संदर्भ:
वर्तमान सरकारी स्वास्थ्य योजनाएँ अक्सर किशोर लड़कियों (0-25 वर्ष) या वृद्ध महिलाओं (60+) को लक्षित करती हैं, जिससे 25 से 60 वर्ष की आयु की महिलाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत ब्लाइंड स्पॉट (अभाव) रह जाता है।
मुख्य बिन्दु:
- मझधार पहल (Majhdhaar Initiative): PCI इंडिया + AIIMS पटना द्वारा शोध; 25-60 वर्ष की आयु की महिलाओं के स्वास्थ्य पर पहला प्रमुख अध्ययन।
- क्वार्टर-टू-मिडलाइफ वुमन (Quarter-to-Midlife Women): शोधकर्ता डॉ. शिवांगी शंकर और डॉ. सुदीप्ता मोंडल द्वारा 25-60 वर्ष की आयु की महिलाओं के लिए गढ़ा गया शब्द।
- द ‘मिसिंग मिडिल’ (The ‘Missing Middle’): इस आयु वर्ग की महिलाएँ मातृत्व और वरिष्ठ स्वास्थ्य योजनाओं दोनों से बाहर हैं।
‘तिहरा बोझ’ और सामाजिक-आर्थिक भूमिका :
- इस आयु वर्ग की महिलाएँ, तिहरे बोझ का सामना करती हैं: बच्चों तथा वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, और पेशेवर/आर्थिक जिम्मेदारियाँ।
- वे परिवारों और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में “उच्च आर्थिक भूमिका” निभाती हैं। यदि उनका स्वास्थ्य खराब होता है, तो पूरा परिवार गरीबी रेखा से नीचे जा सकता है।
- स्वास्थ्य परिवर्तन और संबंधित बाधाएँ:
- यह चरण संक्रामक रोगों से गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे- मधुमेह और हृदय रोग की ओर परिवर्तन का प्रतीक है।
- देखभाल में बाधाओं में सामाजिक-सांस्कृतिक उपेक्षा (महिलाओं का अंत में खाना या अपने स्वयं के स्वास्थ्य की अनदेखी करना), मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे (चिंता/अवसाद), और प्रमुख चिकित्सा खर्चों के लिए वित्तीय स्वतंत्रता की कमी शामिल है।
क्वार्टर-टू-मिडलाइफ महिलाओं की उपेक्षा के कारण:
- यह चरण एक महिला के जीवन के सबसे बड़े और सर्वाधिक सक्रिय हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, फिर भी स्वास्थ्य नीति में इसे व्यापक सीमा तक नजरअंदाज किया जाता है।
- प्रजनन के बाद बहिष्करण: कई महिलाएँ प्रसव वर्षों के बाद मातृत्व स्वास्थ्य कार्यक्रमों से बाहर हो जाती हैं।
- वृद्धावस्था से पहले की उपेक्षा: वे अभी तक जराचिकित्सा (geriatric) देखभाल प्रणालियों के तहत कवर नहीं की गई हैं।
क्वार्टर-टू-मिडलाइफ महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता
- आर्थिक विकास: स्वस्थ मध्य जीवन (मिडलाइफ़) की महिलाएँ उत्पादकता बढ़ाती हैं, जिससे घरेलू आय और समग्र आर्थिक उत्पादन में वृद्धि होती है।
- अंतर-पीढ़ीगत प्रभाव: महिलाओं का स्वास्थ्य सीधे तौर पर पीढ़ियों के पोषण, प्रतिरक्षा और कल्याण को प्रभावित करता है।
- जनसांख्यिकीय महत्त्व: बढ़ती जीवन प्रत्याशा मध्य जीवन को स्वस्थ बुढ़ापा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण चरण बनाती है।
- लैंगिक समानता: इस समूह पर ध्यान केंद्रित करना, प्रजनन भूमिकाओं से परे महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकारों की पुष्टि करता है।
- NCD रोकथाम: प्रारंभिक जाँच दीर्घकालिक बीमारी के बोझ और स्वास्थ्य देखभाल व्यय को कम करती है।
- मानव पूँजी निर्माण: स्वस्थ महिलाएँ कार्यबल की दक्षता और देखभाल गुणवत्ता में सुधार करती हैं।
- श्रम बल भागीदारी: बेहतर स्वास्थ्य आर्थिक गतिविधियों में निरंतर जुड़ाव को सक्षम बनाता है।
- सामाजिक स्थिरता: स्वस्थ महिलाएँ सामुदायिक नेटवर्क और जमीनी स्तर के शासन को मजबूत करती हैं।
क्वार्टर-टू-मिडलाइफ महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले प्रमुख मुद्दे:
- नीतिगत उपेक्षा: स्वास्थ्य नीतियाँ मातृत्व और किशोर देखभाल को प्राथमिकता देती हैं, जिससे मध्य जीवन की महिलाएँ केंद्रित हस्तक्षेपों से बाहर रह जाती हैं।
- छिपा हुआ रोग बोझ: खराब जाँच और जागरूकता के कारण NCDs का निदान देरी से होता है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम और लागत बढ़ जाती है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ: लैंगिक मानदंड और परिवार को प्राथमिकता देना महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल और निवारक प्रथाओं में देरी करते हैं।
- डेटा की कमी: जीवन-पाठ्यक्रम डेटा की अनुपस्थिति लक्षित नीति निर्माण में अंतराल उत्पन्न करती है।
- वित्तीय बाधाएँ: सीमित स्वायत्तता और उच्च आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय स्वास्थ्य देखभाल तक समय पर पहुँच को प्रतिबंधित करते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य अंतराल: कलंक और अपर्याप्त सेवाओं के कारण मनोवैज्ञानिक मुद्दों को कम पहचाना जाता है।
- व्यावसायिक जोखिम: अनौपचारिक क्षेत्र का कार्य महिलाओं को स्वास्थ्य सुरक्षा के बिना असुरक्षित स्थितियों में उजागर करता है।
- खंडित देखभाल प्रणाली: एकीकृत, निरंतर स्वास्थ्य देखभाल की कमी व्यापक सेवा वितरण में अंतराल उत्पन्न करती है।
वैश्विक सर्वोत्तम अभ्यास : भारत क्या सीख सकता है?
- जापान: निवारक मॉडल
- निंगन डॉक (Ningen Dock): 40-60 आयु वर्ग के लिए व्यापक निवारक जाँच; कार्यस्थलों के साथ एकीकृत।
- इसमें NCDs, कैंसर, रजोनिवृत्ति और हड्डियों के स्वास्थ्य को कवर किया जाता है।
- भारत के लिए सबक: नियमित मध्य जीवन जाँच को संस्थागत बनाना, तथा स्वास्थ्य को रोजगार के साथ एकीकृत करना।
- यूनाइटेड किंगडम: NHS हेल्थ चेक
- NHS जोखिम-आधारित स्क्रीनिंग: 40-74 आयु वर्ग को लक्षित करती है; हृदय रोग, मधुमेह और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करती है।
- भारत के लिए सबक: जोखिम-आधारित निवारक जाँच के लिए प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों (PHCs में MBBS चिकित्सक) का उपयोग करें।
- WHO: जीवन-पाठ्यक्रम दृष्टिकोण
- जीवन-चक्र दृष्टिकोण: स्वास्थ्य को अलग-अलग हिस्सों में न देखें। बचपन से बुढ़ापे तक प्रोत्साहक, निवारक, उपचारात्मक और पुनर्वास देखभाल को एकीकृत करें।
- भारत के लिए सबक: योजना-आधारित विखंडन से हटकर समानता और जीवन-चक्र स्वास्थ्य मॉडल की ओर बढ़ें।
आगे की राह
- महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जीवन-चक्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिससे सभी आयु समूहों में निरंतर नीतिगत ध्यान सुनिश्चित हो सके।
- निवारक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को मजबूत करना, विशेष रूप से प्राथमिक स्तर पर रोगों का शीघ्र पता लगाने और प्रबंधन में मदद कर सकता है।
- पितृसत्तात्मक मानदंडों को संबोधित करना और अवैतनिक देखभाल कार्य का पुनर्वितरण, लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
- जागरूकता विस्तार, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और डेटा संग्रह तंत्र अधिक समावेशी और उत्तरदायी नीति निर्माण को सक्षम करेंगे।
निष्कर्ष
“मिसिंग मिडिल” का मुद्दा भारतीय समाज के भीतर गहन संरचनात्मक असमानताओं को उजागर करता है, जहाँ महिलाओं के योगदान को अक्सर उनकी प्रजनन भूमिकाओं से परे कम आंका जाता है। लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार तथा समावेशी और सतत सामाजिक विकास प्राप्त करने के लिए इस अंतराल को संबोधित करना आवश्यक है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. देखभाल अर्थव्यवस्था और अनौपचारिक क्षेत्र की रीढ़ होने के बावजूद, मध्य जीवन की महिलाएँ (25-60 वर्ष) भारत की स्वास्थ्य नीतियों में एक ‘मिसिंग मिडिल’ बनी हुई हैं। इस जनसांख्यिकीय द्वारा सामना की जाने वाली संरचनात्मक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए तथा जीवन-पाठ्यक्रम स्वास्थ्य देखभाल दृष्टिकोण के लिए उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
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