संदर्भ:
हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि वे एसिड हमले के पीड़ित, जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया और जिनके शरीर में बिना किसी बाहरी निशान के आंतरिक चोटें हुईं, उन्हें भी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (Rights of Persons with Disabilities Act – RPwD Act), 2016 के तहत एसिड अटैक पीड़ित माना जाएगा।
पीड़ितों के साथ व्यवहार में असमानता
- प्रिया का मामला: इनके चेहरे पर एसिड फेंका गया, जिससे चेहरा विकृत हो गया।
- इन्हें एसिड अटैक पीड़ित के रूप में मान्यता मिली तथा दिव्यांगता प्रमाणपत्र और आरक्षण लाभ प्राप्त हुए।
- सुप्रिया का मामला: उसे ज़बरदस्ती एसिड /तेज़ाब पिलाया गया, जिससे उसका गला, भोजन-नली और पेट गंभीर रूप से जल गया।
- चूँकि एसिड बाहरी रूप से “फेंका” नहीं गया था, इसलिए अधिकारियों ने उसे मान्यता और कल्याणकारी लाभ देने से इनकार कर दिया।
- यह मामला दर्शाता है कि प्रशासन ने कानून के वास्तविक उद्देश्य की बजाय उसके शाब्दिक अर्थ का पालन किया।
ऐतिहासिक कानूनी विकास (2013 से पहले से 2016 तक)
- वर्ष 2013 से पहले: भारतीय दंड संहिता (IPC) में एसिड हमलों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं था।
- इसे गंभीर चोट पहुँचाने वाले सामान्य अपराधों के तहत दर्ज किया जाता था।
- वर्ष 2013 का संशोधन: लक्ष्मी अग्रवाल के लंबे कानूनी संघर्ष के बाद, एसिड हमलों को औपचारिक रूप से भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत एक अलग अपराध के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
- वर्ष 2016 का अधिनियम: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता प्रदान की , जिनमें एसिड अटैक पीड़ित भी शामिल हैं, जिससे उन्हें सरकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
RPwD Act, 2016 की धारा 2(zc) में विद्यमान कानूनी खामियाँ
- संकीर्ण परिभाषा: अनुसूची II, धारा 2(zc) में एसिड अटैक पीड़ित को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो “एसिड फेंककर किए गए हिंसक हमलों के कारण विकृत हुआ हो।”
- आंतरिक चोटों की अनदेखी: जिन पीड़ितों को एसिड पीने के लिए मजबूर किया गया था, उन्हें इस परिभाषा से बाहर रखा गया क्योंकि उनमें कोई स्पष्ट बाहरी विकृति दिखाई नहीं देती थी।
- कानून ने बाहरी घावों पर ध्यान दिया, जबकि गंभीर आंतरिक क्षति की अनदेखी की गई।
- आंतरिक क्षति की प्रकृति: एसिड का सेवन मुँह, गले, भोजन नली, पेट और पाचन तंत्र को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचा सकता है।
- पीड़ितों को अक्सर जीवनभर खाने, निगलने और पाचन से जुड़ी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।
संविधान से संबंधित मुद्दा
अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
- अपर्याप्त वर्गीकरण: याचिका में तर्क दिया गया कि कानून ने मनमाने ढंग से एसिड फेंकने और एसिड पिलाने के बीच अंतर किया। दोनों ही श्रेणियों में समान प्रकार की क्षति होती है, इसलिए इन्हें पीड़ितों के एक ही वर्ग के रूप में माना जाना चाहिए।
- तार्किक संबंध का अभाव: यह अंतर कानून के उद्देश्य से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखता था, जिसका उद्देश्य एसिड हिंसा से दिव्यांग हुए व्यक्तियों को सहायता प्रदान करना था।
अनुच्छेद 21: जीवन और गरिमा का अधिकार
- कल्याणकारी सहायता से वंचित करना: कानूनी परिभाषा से बाहर रखने के कारण पीड़ितों को दिव्यांगता प्रमाणपत्र, मुआवजा और पुनर्वास जैसी सुविधाओं तक पहुँच से वंचित कर दिया गया।
- गरिमापूर्ण जीवन: याचिका में तर्क दिया गया कि गंभीर आंतरिक चोटों से पीड़ित लोगों के लिए चिकित्सा देखभाल और सहायता तक पहुँच एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कानूनी असंगति
- आपराधिक और कल्याणकारी कानूनों के बीच टकराव: भारतीय न्याय संहिता, की धारा 124 में एसिड फेंकने और एसिड पिलाने दोनों को समान अपराध माना गया है।
- विद्यमान अंतर: याचिका में तर्क दिया गया कि जब आपराधिक कानून दोनों प्रकार के कृत्यों को समान अपराध मानता है, तो कल्याणकारी कानून में उनके बीच भेद करना कानूनी रूप से असंगत है।
उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (Purposive Interpretation) का सिद्धांत
- अर्थ: उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (Purposive Interpretation) का अर्थ है किसी कानून की व्याख्या विधायकों के आशय के अनुसार करना, न कि केवल उसके शाब्दिक शब्दों के आधार पर।
- प्रयोग: चूँकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए न्यायालय से आग्रह किया गया कि इसे उदारतापूर्वक व्याख्यायित करते हुए एसिड हिंसा के सभी पीड़ितों को इसके दायरे में शामिल किया जाए।
- याचिका में अनुरोध किया गया कि “एसिड फेंकना” वाक्यांश को व्यापक अर्थ में “एसिड का उपयोग” के रूप में पढ़ा जाए।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु
- एसिड सेवन को शामिल करना: अब जिन्हें जबरन एसिड पिलाया गया है, उन्हें कानूनी रूप से उन लोगों के बराबर माना जाएगा जिन पर एसिड फेंका गया है।
- पूर्वव्यापी प्रभाव: यह निर्णय वर्ष 2016 से पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा।
- सरकार को पिछले 10 वर्षों में ऐसे सभी पीड़ितों की पहचान करनी होगी और उन्हें लाभ प्रदान करने होंगे, जिन्हें पहले नजरअंदाज किया गया था।
- कमज़ोर प्रतिरोध पर चिंता: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वर्त्तमान दंड एसिड हमलों को रोकने के लिए पर्याप्त प्रतिरोध उत्पन्न नहीं कर रहे हैं, इसलिए ऐसे अपराधों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने हेतु अधिक कठोर उपायों की आवश्यकता है।
- प्रमाण का उल्टा भार (Reverse Burden of Proof): अदालत ने सुझाव दिया कि एसिड हमले के मामलों में “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” के सिद्धांत में कुछ हद तक बदलाव किया जाए और आरोपी पर अपनी निर्दोषता साबित करने का दायित्व डाला जाए।
- विक्रेता की जिम्मेदारी: प्रतिरोध (Deterrence) को मजबूत करने के लिए अदालत ने सुझाव दिया कि यदि नियमों के बावजूद बाजार में एसिड आसानी से उपलब्ध है, तो विक्रेता को भी सह-अभियुक्त (Co-Accused) बनाया जाना चाहिए।
मुकदमों के लंबित रहने संबंधी चिंता
- मामलों की बढ़ती संख्या: अदालत ने वर्ष 2013 के बाद से एसिड हमलों की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि दर्ज की है।
- लंबित मुकदमे: उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 198 मामले लंबित पाए गए।
- इसके बाद पश्चिम बंगाल का स्थान रहा, जहाँ 160 मामले लंबित है।
- गुजरात में 114 मामले लंबित हैं।
- बिहार में 68 मामले लंबित हैं।
- अदालत ने विलंबित सुनवाई को “व्यवस्था का मजाक” बताया।
- कम लंबित मामले वाले राज्य:
- उत्तराखंड में 3 मामले लंबित हैं।
- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कुल मिलाकर 5 लंबित मामले सामने आए।
- उच्च न्यायालयों को निर्देश: पिछले वर्ष दिसंबर में अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को अपने-अपने क्षेत्राधिकार में लंबित एसिड अटैक मामलों का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘एसिड अटैक पीड़ित’ की परिभाषा का विस्तार भारत में कल्याणकारी कानूनों की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (Purposive Interpretation) की निरंतर आवश्यकता को उजागर करता है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 तथा ऐसे मामलों में वर्त्तमान न्यायिक लंबितता (Judicial Backlog) के संदर्भ में इस कथन की चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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