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भारत की डिजिटल संप्रभुता की चुनौती

भारत की डिजिटल संप्रभुता की चुनौती 23 Jun 2026

संदर्भ

हालिया घटनाएँ, जैसे चीनी-लिंक्ड सॉफ्टवेयर के माध्यम से भारतीय सीसीटीवी (CCTV) नेटवर्क से कथित समझौता और यूरोपीय संघ (EU) के प्रतिबंधों के कारण माइक्रोसॉफ्ट द्वारा नयारा एनर्जी (Nayara Energy) को डिजिटल एक्सेस (पहुँच) देने से इनकार करना, विदेशी-नियंत्रित डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर भारत की निर्भरता को उजागर करती हैं। इसने तकनीकी सुरक्षा, आर्थिक अनुकूलन तथा रणनीतिक स्वायत्तता संबंधी गंभीर चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं।

डिजिटल संप्रभुता के बारे में

  • अर्थ: डिजिटल संप्रभुता का अर्थ किसी राष्ट्र की विदेशी निगमों या बाह्य संप्रभु शक्तियों पर अत्यधिक निर्भरता के बिना अपने डिजिटल बुनियादी ढाँचे, डेटा, सॉफ्टवेयर प्रणाली, क्लाउड प्लेटफॉर्म, साइबर नेटवर्क तथा अन्य महत्त्वपूर्ण तकनीकों को नियंत्रित करने की क्षमता से है।
  • मूल विचार: यह सुनिश्चित करता है कि किसी देश की डिजिटल प्रणालियाँ विदेशी विधिक व्यवस्थाओं, कॉर्पोरेट निर्णयों या भू-राजनीतिक दबावों की बजाय घरेलू कानूनों, राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक प्राथमिकताओं द्वारा शासित हों।
  • प्रमुख घटक: डिजिटल संप्रभुता में डेटा स्टोरेज, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, साइबर सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल संचार प्लेटफॉर्म, ऑथेंटिकेशन (प्रमाणीकरण) प्रणाली, भुगतान नेटवर्क, रक्षा सॉफ्टवेयर और अन्य महत्त्वपूर्ण डिजिटल आपूर्ति शृंखलाओं इत्यादि पर नियंत्रण शामिल है।

भारत के लिए डिजिटल संप्रभुता का महत्त्व

  • रणनीतिक स्वायत्तता: विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भरता भू-राजनीतिक संघर्षों, प्रतिबंधों या राजनयिक दबाव के दौरान भारत की स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया को सीमित कर सकती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा: वर्तमान में रक्षा प्रणालियाँ तेजी से ‘सॉफ्टवेयर-परिभाषित’ होती जा रही हैं। विमान, मिसाइल प्रणाली, रडार नेटवर्क या निगरानी प्लेटफॉर्म्स में एम्बेडेड कोड (Embedded Code) पर विदेशी नियंत्रण संघर्ष के दौरान संवेदनशीलता या कमजोरियाँ उत्पन्न कर सकता है।
  • आर्थिक सुरक्षा: विदेशी-नियंत्रित क्लाउड, ईमेल, सहयोग तथा उत्पादकता प्लेटफॉर्म व्यावसायिक संचालन, विनिर्माण, व्यापार तथा वित्तीय लेनदेन को बाधित कर सकते हैं।
  • डेटा संप्रभुता: भले ही डेटा भौतिक रूप से भारत में संगृहीत हो, विदेशी क्लाउड कंपनियों को उनकी गृह सरकारों द्वारा विदेशी विधिक ढाँचे के तहत डेटा साझा करने हेतु बाध्य किया जा सकता है।
  • शासन की निरंतरता: यदि प्रतिबंधों, कॉर्पोरेट निर्णयों या भू-राजनीतिक विवादों के कारण पहुँच से इनकार कर दिया जाता है, तो विदेशी प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों पर आधारित महत्त्वपूर्ण सरकारी सेवाएँ बाधित हो सकती हैं।
  • तकनीकी प्रतिस्पर्धात्मकता: नवाचार क्षमता के निर्माण, घरेलू उद्यमों की रक्षा और दीर्घकालिक आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर नियंत्रण आवश्यक है।

चुनौतियों को उजागर करने वाले हालिया मुद्दे:

  • सीसीटीवी नेटवर्क उल्लंघन: चीनी सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म ‘EseeCloud’ के माध्यम से भारतीय सीसीटीवी नेटवर्क से समझौता होने की रिपोर्टों ने शत्रुतापूर्ण निगरानी तथा भारत की रणनीतिक रक्षा परिसंपत्तियों की जानकारी तक पहुँच के बारे में चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
  • नयारा एनर्जी की घटना: माइक्रोसॉफ्ट द्वारा नयारा एनर्जी के खिलाफ यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों को एकपक्षीय रूप से लागू करने के कारण कंपनी को कॉर्पोरेट ईमेल, सहयोग टूल और क्लाउड-संगृहीत डेटा तक पहुँच से वंचित कर दिया गया था।
  • कारगिल जीपीएस समस्या (Kargil GPS Denial): 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान, भारत को सटीक जीपीएस (GPS) सहायता प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, जिसने विदेशी-नियंत्रित रणनीतिक तकनीकों पर निर्भरता के परिचालन जोखिमों को उजागर किया था।

डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर विदेशी नियंत्रण संबंधी प्रमुख जोखिम:

  • बाह्य संप्रभु प्रभाव: विदेशी सरकारें प्रौद्योगिकी कंपनियों को सेवाएँ बंद करने, डेटा साझाकरण या महत्त्वपूर्ण प्रणालियों तक पहुँच बदलने के लिए प्रभावित या बाध्य कर सकती हैं।
  • परिचालन व्यवधान : डिजिटल उपकरणों तक पहुँच से इनकार करने से सरकारी कार्य निलंबित हो सकते हैं, व्यवसाय और विनिर्माण बाधित तथा रक्षा तैयारियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • सॉफ्टवेयर-आधारित संवेदनशीलता: आधुनिक युद्ध कोड पर निर्भर करता है। रक्षा सॉफ्टवेयर पर बाह्य नियंत्रण से लक्ष्य निर्धारण की सटीकता में कमी, परिचालन सीमा में कमी अथवा युद्धक्षेत्र की खुफिया जानकारी को परिवर्तित किया जा सकता है।
  • क्लाउड निर्भरता: विदेशी क्लाउड प्लेटफॉर्म्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता डेटा सुरक्षा, सेवा निरंतरता और भारतीय डिजिटल परिसंपत्तियों पर विधिक नियंत्रण के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती है।
  • आपूर्ति-श्रृंखला की संवेदनशीलता: विदेशी सेमीकंडक्टर्स, सॉफ्टवेयर, क्लाउड सेवाओं तथा संचार प्रणालियों पर निर्भरता भारत को भू-राजनीतिक तथा व्यावसायिक प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • साइबर सुरक्षा खतरे: निगरानी, संचार और प्रमाणीकरण प्रणालियों में उपयोग किए जाने वाले विदेशी-मूल के सॉफ्टवेयर तथा हार्डवेयर छिपे हुए बैकडोर और डेटा संवेदनशीलता उत्पन्न कर सकते हैं।

भारत की रणनीतिक स्थिति

  • शक्ति संक्रमण सिद्धांत : भारत की चुनौती को ‘पॉवर ट्रांजिशन थ्योरी’ के माध्यम से समझा जा सकता है। इस सिद्धांत से यह स्पष्ट होता है, कि एक स्थापित महाशक्ति (Hegemon) रणनीतिक समानता की ओर बढ़ते हुए एक उभरते राष्ट्र को बाधित करने का प्रयास कर सकती है।
  • उभरती शक्ति की संवेदनशीलता: जैसे-जैसे भारत आर्थिक और रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा है, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका यह उभार बाह्य शक्तियों द्वारा नियंत्रित प्रौद्योगिकी प्रणालियों पर आधारित न हो।
  • रणनीतिक संवेदनशीलता: छोटे देशों के विपरीत, भारत के जनसांख्यिकीय पैमाने, आर्थिक महत्त्वाकांक्षा और भू-राजनीतिक प्रोफाइल को अधिक तकनीकी स्वायत्तता तथा डिजिटल क्षेत्र में सरलता की आवश्यकता है।
  • अमेरिका-चीन उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के मध्य महत्त्वपूर्ण तकनीकी संघर्ष दिखाई देते हैं, कि कैसे डिजिटल बुनियादी ढाँचा, सेमीकंडक्टर, एआई और आपूर्ति श्रृंखलाएँ भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के उपकरण बन गए हैं।

डिजिटल संप्रभुता को वैश्विक मान्यता:

  • फ्रांस: फ्रांस की योजना 2027 तक सरकारी विभागों को ‘माइक्रोसॉफ्ट टीम्स’ और ‘ज़ूम’ से संप्रभु वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित करने की है।
  • नीदरलैंड, डेनमार्क तथा जर्मनी: कई यूरोपीय देश और जर्मन राज्य यूएस-आधारित सॉफ्टवेयर और क्लाउड सेवाओं जैसे- माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, एक्सेल, आउटलुक और टीम्स के घरेलू विकल्पों की खोज कर रहे हैं।
  • यूरोपीय संघ (EU): यूरोपीय संघ स्वतंत्र यूरोपीय क्लाउड तथा आईटी अवसंरचना के माध्यम से अमेरिकी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है।
  • तुर्किए (Türkiye): तुर्किए तकनीकी स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय लचीलेपन को मजबूत करने के लिए विदेशी डिजिटल प्रौद्योगिकियों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है।

भारत की विद्यमान पहलें

  • NavIC (नाविक): कारगिल संघर्ष के दौरान जीपीएस प्रणाली देने से मना करने के अनुभव के बाद भारत ने अपना स्वयं का उपग्रह नेविगेशन सिस्टम विकसित किया है।
  • UPI तथा RuPay: भारत की स्वदेशी डिजिटल भुगतान अवसंरचना दर्शाती है, कि घरेलू नवाचार के माध्यम से विदेशी-नियंत्रित प्रणालियों से उत्पन्न होने वाली संवेदनशीलताओं पर नियंत्रण किया जा सकता है।
  • ज़ोहो (Zoho) का प्रयोग: कुछ केंद्रीय सरकारी मंत्रालयों के ईमेल सिस्टम का घरेलू ज़ोहो प्लेटफॉर्म पर जाना, डिजिटल संप्रभुता के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • सेमीकंडक्टर पारिस्थितिक तंत्र: घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण को मजबूत करने के भारत के प्रयासों का उद्देश्य विदेशी चिप आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता को कम करना है।
  • माइक्रोन ATMP सुविधा: साणंद, गुजरात में माइक्रोन टेक्नोलॉजी की सेमीकंडक्टर असेंबली, टेस्ट, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) सुविधा में व्यावसायिक उत्पादन विश्वसनीय प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत-अमेरिका सहयोग को दर्शाता है।
  • पैक्स सिलिका (Pax Silica) पहल: एआई और आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा पर अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल में शामिल होने का भारत का निर्णय, चीनी तकनीक पर निर्भरता में कमी तथा विश्वसनीय डिजिटल साझेदारी को सुदृढ़ करने का प्रयास है।
  • उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA): एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के विकास के लिए निजी क्षेत्र के निवेशकों को भारत का आमंत्रण प्रतिस्पर्धी रक्षा प्रौद्योगिकी विकास की ओर परिवर्तन का संकेत देता है।

तकनीकी संप्रभुता में निजी क्षेत्र की भूमिका:

  • सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व की सीमाएँ: रक्षा विनिर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र पर भारत की अधिक निर्भरता ने वांछित परिणाम नहीं दिए हैं, जैसा कि एक आधुनिक स्वदेशी लड़ाकू विमान विकसित करने में हुए लंबे विलंब में देखा गया है।
  • अमेरिकी मॉडल से सीख: संयुक्त राज्य अमेरिका सरकारी अनुसंधान वित्तपोषण और सुनिश्चित खरीद द्वारा समर्थित निजी रक्षा निगमों पर निर्भर करता है, जो एक मजबूत नवाचार पारिस्थितिक तंत्र निर्मित करता है।
  • सद्गुणयुक्त नवाचार चक्र : सरकार समर्थित अनुसंधान, सुनिश्चित आदेश और रणनीतिक जुड़ाव निजी कंपनियों को राष्ट्रीय सुरक्षा लक्ष्यों की सेवा करते हुए, अत्याधुनिक क्षमताओं को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
  • प्रतिस्पर्धी रक्षा पारिस्थितिक तंत्र की आवश्यकता: भारत को महत्त्वपूर्ण रक्षा तथा डिजिटल प्रौद्योगिकियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी, प्रौद्योगिकी स्टार्टअप और नवाचार-संचालित खरीद को बढ़ावा देना चाहिए।

डिजिटल संप्रभुता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी:

  • रणनीतिक साझेदारियाँ: भारत को अलगाव (Isolation) के माध्यम से तकनीकी संप्रभुता का पीछा करने की आवश्यकता नहीं है; विश्वसनीय साझेदारियाँ पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न कर सकती हैं और एकपक्षीय व्यवधान के जोखिम को कम कर सकती हैं।
  • ब्रह्मोस मिसाइल कार्यक्रम: भारत-रूस ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना दर्शाती है, कि कैसे संयुक्त विकास उच्च-स्तरीय रणनीतिक क्षमता निर्मित करने में सहायता कर सकता है।
  • प्रौद्योगिकी सहयोग: सेमीकंडक्टर, एआई और आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा में भारत-अमेरिका सहयोग विश्वसनीय प्रौद्योगिकी साझेदारियों के महत्त्व को दर्शाता है।
  • अलगाव से बचना: चीन के बड़े पैमाने पर केवल-स्वदेशी मॉडल के विपरीत, भारत तकनीकी अलगाव से बचने के लिए चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ घरेलू क्षमता निर्माण को जोड़ सकता है।

भारत के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियाँ:

  • निम्न अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय: वर्ष 2000 से 2020 के मध्य अनुसंधान एवं विकास पर भारत का सकल व्यय, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का औसतन केवल 0.74% था, जबकि वैश्विक औसत 2.07% है।
  • विदेशी प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता: महत्त्वपूर्ण भारतीय व्यवसाय और सरकारी सेवाएँ विदेशी उत्पादकता सुइट्स (Productivity Suites), क्लाउड सिस्टम तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर बनी हुई हैं।
  • कमजोर स्वदेशी हार्डवेयर बेस: भारत आयातित सेमीकंडक्टर्स, टेलीकॉम घटकों और उन्नत कंप्यूटिंग बुनियादी ढाँचे पर निर्भर है।
  • सीमित रक्षा स्वदेशीकरण: भारत कई रक्षा प्रौद्योगिकियों में विदेशी-मूल के प्लेटफॉर्म्स, सॉफ्टवेयर और घटकों पर निर्भर है।
  • खंडित डिजिटल नीति: भारत को डेटा गवर्नेंस, क्लाउड अवसंरचना, साइबर सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी और R&D नीति को जोड़ने वाले एक अधिक एकीकृत ढाँचे की आवश्यकता है।
  • तकनीकी संप्रभुता की उच्च लागत: क्लाउड, एआई, सेमीकंडक्टर और रक्षा प्रौद्योगिकी में घरेलू विकल्प निर्मित करने के लिए निरंतर पूँजी निवेश, कुशल जनशक्ति तथा दीर्घकालिक नीतिगत प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा देना: अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय का विस्तार, सेमीकंडक्टर क्षमताओं को मजबूत करना तथा घरेलू सॉफ्टवेयर पारिस्थितिक तंत्र को बढ़ावा देना इत्यादि शामिल है।
  • संप्रभु डिजिटल बुनियादी ढाँचे का निर्माण: घरेलू क्लाउड प्लेटफॉर्म, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का विस्तार तथा रणनीतिक डिजिटल क्षेत्रों में UPI-RuPay मॉडल को दुहराए जाने की आवश्यकता है ।
  • सुरक्षा और डेटा संरक्षण को मजबूत करना: महत्त्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी अवसंरचना को सुरक्षित करना और मजबूत डेटा गवर्नेंस ढाँचे को लागू करना।
  • रक्षा स्वदेशीकरण में तेजी लाना: लक्षित वित्तपोषण तथा सुनिश्चित खरीद के माध्यम से निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले रक्षा नवाचार को बढ़ावा देना।
  • विश्वसनीय प्रौद्योगिकी साझेदारियों का निर्माण: प्रौद्योगिकी स्रोतों में विविधता लाने और किसी भी एक देश पर निर्भरता को कम करने के लिए, रणनीतिक सहयोग विकसित करने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः डिजिटलीकरण अब केवल एक संकीर्ण प्रौद्योगिकी का मुद्दा ही नहीं रह गया है अपितु यह भारत की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा रणनीतिक स्वायत्तता का मुख्य केंद्र बन गया है। जैसे-जैसे वैश्विक शक्ति की राजनीति तेजी से प्रौद्योगिकी के माध्यम से संचालित होती जा रही है, भारत को अपने डिजिटल भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए स्वदेशी नवाचार, निजी क्षेत्र की भागीदारी, विश्वसनीय साझेदारी तथा उच्च दर वाले अनुसंधान और विकास (R&D) मे की जाने वाले व्यय को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. सॉफ्टवेयर-परिभाषित युद्ध और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के युग में, डिजिटल संप्रभुता प्राप्त करना अब भारत के लिए एक विकल्प नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है। संबंधित चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए, तथा भारत के डिजिटल बुनियादी ढाँचे को सुरक्षित करने के लिए एक बहुआयामी रणनीति का सुझाव प्रस्तुत कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

भारत की डिजिटल संप्रभुता की चुनौती

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