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प्रोजेक्ट 17A और फ्रिगेट्स

प्रोजेक्ट 17A और फ्रिगेट्स 6 May 2026

संदर्भ:

प्रोजेक्ट 17A भारतीय नौसेना द्वारा नीलगिरि-श्रेणी के फ्रिगेट्स विकसित करने की ₹45,000 करोड़ की पहल है, जो तीव्र, स्टील्थ (रडार से बचने वाले) युद्धपोत हैं और स्वतंत्र संचालन या बेड़े की सुरक्षा करने में सक्षम हैं।

प्रोजेक्ट 17A क्या है?

  • भारतीय नौसेना के लिए उन्नत स्टील्थ फ्रिगेट्स बनाने के लिए प्रोजेक्ट 17 का अनुवर्ती कार्यक्रम।
  • बेहतर डिजाइन, स्वचालन और उत्तरजीविता के साथ नीलगिरि-श्रेणी के स्टील्थ फ्रिगेट्स पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • अनुमानित लागत: ~₹45,000 करोड़
  • हालिया विकास: आईएनएस महेंद्रगिरि (7वाँ फ्रिगेट) का जलावतरण/कमीशनिंग

फ्रिगेट (Frigate) क्या है?

  • एक तेज गति से चलने वाला, बहु-भूमिका युद्धपोत, जिसका उपयोग निम्नलिखित के लिए किया जाता है:
    • बेड़े की रक्षा (Escorting) और व्यापारी जहाजों की सुरक्षा करना
    • समुद्री क्षेत्रों में स्वतंत्र संचालन
  • लैस:
    • एंटी-एयर वारफेयर सिस्टम
    • एंटी-सरफेस वारफेयर क्षमताएँ
    • एंटी-सबमरीन वारफेयर (ASW) सिस्टम

रणनीतिक महत्त्व

  • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • बढ़ती चीनी नौसैनिक उपस्थिति का मुकाबला करना।
  • समुद्री संचार लाइनों (SLOCs) की रक्षा करना।
  • शक्ति प्रदर्शन और नौसैनिक निवारण (Naval deterrence) को बढ़ाना।

इससे संबंधित प्रमुख मुद्दे:

  • पेपर कमीशनिंग” चिंता: जहाजों को तब भी कमीशन घोषित कर दिया जाता है, जब महत्त्वपूर्ण प्रणालियाँ (इंजन, सेंसर, हथियार) अधूरी होती हैं।
    • यह प्रतीकात्मक उपलब्धि बनाम परिचालन तत्परता संबंधी चिंता उत्पन्न करता है।
  • आयात निर्भरता: दावा किया गया कि लगभग 75% स्वदेशीकरण मुख्य रूप से संरचनात्मक/यांत्रिक है। महत्त्वपूर्ण घटक अभी भी आयात किए जाते हैं:
    • प्रणोदन प्रणाली (Propulsion systems)
    • उन्नत रडार और सेंसर
    • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली
    • सटीक हथियार (Precision weapons)
  • क्षमता अंतराल (सेंसर घाटा): प्रभावी नौसैनिक युद्ध उच्च गुणवत्ता वाले सेंसर और सोनार प्रणाली पर निर्भर करता है।
    • कमजोर पहचान क्षमता एंटी-सबमरीन युद्ध को कमजोर करती है, खासकर चीन के खिलाफ।
  • बुनियादी ढाँचा और पारिस्थितिकी तंत्र की कमी: सहायता बुनियादी ढाँचे और एकीकरण प्रणालियों की कमी प्रभावशीलता को कम करती है।
    • यह बिना सक्षम प्रणालियों के संपत्ति होने जैसा है।
  • उपयोग का गलत संरेखण: कम तीव्रता वाले खतरों (पाइरेसी, विद्रोही) के लिए हाई-एंड फ्रिगेट्स का उपयोग किया जा रहा है।
    • इसका परिणाम अक्षम संसाधन उपयोग है (“मच्छर मारने के लिए तोप का उपयोग करना”)।

परिचालन ढाँचा : पहचानना–निर्णय लेना–प्रतिक्रिया देना

  • पहचानना (Detect): उपग्रह और पानी के नीचे के सेंसर खतरों की पहचान करते हैं।
  • निर्णय लेना (Decide): नौसेना मुख्यालय डेटा का विश्लेषण करता है, और प्रतिक्रिया की योजना बनाता है।
  • प्रतिक्रिया देना (Respond): फ्रिगेट्स जैसी नौसैनिक परिसंपत्तियों की तैनाती।
  • मुद्दा: कमजोर सेंसर इस ढाँचे की प्रभावशीलता को कम कर देते हैं।

आगे की राह

  • वास्तविक स्वदेशीकरण: मुख्य प्रौद्योगिकियों (इंजन, सेंसर, हथियार) पर ध्यान केंद्रित करें।
  • क्षमता-आधारित कमीशनिंग: शामिल करने से पहले पूर्ण परिचालन तत्परता सुनिश्चित करें।
  • सेंसर इकोसिस्टम को मजबूत करना: उन्नत सोनार और निगरानी प्रणालियों में निवेश करें।
  • संतुलित नौसैनिक रणनीति: विभिन्न खतरे के स्तरों के लिए उपयुक्त प्लेटफॉर्म का उपयोग करें।
  • आपूर्ति शृंखला लचीलापन: भू-राजनीतिक रूप से अस्थिर भागीदारों पर निर्भरता कम करें।

निष्कर्ष

प्रोजेक्ट 17A भारत की नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है, लेकिन क्षमता अंतराल, आयात निर्भरता और समय से पूर्व कमीशनिंग इसकी प्रभावशीलता को कमजोर करती है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के संदर्भ में विश्वसनीय समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतीकात्मक स्वदेशीकरण से ठोस तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर परिवर्तन आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: स्वदेशी नौसैनिक जहाज निर्माण में महत्त्वपूर्ण निवेश के बावजूद, भारत का समुद्री सुरक्षा ढाँचा गंभीर क्षमता अंतराल का सामना कर रहा है। प्रभावी नौसैनिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में संरचनात्मक चुनौतियों का परीक्षण कीजिए तथा परिचालन तत्परता को मजबूत करने के उपाय सुझाइए।

(10 अंक, 150 शब्द)

प्रोजेक्ट 17A और फ्रिगेट्स

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