संदर्भ:
पश्चिम बंगाल चुनावों में भाजपा की जीत के बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनावी कदाचार का आरोप लगाया तथा इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, यह दावा करते हुए कि फैसला वास्तविक सार्वजनिक जनादेश की बजाय एक ‘साजिश’ का परिणाम था।
संवैधानिक प्रावधान और राज्यपाल की भूमिका
- अनुच्छेद 164 और मुख्यमंत्री की नियुक्ति: संविधान प्रावधान करता है, कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और मंत्रिपरिषद राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करती है।
- “राज्यपाल के प्रसादपर्यंत” की संवैधानिक प्रकृति – अनुच्छेद 164 (1): राज्यपाल का प्रसादपर्यंत पूर्णतः विवेकाधीन नहीं है, बल्कि संसदीय लोकतंत्र और विधायी बहुमत के समर्थन के ढाँचे के भीतर संचालित होता है।
- संसदीय प्रणाली में बहुमत का सिद्धांत: कोई सरकार केवल तब तक पद पर बनी रह सकती है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास प्राप्त हो।
- नाममात्र के प्रमुख के रूप में राज्यपाल: अनुच्छेद 154 कार्यकारी शक्ति राज्यपाल में निहित करता है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल एक संवैधानिक या नाममात्र के प्रमुख के रूप में कार्य करता है, जबकि वास्तविक कार्यकारी अधिकार निर्वाचित मंत्रिपरिषद के पास होता है।
- सहायता और सलाह का सिद्धांत: अनुच्छेद 163 अनिवार्य करता है, कि राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है, उन सीमित स्थितियों को छोड़कर जहाँ संविधान विवेकाधीन शक्तियाँ प्रदान करता है।
विधानसभा का स्वतः विघटन
- अनुच्छेद 172(1): अनुच्छेद 172(1) प्रावधान करता है, कि राज्य विधानसभा अपनी पहली बैठक से पाँच वर्षों तक जारी रहती है जब तक कि उसे पहले भंग न कर दिया जाए, जिसके बाद वह स्वतः भंग हो जाती है।
- सीमित प्रभाव: एक बार विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद, मुख्यमंत्री द्वारा औपचारिक रूप से इस्तीफा देने से इनकार करने की संवैधानिक प्रासंगिकता सीमित होती है, क्योंकि सदन के विघटन के साथ सरकार प्रभावी रूप से समाप्त हो जाती है।
- राज्यपाल का संक्रमणकालीन उत्तरदायित्व: विघटन के बाद, नई सरकार बनने तक राज्यपाल संवैधानिक संक्रमण की सुविधा प्रदान करता है।
- लोकतांत्रिक औचित्य की परंपरा: हालाँकि एक पराजित मुख्यमंत्री से लोकतांत्रिक परंपरा और चुनावी जनादेश के सम्मान के रूप में इस्तीफा देने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह कोई सख्त कानूनी आवश्यकता नहीं है।
विधानसभा में बहुमत का निर्धारण:
- फ्लोर टेस्ट का सिद्धांत: एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सरकार के बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर किया जाना चाहिए, न कि राज्यपाल द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए।
- राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका: जब विधायी समर्थन के संबंध में संदेह उत्पन्न होता है, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री को फ्लोर टेस्ट के माध्यम से बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दे सकता है।
- अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की संभावना: यदि कोई दल या गठबंधन बहुमत सिद्ध करने और स्थिर सरकार बनाने में सक्षम नहीं होता है, तो अनुच्छेद 356 लागू किया जा सकता है, जिससे राष्ट्रपति शासन और विधानसभा का संभावित निलंबन या विघटन हो सकता है।
पराजित मुख्यमंत्री के लिए उपलब्ध विधिक उपाय
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 के तहत, एक पराजित उम्मीदवार भ्रष्ट आचरण या चुनावी अनियमितताओं जैसे आधारों पर 45 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में चुनाव परिणामों को चुनौती दे सकता है।
- रिट अधिकार क्षेत्र: मूल अधिकारों के कथित प्रणालीगत उल्लंघन या चुनावी कदाचार से जुड़े मामलों में, अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय या अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं।
- संवैधानिक गतिरोध पर न्यायिक समाधान: यह अपेक्षा की जाती है कि चुनावी विवादों को पद खाली करने से इनकार करने की बजाय संवैधानिक तथा न्यायिक तंत्र के माध्यम से हल किया जाए।
निष्कर्ष
हालाँकि ये परिदृश्य राजनीतिक तनाव उत्पन्न करते हैं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया की अखंडता और फ्लोर टेस्ट की सर्वोच्चता ही संवैधानिक वैधता के अंतिम पैमाने हैं।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: “अनुच्छेद 164 के तहत ‘राज्यपाल के प्रसादपर्यंत’ एक पूर्ण विवेकाधीन शक्ति नहीं है, बल्कि संवैधानिक रूप से विधानसभा के विश्वास से जुड़ी हुई है।” संविधान सभा की चर्चाओं और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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