दोहरे उपयोग वाले उपग्रह एवं उभरती अंतरिक्ष युद्ध संबंधी चुनौतियाँ

6 May 2026

संदर्भ

हाल ही में दोहरे उपयोग वाले उपग्रहों (Dual-Use Satellites) ने नागरिक एवं सैन्य उपयोगों के बीच की रेखा को अस्पष्ट कर दिया है, जिससे ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ तथा अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के अंतर्गत चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।

दोहरे उपयोग वाले उपग्रहों (Dual-Use Satellites) के बारे में

  • दोहरे उपयोग वाले उपग्रह ऐसे अंतरिक्ष तंत्र होते हैं, जो नागरिक एवं सैन्य दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं, जिससे वे आधुनिक संचार, नेविगेशन एवं युद्ध संचालन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं।

हालिया अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित युद्ध 

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ के माध्यम से सैन्य रसद अथवा हथियारों की तीव्र आपूर्ति हेतु कक्षीय कार्गो प्रक्षेपण प्रणालियाँ विकसित कर रहा है।
  • चीन: चीन ने उच्च-शक्ति माइक्रोवेव आधारित प्रणाली (TPG1000Cs) विकसित की है, जो तीव्र ऊर्जा तरंगों के माध्यम से उपग्रहों की इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को बिना मलबा उत्पन्न किए निष्क्रिय करने में सक्षम है।
  • भारत: भारत रक्षा अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी के माध्यम से क्षमताओं का विकास कर रहा है, जिसमें निगरानी, टोही एवं सूचना समेकन तथा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित लेजर-आधारित निर्देशित ऊर्जा हथियार (DEW MK-II(A)), जिसका परीक्षण वर्ष 2025 में किया गया, शामिल है।
  • यूरोप: यूरोप उपग्रह नेविगेशन संकेतों को व्यवधान से सुरक्षित रखने हेतु एंटी-जैमिंग प्रणालियाँ (NAVISHIELD) विकसित कर रहा है, जो गैलीलियो एवं जीपीएस जैसी प्रणालियों की सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं।

आधुनिक युद्ध में दोहरे उपयोग वाले उपग्रहों की भूमिका

  • नागरिक–सैन्य अभिसरण: दोहरे उपयोग वाले उपग्रह नागरिक एवं सैन्य कार्यों का एकीकरण करते हैं; जैसे वाणिज्यिक प्रणालियाँ सार्वजनिक संचार के साथ-साथ युद्धक्षेत्र समन्वय में भी सहायक होती हैं, जैसा कि यूक्रेन संघर्ष में देखा गया।
  • महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की आधारशिला: उपग्रह वैश्विक नेविगेशन प्रणाली, बैंकिंग एवं दूरसंचार जैसी आवश्यक प्रणालियों का आधार हैं; विशेष रूप से समय-संकेत आधारित वित्तीय लेनदेन इन्हें युद्ध में रणनीतिक संपत्ति बनाते हैं।
  • स्थैतिक युद्ध के सक्षमकर्ता: आधुनिक संघर्षों में जैमिंग, स्पूफिंग एवं साइबर हमलों का उपयोग बढ़ा है, जहाँ बिना भौतिक विनाश के संचार प्रणालियों को बाधित किया जा सकता है।
  • वैश्विक एवं बहुराष्ट्रीय प्रभाव: उपग्रह नेटवर्क सीमाओं से परे कार्य करते हैं, अतः व्यवधान एक साथ कई क्षेत्रों में जहाजों एवं विमानों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • उच्च रणनीतिक निर्भरता एवं शृंखलाबद्ध जोखिम: उपग्रहों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण किसी भी व्यवधान से विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव पड़ सकता है; संचार विफलता से आपात सेवाएँ, प्रशासन एवं आर्थिक तंत्र बाधित हो सकते हैं।

अंतरिक्ष में युद्ध संबंधी अंतरराष्ट्रीय विनियम

  • ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’: वर्ष 1967 में अंगीकृत, यह अंतरिक्ष विधि की आधारशिला है।
    • यह बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग को अनिवार्य बनाती है तथा कक्षा में परमाणु अथवा अन्य विनाशकारी सामूहिक हथियारों के प्रयोग को निषिद्ध करती है।
    • यह स्थापित करती है कि अंतरिक्ष “समस्त मानवता की साझा विरासत” है, जिससे राज्यों द्वारा अधिग्रहण निषिद्ध होता है तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन मिलता है, यद्यपि इसमें साइबर या द्वि-उपयोग प्रणालियों पर स्पष्ट प्रावधानों का अभाव है।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर (अनुच्छेद-2(4)): वर्ष 1945 में अंगीकृत, यह राज्यों की भौगोलिक अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग अथवा उसके खतरे को प्रतिबंधित करता है।
    • यह वैश्विक सुरक्षा एवं संप्रभुता के मूल सिद्धांतों को आधार प्रदान करता है।
    • हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि साइबर संचालन, जैसे उपग्रह व्यवधान, “बल प्रयोग” की श्रेणी में आते हैं या नहीं।
  • अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (जिनेवा अभिसमय): वर्ष 1949 में अंगीकृत, यह सशस्त्र संघर्ष के दौरान आचरण को विनियमित करती है।
    • यह भेदभाव, आनुपातिकता एवं आवश्यकता के सिद्धांतों पर बल देती है, जिससे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
    • दोहरे उपयोग वाले उपग्रह इस ढाँचे को चुनौती देते हैं, क्योंकि वे नागरिक एवं सैन्य लक्ष्यों के बीच की रेखा को अस्पष्ट कर देते हैं।

चुनौतियाँ

  • अंतरिक्ष शासन में विधिक अंतराल: विद्यमान ढाँचे जैसे ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ एवं संयुक्त राष्ट्र चार्टर साइबर हमलों अथवा दोहरे उपयोग वाले उपग्रहों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करते, जिससे आधुनिक अंतरिक्ष संघर्ष में नियामकीय शून्यता उत्पन्न होती है।
  • प्रौद्योगिकीय असमानता: अंतरिक्ष क्षमताएँ कुछ विकसित देशों तक सीमित हैं, जिससे विकासशील देशों की पहुँच असमान होती है तथा वे विदेशी वाणिज्यिक उपग्रह नेटवर्क पर अधिक निर्भर हो जाते हैं।
  • दायित्व निर्धारण संबंधी कमी: अंतरिक्ष में साइबर संचालन का पता लगाना स्पूफिंग एवं प्रॉक्सी नेटवर्क के कारण कठिन होता है, जिससे “आरोप निर्धारण संबंधी अंतराल” उत्पन्न होता है और अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत जवाबदेही एवं निवारक प्रभाव कमजोर पड़ता है।
  • अंतरिक्ष का बढ़ता सैन्यीकरण: सैन्य अभियानों में उपग्रहों पर बढ़ती निर्भरता, जैसे खुफिया जानकारी एवं लक्ष्य निर्धारण, अंतरिक्ष को एक प्रतिस्पर्द्धी रणनीतिक क्षेत्र में परिवर्तित कर रही है, जबकि इसके शांतिपूर्ण उपयोग के सिद्धांत विद्यमान हैं।

आगे की राह

  • विधिक मानकों का स्पष्टीकरण: अंतरिक्ष में साइबर संचालन को “बल प्रयोग” के रूप में परिभाषित करने हेतु अंतरराष्ट्रीय सहमति विकसित की जानी चाहिए।
  • सुरक्षित-आकृति आधारित प्रणालियाँ: उपग्रहों के संपूर्ण जीवन-चक्र में साइबर सुरक्षा ढाँचों को अपनाया जाना चाहिए।
  • वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना: देशों के बीच सूचना-साझाकरण एवं आरोप निर्धारण तंत्र को सशक्त किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

दोहरे उपयोग वाले उपग्रह आधुनिक युद्ध की प्रकृति को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं, जिसके लिए अद्यतन विधिक ढाँचे एवं सुदृढ़ साइबर सुरक्षा आवश्यक है, ताकि नवाचार, सुरक्षा एवं नागरिक अवसंरचना की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

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