संदर्भ
“डबल-इंजन सरकार” की अवधारणा उस राजनीतिक दावे को संदर्भित करती है कि जब केंद्र (संघ) और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार होती है, जिससे बेहतर समन्वय और नीतिगत तालमेल के माध्यम से विकास की गति तेज होती है।
- हालाँकि, इसे सहकारी संघवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह भारत की संघीय संरचना के लिए कई चुनौतियाँ भी उत्पन्न करता है।
सहकारी संघवाद का संवैधानिक सिद्धांत
- अधिकार के रूप में विकास: अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ घोषित करता है।
- इसका अर्थ है कि विकास के लिए निधियाँ गणराज्य के संवैधानिक ढांचे का हिस्सा हैं और इन्हें केंद्र सरकार के साथ राजनीतिक समानता पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
- लोकधन और लोकतांत्रिक जवाबदेही: नागरिकों से एकत्र किए गए कर राष्ट्रीय संसाधन होते हैं और उनका वितरण पक्षपातपूर्ण विचारों के बजाय संवैधानिक तंत्रों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
वित्तीय संघवाद और संस्थागत चिंताएँ
- वित्त आयोग की भूमिका: अनुच्छेद 280 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय के रूप में वित्त आयोग एक निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाता है, जो जनसंख्या, क्षेत्रफल और वित्तीय क्षमता जैसे वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व का वितरण करता है।
- सेस और सरचार्ज का प्रभाव: सेस और सरचार्ज (जिनका 100% हिस्सा केंद्र के पास रहता है) पर बढ़ती निर्भरता के कारण राजस्व का एक बड़ा हिस्सा विभाज्य पूल से बाहर रहता है, जिससे राज्यों को स्वतः मिलने वाली निधियों का हिस्सा कम हो जाता है।
- क्षेत्रीय समानता पर बहस: कुछ दक्षिणी राज्य (तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश) का तर्क है कि वर्त्तमान सूत्र उन्हें जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के लिए अप्रत्यक्ष रूप से दंडित करता है, क्योंकि अधिक जनसंख्या वाले आँकड़े वित्तीय आवंटन को प्रभावित करते हैं।
संस्थागत विश्वसनीयता और संघीय संतुलन
- संस्थाओं के राजनीतिकरण की धारणा: यह चिंता व्यक्त की गई है कि संघीय संतुलन की रक्षा के लिए जिम्मेदार प्रमुख संस्थाओं पर ऐसे दबाव पड़ सकते हैं, जो उनकी स्वायत्तता और विश्वसनीयता को कमजोर कर सकते हैं।
- संस्थागत स्वतंत्रता की आवश्यकता: संघीय शासन और सहकारी नीति-निर्माण में विश्वास बनाए रखने के लिए मजबूत और निष्पक्ष संवैधानिक संस्थाएँ आवश्यक हैं।
केंद्र-राज्य संबंधों में राज्यपाल की भूमिका
- संवैधानिक स्थिति: राज्यपालों को राज्य के निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने के लिए अभिप्रेत किया गया है।
- विधायी देरी पर विवाद: ऐसे मामलों में, जहाँ राज्यपाल राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने में देरी करते हैं, उनकी आलोचना इस आधार पर की गई है कि इससे विधायी संप्रभुता कमजोर होती है।
- न्यायिक स्पष्टीकरण: वर्ष 2023 और वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि राज्यपाल की निष्क्रियता असंवैधानिक है और विधायी संप्रभुता निर्वाचित विधानसभा के पास होती है।
- हालाँकि, राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत सलाहकारी राय मांगने के उपयोग ने कुछ मामलों में राज्यपालों के लिए निर्धारित विशिष्ट समय-सीमाओं को प्रभावित किया है।
संघीय तनाव का विकास
- अनुच्छेद 356 से जटिल रणनीतियों तक: ऐतिहासिक रूप से, केंद्र सरकार राज्य सरकारों को सीधे बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद 356 का उपयोग करती थी, लेकिन वर्ष 1994 के एस.आर. बोम्मई मामले ने इस दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।
- वर्त्तमान रणनीति: आधुनिक रणनीतियाँ राज्य सरकारों को बर्खास्त किए बिना, राज्यपालों और वित्तीय प्रतिबंधों का उपयोग करके उन्हें कमजोर करने की ओर स्थानांतरित हो गई हैं।
आगे की राह
- विधेयकों पर समयबद्ध स्वीकृति: राज्यपालों के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने हेतु एक संवैधानिक या वैधानिक समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए, ताकि अनिश्चितकालीन देरी को रोका जा सके।
- वित्त आयोग को सशक्त बनाना: वित्तीय संघवाद की रक्षा के लिए उसकी सिफारिशों में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करना और उनका पालन करना आवश्यक है।
- अंतर-राज्य परिषद का पुनर्जीवन: सरकारिया आयोग की सिफारिश के अनुसार, केंद्र और राज्यों के बीच संरचित संवाद और विवाद समाधान के मंच के रूप में अनुच्छेद 263 के तहत अंतर-राज्य परिषद को सक्रिय किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत के संघीय लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और संवैधानिक सहयोग के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, ताकि राज्य की स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके और राष्ट्रीय एकता भी बनी रहे।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: यह विचार कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच राजनीतिक समानता बेहतर शासन सुनिश्चित करती है, भारत में सहकारी संघवाद के कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। समालोचनात्मक रूप से विवेचना कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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