संदर्भ
हाल ही में एक चुनाव संबंधी मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने की व्यवहार्यता और प्रभावों पर प्रश्न उठाए।
- इसके अलावा, चुनाव आयोग ने पाँच विधानसभा चुनावों (असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी) की समय-सारिणी की घोषणा भी की है, जिससे चुनावी भागीदारी पर बहस विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई है।
मतदान के अधिकार का संवैधानिक और कानूनी स्वरूप
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 326 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है, जिसके तहत 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है।
- वैधानिक प्रावधान: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (धारा 19) और 1951 (धारा 62) के अनुसार, मतदाता को किसी निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी होना चाहिए और मतदाता सूची में पंजीकृत होना आवश्यक है।
- अधिकार का स्वरूप: मतदान का अधिकार एक संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है, न कि मौलिक अधिकार।
लोकतांत्रिक चिंता — कम मतदान प्रतिशत
- अल्पसंख्यक शासन का जोखिम: कम मतदान से ऐसा हो सकता है कि कोई उम्मीदवार कुल मतदाताओं के छोटे हिस्से के समर्थन से जीत जाए, जिससे लोकतांत्रिक वैधता कमजोर होती है।
- असमान राजनीतिक प्रभाव: राजनीतिक वैज्ञानिक अरेंड लिजफार्ट के अनुसार, असमान भागीदारी से राजनीतिक प्रभाव भी असमान हो जाता है, जिससे मतदान न करने वाले लोग निर्णय-निर्माण से बाहर हो जाते हैं।
अनिवार्य मतदान की व्यावहारिक चुनौतियाँ
- प्रशासनिक व्यवहार्यता: चुनाव सुधारों पर गोस्वामी समिति (1990) ने अनिवार्य मतदान को खारिज किया, यह उल्लेख करते हुए कि एक अरब से अधिक मतदाताओं वाले देश में भागीदारी को लागू कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
- गरीबों पर प्रभाव: जुर्माना या लाभों की वापसी जैसे दंडात्मक उपाय आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर असमान रूप से अधिक बोझ डाल सकते हैं।
- विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट, 2015): हालाँकि अनिवार्य मतदान से मतदान प्रतिशत में मामूली वृद्धि हो सकती है, लेकिन इससे वास्तविक नागरिक सहभागिता के बजाय भय के कारण मतदान को बढ़ावा मिल सकता है।
संवैधानिक और वैश्विक दृष्टिकोण
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जिसे न्यायालयों ने चुप रहने या मतदान से दूर रहने के अधिकार को भी शामिल करने के रूप में व्याख्यायित किया है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रथाएँ: ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे देशों में छोटे जुर्माने के साथ अनिवार्य मतदान लागू है, जबकि पेरू में गैर-मतदाताओं पर कुछ सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँच पर प्रतिबंध जैसे कठोर उपाय अपनाए जाते हैं।
प्रवासी श्रमिकों से संबंधित चिंताएँ
- संरचनात्मक बाधाएँ: लाखों प्रवासी श्रमिक अपने गृह निर्वाचन क्षेत्रों से दूर रहते हैं।
- अनिवार्य मतदान से यात्रा खर्च और मजदूरी की हानि का बोझ बढ़ेगा, जिससे इसका क्रियान्वयन सामाजिक रूप से असमान और अन्यायपूर्ण हो जाएगा।
आगे की राह
- नागरिक जागरूकता: स्वैच्छिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए मतदाता शिक्षा अभियानों और नागरिक सहभागिता पहलों को सुदृढ़ करना।
- लॉजिस्टिक सहायता: मतदान को सुगम बनाने के लिए मतदान दिवस पर अवकाश, विशेष परिवहन व्यवस्था और प्रवासी मतदाताओं को सक्षम बनाने हेतु रिमोट वोटिंग मशीन (RVMs) के विकास जैसे उपाय अपनाना।
निष्कर्ष
भारत में मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए भागीदारी को बाध्य करने के बजाय उसे सुगम बनाना आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक सहभागिता जागरूकता, सुलभता और चुनावी संस्थाओं में विश्वास के माध्यम से बढ़ सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: अनिवार्य मतदान भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध है और इसके सामने गंभीर व्यावहारिक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। मतदाता भागीदारी बढ़ाने के वैकल्पिक उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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