RRB के लिए व्यवहार्यता योजना 2.0
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वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने वर्ष 2025-26 से 2027-28 तक की अवधि के लिए संशोधित व्यवहार्यता योजना 2.0 को स्वीकृति दी है।
RRB के लिए व्यवहार्यता योजना 2.0 के बारे में
- उद्देश्य: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) की वित्तीय स्थिरता, शासन व्यवस्था और दीर्घकालिक स्थायित्व को वर्ष 2025–28 के संशोधित 3-वर्षीय ढाँचे के माध्यम से सुदृढ़ करना।
- संस्थागत निरंतरता: वित्तीय सेवा विभाग द्वारा पूर्व में शुरू की गई व्यवहार्यता योजना (2021–25) पर आधारित, जिसका उद्देश्य निगरानी और प्रदर्शन में सुधार करना है।
- दायरा: भारत के सभी 28 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों पर लागू, जिससे एकरूप सुधार और निगरानी सुनिश्चित होती है।
- चार प्रमुख स्तंभ: केंद्रित है-
- परिचालन उत्कृष्टता
- संपत्ति गुणवत्ता
- लाभप्रदता
- विकास
- प्रदर्शन मानक: लगभग 30 मानकों की निगरानी करता है, जिनमें पूँजी से जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात, ऋण-जमा अनुपात, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) तथा डिजिटल व्यवस्था अपनाने की स्थिति शामिल हैं।
- राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ सामंजस्य: ग्रामीण ऋण विस्तार, वित्तीय समावेशन, डिजिटल बैंकिंग तथा सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को समर्थन प्रदान करता है।
- अपेक्षित प्रभाव: बदलती वित्तीय क्षेत्रीय परिस्थितियों में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की दक्षता, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और लचीलापन बढ़ाएगा।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs)
- स्थापना: क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 के तहत ग्रामीण ऋण पर नरसिंहम् समिति (1975) की सिफारिश पर की गई थी।
- उद्देश्य: वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में, विशेषकर लघु किसानों, कारीगरों और कमजोर वर्गों को बैंकिंग सेवाएँ प्रदान करना।
- प्रायोजक बैंक: प्रत्येक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक का प्रायोजन एक सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक करता है, जो पूँजी और प्रबंधकीय सहायता प्रदान करता है।
- स्वामित्व प्रारूप: त्रिपक्षीय संरचना-
- भारत सरकार: 50%
- प्रायोजक बैंक: 35%
- राज्य सरकार: 15%।
- हालिया एकीकरण (एक राज्य–एक RRB)
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- संरचनात्मक परिवर्तन: एक राज्य–एक RRB मॉडल को अपनाते हुए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की संख्या 43 से घटाकर 28 कर दी गई।
- उद्देश्य: ग्रामीण बैंकिंग में परिचालन दक्षता, शासन व्यवस्था, पूँजी सुदृढ़ता तथा डिजिटल सेवा वितरण में सुधार करना।
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आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0
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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0 को मंजूरी दी।
आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0 के बारे में
- ECLGS 5.0 एक सरकार समर्थित ऋण गारंटी योजना है, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया संकट जैसे बाहरी झटकों के दौरान व्यवसायों के लिए तरलता को बढ़ावा देना है।
- कार्यान्वयन एजेंसी: नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी लिमिटेड (NCGTC)।
- पात्र उधारकर्ता: MSME, सामान्य तथा अनुसूचित यात्री विमानन कंपनियाँ, जिनके ऋण खाते मानक श्रेणी में हैं।
- दायरा
- MSME के लिए 100% गारंटी
- गैर-MSME और विमानन क्षेत्र के लिए 90% गारंटी
- लक्षित ऋण प्रवाह: अतिरिक्त ₹2.55 लाख करोड़ ऋण प्रवाह को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य, जिसमें ₹5,000 करोड़ विमानन क्षेत्र के लिए निर्धारित हैं।
- ऋण सीमा
- वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही की अधिकतम कार्यशील पूँजी का 20% तक, अधिकतम सीमा ₹100 करोड़।
- विमानन कंपनियों के लिए अतिरिक्त ऋण 100% तक, प्रति उधारकर्ता अधिकतम ₹1,500 करोड़।
- अवधि एवं स्थगन अवधि
- MSME/गैर-MSME: 5 वर्ष (जिसमें 1 वर्ष की स्थगन अवधि शामिल)।
- विमानन कंपनियाँ: 7 वर्ष (जिसमें 2 वर्ष की स्थगन अवधि शामिल)।
- प्रभाव: विशेषकर संकट-प्रभावित क्षेत्रों में तरलता समर्थन, रोजगार संरक्षण, आपूर्ति शृंखला स्थिरता तथा आर्थिक लचीलापन को बढ़ावा देता है।
आपातकालीन ऋण रेखा गारंटी योजना (ECLGS)
- ECLGS को वर्ष 2020 में आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत शुरू किया गया था, ताकि कोविड-19 लॉकडाउन से प्रभावित व्यवसायों को सहायता प्रदान की जा सके।
- उद्देश्य: MSME और संकटग्रस्त क्षेत्रों को आपातकालीन कार्यशील पूँजी सहायता प्रदान करना, ताकि वे परिचालन दायित्वों को पूरा कर सकें और आर्थिक गतिविधियों को पुनः प्रारंभ कर सकें।
- ECLGS 1.0: 29 फरवरी, 2020 तक के बकाया ऋण का 20% तक अतिरिक्त ऋण बिना संपार्श्विक के प्रदान किया गया।
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- इसमें MSME, व्यावसायिक उद्यमों तथा मुद्रा उधारकर्ताओं को 100% सरकारी गारंटी के साथ शामिल किया गया।
- ECLGS 2.0: कामथ समिति द्वारा चिह्नित 26 संकटग्रस्त क्षेत्रों तथा स्वास्थ्य क्षेत्र पर केंद्रित।
- ECLGS 3.0: आतिथ्य, पर्यटन तथा मनोरंजन जैसे क्षेत्रों के लिए बकाया ऋण का 40% तक ऋण प्रदान किया गया।
- ECLGS 4.0: ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्रों की स्थापना के लिए ₹2 करोड़ तक के 100% गारंटी वाले ऋण प्रदान किए गए।
- इससे अस्पतालों, नर्सिंग होम, क्लीनिकों तथा मेडिकल कॉलेजों को लाभ मिला, जिसमें ब्याज दर की अधिकतम सीमा 7.5% निर्धारित थी।
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हंतावायरस

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अटलांटिक महासागर में एक क्रूज जहाज पर हंतावायरस संक्रमण के संदिग्ध प्रकोप से तीन यात्रियों की मृत्यु तथा कई अन्य के संक्रमित होने की सूचना मिली है।
हंतावायरस के बारे में
- वायरस की प्रकृति: हंतावायरस, कृंतक-जनित वायरसों का एक समूह है, जो मुख्य रूप से संक्रमित चूहों तथा अन्य कृंतकों एवं उनके मल, मूत्र या लार के संपर्क से मनुष्यों में फैलता है।
- मनुष्य से मनुष्य में संक्रमण अत्यंत दुर्लभ होता है।
- लक्षण: बुखार, मांसपेशियों में दर्द, थकान, खाँसी, साँस लेने में कठिनाई।
- इससे होने वाले रोग
- हंतावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (HPS) — फेफड़ों को प्रभावित करता है।
- रक्तस्रावी ‘फीवर रीनल सिंड्रोम’ (HFRS) — गुर्दों को प्रभावित करता है।
- उपचार: इसका कोई विशिष्ट उपचार उपलब्ध नहीं है; उपचार मुख्यतः सहायक तथा गहन चिकित्सीय देखभाल पर आधारित होता है।
- निवारक उपाय
- कृंतक नियंत्रण तथा स्वच्छता संक्रमण के जोखिम को कम करते हैं।
- भोजन का उचित भंडारण तथा कचरा प्रबंधन संदूषण को रोकते हैं।
- कृंतक-प्रभावित क्षेत्रों से बचना संक्रमण के जोखिम को कम करता है।
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जमैका, सूरीनाम तथा त्रिनिदाद एंड टोबैगो

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विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जमैका, सूरीनाम तथा त्रिनिदाद एंड टोबैगो की आधिकारिक यात्रा प्रारंभ की।
- इन देशों का भारत के साथ गिरमिटिया समुदायों की उपस्थिति के कारण विशेष संबंध है।
गिरमिटिया के बारे में
- गिरमिटिया का अर्थ: “गिरमिटिया” उन भारतीयों को कहा जाता है, जिन्हें 19वीं और 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों, विशेषकर ब्रिटिशों द्वारा, अनुबंधित श्रमिकों के रूप में विदेशी उपनिवेशों में ले जाया गया था।
- प्रणाली की उत्पत्ति: यह व्यवस्था दास प्रथा के उन्मूलन के बाद अस्तित्व में आई, जब कैरेबियन, फिजी, मॉरीशस, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों की बागान अर्थव्यवस्थाओं को गन्ना, चाय, रबर तथा अन्य नकदी फसलों के बागानों के लिए बड़े पैमाने पर श्रम की आवश्यकता थी।
- शब्द की उत्पत्ति: यह शब्द “एग्रीमेंट” से उत्पन्न हुआ, जिसे भारतीय श्रमिक “गिरमिट” के रूप में उच्चारित करते थे, जब वे श्रम अनुबंधों पर हस्ताक्षर करते थे।
जमैका के बारे में
- स्थान: कैरेबियन सागर में स्थित एक द्वीपीय राष्ट्र, जो अटलांटिक महासागर से जुड़ा हुआ है।
- यह ग्रेटर एंटिलीज का हिस्सा है, जिसमें कैरेबियन के बड़े द्वीप — क्यूबा, हिस्पानियोला, जमैका तथा प्यूर्टो रिको शामिल हैं।
- राजधानी एवं सबसे बड़ा शहर: किंग्स्टन।
- क्षेत्रीय संगठन: कैरिकॉम (कैरेबियन समुदाय) का सदस्य।
सूरीनाम के बारे में
- स्थान: दक्षिण अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित एक देश।
- राजधानी: पारामारिबो।
- सीमाएँ: पश्चिम में गुयाना, पूर्व में फ्रेंच गुयाना, दक्षिण में ब्राज़ील तथा उत्तर में अटलांटिक महासागर से घिरा हुआ है।
- क्षेत्रीय समूह: कैरिकॉम, संयुक्त राष्ट्र, इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का सदस्य।
- भौगोलिक विशेषता: सूरीनाम का 90% से अधिक क्षेत्र उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से आच्छादित है और यह गुयाना शील्ड–अमेजन वर्षावन क्षेत्र का हिस्सा है, जो विश्व के सबसे अधिक जैव-विविधता वाले पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है।
- गुयाना शील्ड उत्तर-पूर्वी दक्षिण अमेरिका में फैली एक प्राचीन भू-वैज्ञानिक संरचना है, जो वेनेजुएला, कोलंबिया, ब्राजील, गुयाना, सूरीनाम तथा फ्रेंच गुयाना के कुछ हिस्सों को आच्छादित करती है।
- प्राकृतिक संसाधन: सोना, तेल, बॉक्साइट तथा लकड़ी संसाधनों से समृद्ध।
त्रिनिदाद और टोबैगो के बारे में
- स्थान: कैरेबियन का सबसे दक्षिणी द्वीपसमूह राष्ट्र, जिसमें त्रिनिदाद और टोबैगो द्वीपों के साथ छोटे द्वीप भी शामिल हैं।
- ये वेनेजुएला के उत्तर-पूर्वी तट के निकट स्थित हैं।
- राजधानी: पोर्ट ऑफ स्पेन।
- महत्त्व: द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) तथा पेट्रो-रसायनों का प्रमुख निर्यातक।
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कपास उत्पादकता मिशन
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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2026–27 से 2030–31 की अवधि के लिए ₹5,659.22 करोड़ के परिव्यय के साथ “कपास उत्पादकता मिशन” को मंजूरी दी।
- मिशन के प्रमुख बिंदु
- दृष्टि: यह मिशन भारत सरकार की 5F दृष्टि (फार्म से फाइबर, फाइबर से फैक्टरी, फैक्टरी से फैशन और फैशन से विदेश) के अनुरूप है।
- दायरा: प्रारंभिक चरण में यह मिशन 14 राज्यों के 140 जिलों को कवर करेगा।
- मुख्य उद्देश्य
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- उत्पादकता में वृद्धि: उच्च उपज देने वाली, जलवायु-सहिष्णु तथा कीट-प्रतिरोधी कपास किस्मों का विकास।
- प्रौद्योगिकी: उन्नत कपास उत्पादन तकनीकों का विस्तार, जैसे— उच्च घनत्व रोपण प्रणाली (HDPS), कम दूरी रोपण (CS), समेकित कपास प्रबंधन तथा अतिरिक्त लंबा रेशा (ELS) कपास को बढ़ावा देना।
- गुणवत्ता एवं अवसंरचना सुधार: जिनिंग तथा प्रसंस्करण कारखानों का आधुनिकीकरण, साथ ही संदूषण-मुक्त और वैश्विक मानकों के अनुरूप कपास सुनिश्चित करने के लिए मानकीकृत एवं मान्यता प्राप्त कपास परीक्षण अवसंरचना को सुदृढ़ करना।
- ब्रांडिंग एवं बाजार सुधार: कस्तूरी कॉटन भारत के अंतर्गत मजबूत ब्रांडिंग तथा ट्रेसेबिलिटी पहल, ताकि भारतीय कपास को एक प्रीमियम, सतत् और वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय उत्पाद के रूप में स्थापित किया जा सके।
- कस्तूरी कॉटन भारत प्रसंस्कृत लिंट कपास गाँठों के लिए एक प्रमाणीकरण एवं ब्रांडिंग पहल है।
- सततता एवं विविधीकरण: कपास अपशिष्ट पुनर्चक्रण, परिपत्र अर्थव्यवस्था पद्धतियों को बढ़ावा देना तथा सन, रैमी, सिसल, मिल्कवीड, बाँस और केले के रेशे जैसे प्राकृतिक रेशों में विविधीकरण को प्रोत्साहित करना।
- कार्यान्वयन ढाँचा: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा वस्त्र मंत्रालय।
कपास [जीनस: गॉसिपियम (Gossypium)] के बारे में
- फसल की प्रकृति: कपास एक अर्द्ध-शुष्क रेशेदार फसल है, जिसे उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय जलवायु परिस्थितियों में उगाया जाता है।
- जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ: कपास के बीजों के अंकुरण के लिए लगभग 15°C न्यूनतम तापमान तथा उत्तम वृद्धि के लिए 21°C–27°C तापमान की आवश्यकता होती है।
- फ्रूटिंग (Fruiting) अवस्था के दौरान गर्म दिन और ठंडी रातें फली (Boll) के विकास एवं रेशे की गुणवत्ता को बेहतर बनाती हैं।
- मिट्टी संबंधी आवश्यकताएँ: कपास अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में सबसे अच्छी तरह उगती है और उत्तर भारत की जलोढ़ मृदा, मध्य भारत की काली कपास (रेगुर) मृदा और दक्षिण भारत की मिश्रित काली और लाल मृदा में इसकी खेती की जाती है।
- प्रमुख कपास क्षेत्र
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- उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा, राजस्थान
- मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश
- दक्षिणी क्षेत्र: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक।
- भारत में कपास की प्रजातियाँ: भारत विश्व का एकमात्र देश है जहाँ कपास की सभी चार प्रमुख प्रजातियों- आर्बोरियम, हर्बेसियम, बारबाडेंस और हिरसुटम की खेती की जाती है।
- वर्षा आधारित निर्भरता: भारत में लगभग 65% कपास क्षेत्र वर्षा आधारित है, जिसके कारण उत्पादन काफी हद तक मानसून के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
- कीट और रोग: प्रमुख खतरों में गुलाबी बॉलवर्म, सफेद मक्खी, CLCuV, बॉल रॉट और ‘टोबैको स्ट्रीक वायरस’ (TSV) शामिल हैं।
- सरकारी उपाय: प्रमुख पहलों में बीटी कपास का संवर्द्धन, कपास किसान ऐप और भारतीय कपास निगम (CCI) के माध्यम से खरीद संचालन शामिल हैं।
- कपास के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): कपास उन 14 खरीफ फसलों में से एक है, जो MSP व्यवस्था के अंतर्गत आती है और MSP की सिफारिशें कृषि लागत तथा मूल्य आयोग द्वारा की जाती हैं।
- भारत में कपास उत्पादन: वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का कपास उत्पादन 290.91 लाख गाँठ रहा, जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, कर्नाटक और राजस्थान देश के शीर्ष पाँच उत्पादक राज्य हैं।
- भारत की वैश्विक स्थिति: वैश्विक कपास उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है।
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भारत का प्रथम ग्रीन मेथेनॉल प्लांट
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भारत का पहला पोर्ट-आधारित ग्रीन मेथेनॉल प्लांट गुजरात के कांडला स्थित दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण में स्थापित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य जहाजों के लिए मरीन फ्यूल (Marine Fuel) का उत्पादन करना है।
कांडला के ग्रीन मेथेनॉल प्लांट की प्रमुख विशेषताएँ
- फीडस्टॉक (Feedstock): यह प्लांट प्रोसोपिस जुलीफोरा (Prosopis juliflora) का उपयोग करेगा, जिससे एक आक्रामक खरपतवार को उपयोगी बायोफ्यूल में परिवर्तित किया जाएगा।
- उत्पादन क्षमता: यह एक पायलट प्लांट है, जो प्रतिदिन लगभग 5 टन मेथेनॉल का उत्पादन करेगा।
- प्रौद्योगिकी: इसमें बायोमास गैसीकरण तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसमें बायोमास को पहले सिनगैस (Syngas) में बदला जाएगा और फिर उत्प्रेरक प्रक्रिया द्वारा मेथेनॉल में परिवर्तित किया जाएगा।
- पर्यावरणीय लाभ: यह परियोजना CO₂, NOx तथा SOx उत्सर्जन को कम करने में सहायक होगी तथा बन्नी घासभूमि के पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना में मदद करेगी।
- नीतिगत महत्त्व: यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के ग्रीन शिपिंग लक्ष्यों तथा भारत की ग्रीन पोर्ट्स पहल को समर्थन देती है।
- महत्त्व: यह परियोजना आक्रामक प्रजातियों को हटाकर देशी घासभूमियों की पुनर्स्थापना और कम-उत्सर्जन, मरीन फ्यूल के उत्पादन के माध्यम से चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को बढ़ावा देती है।
प्रोसोपिस जुलीफोरा (Prosopis juliflora) के बारे में
- उत्पत्ति: यह एक काँटेदार झाड़ी/वृक्ष है, जिसका मूल स्थान मध्य एवं दक्षिण अमेरिका (विशेष रूप से मैक्सिको) है।
- भारत में परिचय: इसे 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश शासन द्वारा मरुस्थलीकरण (Desertification) को नियंत्रित करने के उद्देश्य से भारत लाया गया था।
- इसके बाद यह भारत के शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में सबसे आक्रामक विदेशी आक्रामक प्रजातियों में से एक बन गया।
- स्थानीय नाम: विलायती बबूल (उत्तर भारत) तथा गांडो बावल (गुजरात)।
- पारिस्थितिकी प्रभाव
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- भूजल स्तर को कम करता है।
- देशी वनस्पतियों से प्रतिस्पर्द्धा कर उन्हें समाप्त करता है।
- मृदा की लवणता बढ़ाता है तथा भूमि को क्षरित करता है।
- पर्यावरणीय खतरा: यह प्रजाति तेजी से फैलकर घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रही है।
- मुख्य चिंता: इसने विशेष रूप से कच्छ की बन्नी घासभूमि को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है।
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