संदर्भ:
दार्शनिक वोल्तेयर (Voltaire) से प्रेरणा लेते हुए, लेख यह तर्क देते है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून दिन-प्रतिदिन अप्रभावी होता जा रहा है, क्योंकि शक्तिशाली देश अक्सर नियमों और कानूनों का पालन चयनात्मक तरीके से करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय कानून अपनी प्रासंगिकता क्यों खो रहा है?
- प्रवर्तन का अभाव: घरेलू कानूनों के विपरीत, जिनका प्रवर्तन पुलिस, न्यायालयों और प्रशासनिक एजेंसियों द्वारा किया जाता है, अंतरराष्ट्रीय कानून के पास कोई केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण नहीं है। इसलिए इसका पालन मुख्यतः राज्यों की इच्छा पर निर्भर करता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के उदाहरण
- रूस–यूक्रेन युद्ध: यूक्रेन के विरुद्ध रूस द्वारा सैन्य बल का प्रयोग व्यापक रूप से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उस सिद्धांत का उल्लंघन माना जाता है, जो संप्रभु राज्यों के विरुद्ध आक्रामकता तथा बल प्रयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
- दक्षिण चीन सागर विवाद: चीन ने वर्ष 2016 में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) के उस निर्णय को अस्वीकार कर दिया, जिसमें दक्षिण चीन सागर में उसके नाइन-डैश लाइन दावों को अवैध और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप न मानते हुए निरस्त कर दिया गया था।
- आंतरिक मानवाधिकार उल्लंघन: सीरिया में कथित रासायनिक हथियारों के उपयोग, म्यांमार में रोहिंग्या संकट तथा शिनजियांग में मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ इस तथ्य को उजागर करती हैं कि गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने या उनके लिए दोषियों को दंडित करने की अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की क्षमता अभी भी सीमित है।
- अंतरराष्ट्रीय संधियों का कमजोर होना: कई महत्वपूर्ण शस्त्र-नियंत्रण तथा विश्वास-निर्माण संबंधी समझौते समय के साथ कमजोर पड़ गए हैं या समाप्त हो चुके हैं, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- मध्यम-दूरी परमाणु बल संधि (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty – INF Treaty)
- ओपन स्काईज़ संधि (Open Skies Treaty)
- न्यू स्टार्ट संधि (New START – New Strategic Arms Reduction Treaty)
- यह प्रवृत्ति प्रमुख शक्तियों के बीच विश्वास और सहयोग में बढ़ते क्षरण को दर्शाती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून के संकट के कारण
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वीटो शक्ति: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ( UNSC) के पाँच स्थायी सदस्य अपने वीटो अधिकार का उपयोग करके किसी भी प्रस्ताव को अवरुद्ध कर सकते हैं। इसके कारण कई बार उनके स्वयं के विरुद्ध या उनके सहयोगी देशों के विरुद्ध कार्रवाई करना संभव नहीं हो पाता, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून के निष्पक्ष और प्रभावी अनुपालन में बाधा उत्पन्न होती है।
- अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की सीमाएँ: अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) की प्रभावशीलता सीमित है क्योंकि कई प्रमुख शक्तियाँ इस न्यायालय की पक्षकार नहीं हैं, जिससे इसके क्षेत्राधिकार और प्रभावशीलता में कमी आती है।
- स्वैच्छिक अनुपालन: अंतरराष्ट्रीय कानून मुख्यतः राज्यों की सहमति और स्वैच्छिक अनुपालन पर आधारित होता है। परिणामस्वरूप, अनेक देश अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन केवल तब करते हैं, जब वे उनके राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होते हैं।
UPSC मुख्य परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण शब्दावली
- नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था: एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था जिसमें राज्य अपनी गतिविधियाँ केवल शक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय कानूनों, मानदंडों और संस्थाओं के अनुसार संचालित करते हैं।
- दण्डमुक्ति (Impunity): ऐसी स्थिति जिसमें कोई राज्य या नेता अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने के बावजूद जवाबदेही या दंड से बच जाता है।
- जवाबदेही का अभाव: ऐसी स्थिति, जिसमें राज्यों को उनके अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी ठहराने हेतु प्रभावी तंत्र का अभाव होता है।
- मानदंडों का क्षरण: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत नियमों, मानकों तथा कानूनी सिद्धांतों का धीरे-धीरे कमजोर पड़ना या उनका प्रभाव कम होना।
- बहुपक्षवाद: साझा चुनौतियों और वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए अनेक देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं एवं मंचों के माध्यम से किया जाने वाला सहयोग।
सुझाए गए सुधार
- बहुपक्षीय संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना: संयुक्त राष्ट्र तथा अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) जैसी संस्थाओं की प्रभावशीलता, विश्वसनीयता और वैधता को बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि वे वैश्विक चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से समाधान कर सकें और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुपालन को सुनिश्चित कर सकें।
- जवाबदेही तंत्र को सुदृढ़ बनाना: अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघनों की प्रभावी जाँच तथा दोषियों को दंडित करने के लिए अधिक मजबूत कानूनी और संस्थागत तंत्र विकसित किए जाने चाहिए।
- निगरानी और पारदर्शिता बढ़ाना: अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन तंत्र को मजबूत किया जाए।
- वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) जैसी संस्थाओं में सुधार किया जाना चाहिए, ताकि वे अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, लोकतांत्रिक तथा प्रभावी बन सकें तथा समकालीन वैश्विक चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकें।
- कूटनीतिक संयम को बढ़ावा देना: राज्यों को बल प्रयोग या दबाव की बजाय संवाद, वार्ता और शांतिपूर्ण विवाद-निपटान तंत्रों के माध्यम से समस्याओं का समाधान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय कानून की बढ़ती अवहेलना वैश्विक मानदंडों और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच उभरती खाई को दर्शाती है। नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अधिक सशक्त संस्थाओं, बेहतर जवाबदेही, तथा बहुपक्षवाद और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति नए सिरे से प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: “अंतरराष्ट्रीय कानून वैश्विक न्याय सुनिश्चित करने के तंत्र के बजाय शक्तिशाली राज्यों के लिए सुविधा का साधन बनता जा रहा है।” हाल के वैश्विक संघर्षों तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विफलताओं के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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