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भारतीय युवाओं में गतिशीलता का संकट

भारतीय युवाओं में गतिशीलता का संकट 10 Jun 2026

संदर्भ:

लेख का तर्क है कि भारत आकांक्षाओं के संकट का नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता के संकट का सामना कर रहा है।

गतिशीलताका संकट

  • जब लोग कड़ी मेहनत करते हैं, शिक्षा प्राप्त करते हैं और नियमों का पालन करते हैं, फिर भी उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होता, तो इसे गतिशीलता का संकट कहा जाता है।
  • उदाहरण: एक गरीब छात्र शिक्षा प्राप्त कर लेता है, फिर भी अवसरों की कमी के कारण उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो पाता और वह आर्थिक रूप से वंचित बना रहता है।

पृष्ठभूमि: LPG सुधार (1991)

  • आर्थिक सुधारों ने एक वादा किया था कि:

यदि आप कड़ी मेहनत करेंगे, कौशल प्राप्त करेंगे और नियमों का पालन करेंगे, तो आपका जीवन आपके माता-पिता से बेहतर होगा।”

इस वादे ने प्रोत्साहित किया:

  • ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर प्रवास
  • शिक्षा में निवेश
  • कोचिंग संस्कृति का विस्तार

लेकिन पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार न बनने के कारण युवाओं में निराशा बढ़ी।

युवाओं में निराशा के कारण

शिक्षा–रोजगार अंतर

  • कौशल–रोज़गार असंगति: अनेक युवाओं के पास शैक्षणिक डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन उनके पास रोजगार बाज़ार की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल तथा गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसरों का अभाव है।
  • रोज़गार संबंधी चुनौतियाँ: प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएँ तथा सीमित रिक्तियाँ स्थिर करियर की तलाश कर रहे अभ्यर्थियों के बीच अनिश्चितता और निराशा को बढ़ाती हैं।
  • सामाजिक गतिशीलता का कारक: अनेक परिवारों के लिए सरकारी परीक्षाएँ केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक उन्नति प्राप्त करने का महत्वपूर्ण मार्ग भी हैं।

रोजगार-विहीन वृद्धि 

  • विकास–रोज़गार विच्छेद: आर्थिक विकास स्वतः रोजगार सृजन में परिवर्तित नहीं होता। विकास की गुणवत्ता का आकलन केवल GDP वृद्धि से नहीं, बल्कि रोज़गार के अवसरों, आय की सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता के आधार पर किया जाता है।
  • युवा बेरोज़गारी की चुनौती: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) 2024 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोज़गार लोगों का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है। यह स्थिति अधिक समावेशी तथा रोज़गारोन्मुख आर्थिक विकास की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

संस्थागत विश्वसनीयता का संकट 

  • संस्थागत विश्वास एक अवसंरचना के रूप में: संस्थाएँ भी राष्ट्रीय अवसंरचना की तरह कार्य करती हैं, जहाँ पारदर्शिता, निष्पक्षता और जन-विश्वास उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि सड़कें, हवाई अड्डे और डिजिटल नेटवर्क जैसी भौतिक अवसंरचनाएँ।
  • जन-विश्वास में गिरावट: प्रश्नपत्र लीक, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएँ भर्ती प्रणालियों तथा शासन संस्थाओं में लोगों के विश्वास को कमजोर करती हैं।

आगे की राह 

  • संस्थाओं को सशक्त बनाना: निष्पक्षता और जन-विश्वास को बढ़ाने के लिए बेहतर परीक्षा प्रणालियों, डिजिटल निगरानी तथा बायोमेट्रिक सत्यापन के माध्यम से भर्ती प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाया जाए।
  • रोज़गारोन्मुख नीतियाँ: केवल GDP वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय रोज़गार सृजन को प्राथमिकता दी जाए तथा MSME, वस्त्र और विनिर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाए।
  • आर्थिक अनिश्चितता को कम करना: अधिक आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य बीमा, फसल बीमा तथा कौशल विकास कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जाए।
  • जनसांख्यिकीय लाभांश: भारत अपनी विशाल युवा आबादी का लाभ तभी उठा सकता है जब निम्नलिखित क्षेत्रों में निवेश किया जाए:
    • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
    • कौशल विकास
    • स्वास्थ्य सेवाएँ
    • गुणवत्तापूर्ण रोजगार

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “सार्वजनिक परीक्षाओं में बार-बार होने वाली अनियमितताएँ और गुणवत्तापूर्ण रोजगार का अभाव केवल प्रशासनिक विफलताएँ नहीं हैं, बल्कि भारत के युवाओं के साथ हुए ‘सामाजिक अनुबंध’ के उल्लंघन का प्रतीक हैं।” इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा सुझाव दीजिए कि किस प्रकार इस गतिशीलता के संकट को जनसांख्यिकीय लाभांश में परिवर्तित किया जा सकता है।

 (15 अंक, 250 शब्द)

भारतीय युवाओं में गतिशीलता का संकट

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