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भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र में विद्यमान वास्तविक संकट

Lokesh Pal July 07, 2026 05:15 5 0

संदर्भ:

आधिकारिक दावों के बावजूद, कि भारत के 91.1% समुद्री मत्स्य स्टॉक संधारणीय हैं, इनशोर (तटीय) मत्स्यन के पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण, कमजोर तटीय शासन और यंत्रीकृत ट्रॉलींग के अनियंत्रित विस्तार को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं, जिससे समुद्री मत्स्य पालन की दीर्घकालिक स्थिरता पर प्रश्न उठ रहे हैं।

आधिकारिक मूल्यांकन:

  • सरकार का स्थिरता का दावा: केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के अनुमानों के आधार पर, भारत सरकार के अनुसार अधिकांश वाणिज्यिक मत्स्य स्टॉक अच्छी स्थिति में हैं, जिसमें 2022 में मूल्यांकित 135 मत्स्य स्टॉकों में से 91.1% संधारणीय पाए गए।
  • एफएओ (FAO) का विपरीत मूल्यांकन: खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का मानना है, कि अधिकांश प्रमुख समुद्री मत्स्य स्टॉकों का पूरी तरह से दोहन हो चुका है, जो अति-क्षमता, अनियमित पहुँच और यंत्रीकृत ट्रॉलरों तथा छोटे पैमाने के मछुआरों के मध्य बढ़ती प्रतिस्पर्धा की पहचान करता है।
  • स्टॉक मूल्यांकन की सीमाएँ: विभिन्न देशों के विपरीत जो समुद्र में वैज्ञानिक स्टॉक मूल्यांकन करते हैं, CMFRI मुख्य रूप से भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर मछली स्टॉक का अनुमान लगाने के लिए मछली लैंडिंग डेटा (पकड़ी गई मछली के तट पर आने के आँकड़े) पर निर्भर करता है, जो समुद्री संसाधनों के वास्तविक स्वास्थ्य को सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है।

घटते इनशोर (तटीय) समुद्री पारिस्थितिक तंत्र:

  • तटीय आवासों का क्षरण: मुख्य चिंता केवल अत्यधिक मछली पकड़ना नहीं है, बल्कि इनशोर बेंटिक पारिस्थितिक तंत्र (समुद्र तल का पर्यावरण) का क्षरण है, जो व्यावसायिक रूप से मूल्यवान मत्स्य प्रजातियों के प्रजनन, भोजन तथा विकास का समर्थन करता है।
  • पारिस्थितिक कारक: घटते मत्स्य पालन का संबंध बांधों के कारण नदियों के पोषक तत्त्वों के प्रवाह में कमी, मैंग्रोव विनाश, औद्योगिक, कृषि और शहरी प्रदूषण तथा आवास क्षरण से है, जो तटीय जल को असमान रूप से प्रभावित करते हैं।
  • महाद्वीपीय मग्नतट का महत्त्व: भारत का अपेक्षाकृत संकीर्ण महाद्वीपीय मग्नतट, विशेष रूप से 12-नॉटिकल-मील प्रादेशिक जल के भीतर, देश का सबसे उत्पादक मछली पकड़ने वाला क्षेत्र है और इसलिए इसके लिए मजबूत पारिस्थितिक सुरक्षा की आवश्यकता है।

मुख्य चुनौतियाँ:

  • यंत्रीकृत ट्रॉलींग का विस्तार: 1960 के आसपास अपनी शुरुआत के बाद से, यंत्रीकृत ट्रॉलींग का तेजी से विस्तार हुआ है, जिसमें 64,000 से अधिक यंत्रीकृत मछली पकड़ने वाले जहाज कार्य कर रहे हैं और बेड़े की क्षमता लगातार बढ़ रही है।
  • पारिस्थितिक क्षरण: निरंतर बॉटम ट्रॉलींग (समुद्र तल को कुरेदना) समुद्र के तल को नुकसान पहुँचाती है, समुद्री वनस्पतियों और जीवों को नष्ट तथा मछली के प्रजनन आवासों को कमजोर करती है, जबकि प्रदूषण, मैंग्रोव हानि और नदियों के पोषक तत्त्वों के प्रवाह में कमी तटीय पारिस्थितिक तंत्र को और खराब करती है।
  • आजीविका संघर्ष: यंत्रीकृत ट्रॉलरों के विस्तार ने पारंपरिक छोटे मछुआरों के साथ संघर्ष को तीव्र कर दिया है, तथा पाक की खाड़ी (Palk Bay) में भारत-श्रीलंका मत्स्य पालन विवादों में योगदान दिया है।
  • कमजोर मत्स्य शासन: 5-नॉटिकल-मील मछली पकड़ने के प्रतिबंध के खराब प्रवर्तन, अपर्याप्त गश्त क्षमता और पारंपरिक मछुआरा समुदायों की सीमित भागीदारी ने संधारणीय मत्स्य प्रबंधन को कमजोर किया है।
  • अपतटीय मत्स्य पालन पर बढ़ता दबाव: तटीय जल के निरंतर क्षरण के कारण छोटे पैमाने के और यंत्रीकृत दोनों तरह के मछुआरे ऑफशोर और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए बाध्य हो रहे हैं, जिससे परिचालन लागत और संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।

आगे की राह:

  • मत्स्य नीति को नया रूप देना: ध्यान गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के विस्तार से हटाकर तटीय मत्स्य पालन को बहाल करने पर केंद्रित किया जाना चाहिए, क्योंकि एफएओ का अनुमान है कि गहरे पानी से केवल मामूली लाभ होगा जबकि तटीय पारिस्थितिक तंत्र भारत के समुद्री मत्स्य पालन की नींव बना हुआ है।
  • तटीय पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण: मत्स्य प्रजनन आवासों को पुनर्जीवित करने के लिए मैंग्रोव संरक्षण, समुद्री प्रदूषण में कमी, बेंटिक पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण और यंत्रीकृत ट्रॉलींग के युक्तिकरण को प्राथमिकता देना।
  • मत्स्य शासन को मजबूत करना: तटीय मछली पकड़ने के नियमों के प्रवर्तन में सुधार करना, वैज्ञानिक स्टॉक और पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी का विस्तार, राज्य और केंद्र की संस्थागत क्षमता का निर्माण  तथा पारंपरिक मछुआरा समुदायों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • सीमापार चुनौतियों का समाधान: यंत्रीकृत ट्रॉलींग के नियमन और संधारणीय मत्स्य पालन के लिए भारत-श्रीलंका सहयोग को बढ़ाकर पाक खाड़ी के प्रबंधन को मजबूत करना।

निष्कर्ष

निष्कर्षस्वरूप भारत के मत्स्य पालन की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए उत्पादन लक्ष्यों से ध्यान हटाकर पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण पर केंद्रित करने की आवश्यकता है, जिसे मजबूत तटीय शासन, वैज्ञानिक प्रबंधन और समुद्री संसाधनों तथा मछुआरों की आजीविका दोनों के संतुलित संरक्षण का समर्थन प्राप्त हो सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की ओर भारत के संक्रमण को अक्सर तटीय जल के अत्यधिक दोहन के समाधान के रूप में उद्धृत किया जाता है। हालाँकि, तटीय समुद्री पारिस्थितिकी की उपेक्षा इस संक्रमण को व्यर्थ बना देगी। आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

 

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