संदर्भ
भारत जल तनाव (Water Stress) की स्थिति के करीब पहुँच रहा है, क्योंकि बढ़ती मांग, भूजल का क्षय और जलवायु परिवर्तनशीलता संसाधनों पर दबाव डाल रहे हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और गोदावरी जैसी प्रमुख नदियों के बावजूद, यह संकट उपलब्धता से कम और कमजोर तथा खंडित जल शासन के कारण अधिक होता जा रहा है।
भारत में जल शासन से जुड़े प्रमुख संरचनात्मक मुद्दे
- खंडित संस्थागत प्रबंधन (Siloed Institutional Management): जल शासन कई मंत्रालयों—जैसे कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के बीच विभाजित है, जिससे समन्वय की कमी और नीतिगत असंगति उत्पन्न होती है।
- जलवैज्ञानिक के बजाय राजनीतिक आधार पर शासन (Political Rather than Hydrological Governance): जल प्रबंधन प्राकृतिक नदी बेसिन या जलग्रहण क्षेत्रों के बजाय प्रशासनिक और राज्य सीमाओं के अनुसार किया जाता है, जिससे अक्सर अंतर-राज्यीय विवाद बढ़ जाते हैं।
- उदाहरण: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी जल विवाद।
- MSP-आधारित फसल विकृतियाँ (MSP-Driven Cropping Distortions): न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली पंजाब जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान जैसी अधिक जल-आधारित फसलों की खेती को प्रोत्साहित करती है, जिससे भूजल का क्षय और क्षेत्रीय जल तनाव बढ़ जाता है।
- आभासी जल का निर्यात (Virtual Water Export): 1 किलोग्राम चावल उत्पादन के लिए लगभग 3,000–5,000 लीटर जल की आवश्यकता होती है।
- इस प्रकार, चावल का निर्यात “आभासी जल” के निर्यात के समान है, जिससे भारत के सीमित मीठे जल संसाधन प्रभावी रूप से अन्य देशों को स्थानांतरित हो जाते हैं।
- संकीर्ण “अंकगणितीय जलविज्ञान” दृष्टिकोण (Reductionist “Arithmetic Hydrology” Approach): जल शासन में अक्सर जल प्रबंधन को केवल मांग–आपूर्ति के सरल गणितीय संतुलन के रूप में देखा गया है। इसके तहत बांधों, नहरों और भूजल दोहन के विस्तार को प्राथमिकता दी जाती है ताकि कृषि उत्पादन और आर्थिक विकास बढ़ सके, जबकि पारिस्थितिक प्रक्रियाओं और दीर्घकालिक स्थिरता की उपेक्षा की जाती है।
अतिरिक्त जानकारी
- संवैधानिक रूप से, जल को राज्य सूची की प्रविष्टि 17 के अंतर्गत रखा गया है, लेकिन संघ सूची की प्रविष्टि 56 के तहत केंद्र सरकार अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन कर सकती है।
- विवादों का समाधान अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के माध्यम से किया जाता है।
- यह संघीय व्यवस्था अक्सर खंडित और विवाद-ग्रस्त जल शासन की स्थिति उत्पन्न करती है।
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जलवायु परिवर्तन और उभरता जल शासन संकट
- जलवायु परिवर्तन एक जोखिम गुणक के रूप में: जलवायु परिवर्तन वर्षा पैटर्न को बाधित कर, बाढ़, सूखा और चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति बढ़ाकर मौजूदा जल तनाव को और गंभीर बना देता है।
- शहरी जल विरोधाभास (Urban Water Paradox): बेंगलुरु जैसे शहरों ने एक ही वर्ष में गंभीर बाढ़ और तीव्र जल संकट दोनों का अनुभव किया है, जो पारंपरिक और स्थिर जल शासन प्रणालियों की विफलता को दर्शाता है।
- पारंपरिक शासन की सीमाएँ: ऐसी जल नीतियाँ जो ऐतिहासिक वर्षा आंकड़ों और स्थिर अवसंरचना पर आधारित हैं, तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न के संदर्भ में अपर्याप्त साबित होते हैं।
- वैश्विक चेतावनी उदाहरण: अराल सागर का पारिस्थितिक पतन, जो सिंचाई के लिए नदी जल के मोड़ने से हुआ, यह दर्शाता है कि पारिस्थितिक सीमाओं की अनदेखी करने वाले संकीर्ण इंजीनियरिंग दृष्टिकोण अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय आपदाओं का कारण बन सकते हैं।
राष्ट्रीय जल दृष्टि के लिए 12 सिद्धांत (Tenets)
- नदी बेसिन को इकाई मानना: राज्य-केंद्रित शासन से हटकर पूरे नदी बेसिन को एक एकल प्रशासनिक इकाई के रूप में मानना।
- एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM): कृषि, शहरी विकास और उद्योग को अलग-अलग मंत्रालयों के बजाय एक साझा ढाँचे के तहत समन्वित करना।
- सशक्त बेसिन प्राधिकरण: धीमी गति वाले कानूनी न्यायाधिकरणों के स्थान पर बहु-विषयक विशेषज्ञ निकाय स्थापित करना, जो पारदर्शी डेटा के आधार पर विवादों का शीघ्र समाधान करें।
- डेटा-आधारित शासन: नदी बेसिन स्तर पर व्यापक जलवैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेना, न कि भावनाओं या राजनीतिक दबाव के आधार पर।
- गतिशील सामाजिक-पारिस्थितिक प्रवाह: यह मान्यता कि सतही जल, भूजल और जैव विविधता आपस में जुड़े हुए हैं, और इनमें से किसी एक में व्यवधान पूरे तंत्र को प्रभावित करता है।
- पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flows): नदियों को केवल जल प्रवाह के माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि जीवित पारिस्थितिक तंत्र के रूप में मान्यता देता है, और स्व-शुद्धिकरण प्रक्रियाओं, जलीय जैव विविधता तथा समग्र नदी स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए न्यूनतम प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देता है।
- जल का आर्थिक मूल्यांकन: बहुत कम या मुफ्त मूल्य निर्धारण के कारण होने वाले अत्यधिक जल उपयोग को कम करने के लिए जल को एक आर्थिक संसाधन के रूप में मानना और उपयुक्त मूल्य निर्धारण तथा जल क्रेडिट जैसे उपकरणों को अपनाना, ताकि कुशल उपयोग और संरक्षण को प्रोत्साहन मिल सके।
- मांग-पक्ष प्रबंधन: बांधों के माध्यम से आपूर्ति बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण और व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से जल खपत को कम करने पर ध्यान देना।
- कॉर्पोरेट जल संरक्षण (Corporate Water Stewardship): उत्तरदायी औद्योगिक जल उपयोग को बढ़ावा देने के लिए जल संरक्षण लक्ष्यों को कॉर्पोरेट ESG (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) ढाँचों में शामिल करना।
- जलवायु-सहनशील अनुकूली प्रणालियाँ (Climate-Resilient Adaptive Systems): बाढ़, सूखा और जलवायु परिवर्तनशीलता के अनुसार प्रतिक्रिया देने में सक्षम, वास्तविक समय निगरानी वाली लचीली जल प्रबंधन प्रणालियाँ विकसित करना।
- नीति में पारिस्थितिक एकीकरण: मिहिर शाह समिति की सिफारिशों को लागू करते हुए केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड का पुनर्गठन करना, ताकि आपूर्ति-आधारित इंजीनियरिंग दृष्टिकोण से हटकर पारिस्थितिकी-आधारित जल शासन मॉडल को अपनाया जा सके।
- महिला-केंद्रित जल शासन (Women-Centric Water Governance): जल शासन संस्थानों में महिलाओं की अधिक भागीदारी को बढ़ावा देना, तथा घरेलू और सामुदायिक जल प्रबंधन में उनकी केंद्रीय भूमिका को मान्यता देना।
निष्कर्ष
भारत का जल संकट मूल रूप से एक शासन संबंधी चुनौती है, जिसके समाधान के लिए खंडित और आपूर्ति-केंद्रित प्रबंधन से हटकर एकीकृत, बेसिन-आधारित और जलवायु-सहनशील जल शासन की दिशा में बदलाव आवश्यक है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत का जल संकट पूर्ण अभाव (Absolute Scarcity) के बजाय खंडित शासन (Fragmented Governance) से उत्पन्न होता है। वर्त्तमान जल प्रबंधन प्रथाओं के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, एक सतत एवं जलवायु-सहनशील जल शासन ढाँचे के लिए उपाय सुझाइए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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