाए रखना चाहिए।
- समुद्री डोमेन जागरूकता में सुधार: वास्तविक समय की ट्रैकिंग, नौसैनिक समन्वय और खुफिया जानकारी साझा करने से वाणिज्यिक शिपिंग की रक्षा करने में सहायता प्राप्त हो सकती है।
- भारतीय नाविकों की सुरक्षा: उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में भारतीय नाविकों के लिए कांसुलर सहायता, नौसैनिक सुरक्षा तथा संकट-प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
- ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाना: नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक गतिशीलता तथा घरेलू ऊर्जा उत्पादन के माध्यम से जीवाश्म ईंधन आयात निर्भरता को कम करने से दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
निष्कर्ष
हॉर्मुज जलडमरूमध्य केवल एक भौगोलिक मार्ग नहीं है, यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा संरचना का एक रणनीतिक दबाव बिंदु है। भारत को अपनी आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए ऊर्जा विविधीकरण, रणनीतिक भंडार, समुद्री क्षमता, वैकल्पिक गलियारों तथा संतुलित पश्चिम एशिया कूटनीति के माध्यम से प्रतिक्रिया देनी चाहिए, जो न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य के लिए भी आवश्यक है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. “हालिया हॉर्मुज जलडमरूमध्य की भू-राजनीति ने भारत की ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं में संवेदनशीलता को उजागर किया है।” यूएई के ‘शून्य हॉर्मुज निर्भरता मॉडल’ से सबक लेते हुए, समुद्री मार्गों में विविधता लाने की भारत की रणनीतिक आवश्यकता की चर्चा कीजिए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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