संदर्भ
हाल ही में ममता बनर्जी ने चुनावी पराजय के बाद त्याग-पत्र देने से इनकार कर दिया, जिससे मुख्यमंत्री की पदच्युति एवं राज्यपाल की शक्तियों से संबंधित संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न हुए।
मुद्दे की प्रमुख पृष्ठभूमि
- निर्वाचन उपरांत संवैधानिक परंपरा: विधानसभा चुनावों के बाद यदि सत्तारूढ़ दल बहुमत खो देता है, तो निवर्तमान मुख्यमंत्री से त्याग-पत्र की अपेक्षा की जाती है, जिससे नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो सके।
- संवैधानिक संकट की स्थिति: त्याग-पत्र देने से इनकार करने पर गतिरोध उत्पन्न होता है, जिसमें राज्यपाल को संवैधानिक तंत्र, जैसे बहुमत परीक्षण अथवा पदच्युति के माध्यम से हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री के बारे में
- मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक कार्यपालिका प्रमुख होता है, जबकि राज्यपाल संविधान के अंतर्गत नाममात्र का प्रमुख होता है।
- प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-163: मुख्यमंत्री, राज्यपाल को सहायता एवं परामर्श देने वाली मंत्रिपरिषद का प्रमुख होता है।
- अनुच्छेद-164: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है; मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- अनुच्छेद-167: मुख्यमंत्री, राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के निर्णयों से अवगत कराता है।
- अनुच्छेद 172: राज्य विधानसभा का कार्यकाल उसकी प्रथम बैठक से पाँच वर्ष का होता है, जब तक कि उसे पूर्व में भंग न कर दिया जाए।
- नियुक्ति एवं पद से हटाना
- राज्यपाल बहुमत दल अथवा गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।
- मुख्यमंत्री तकनीकी रूप से राज्यपाल के “प्रसादपर्यंत” पद धारण करता है, किंतु व्यवहार में उसका पद विधानसभा के बहुमत पर निर्भर करता है।
- बहुमत खोने पर मुख्यमंत्री को त्याग-पत्र देना होता है अथवा बहुमत परीक्षण के बाद पद से हटाया जा सकता है।
- राज्यपाल की भूमिका
- बहुमत अथवा त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में नियुक्ति: राज्यपाल बहुमत दल के नेता को नियुक्त करता है अथवा त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए निर्धारित समय के भीतर बहुमत सिद्ध करने को कह सकता है।
- बहुमत परीक्षण सुनिश्चित करना: राज्यपाल मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दे सकता है, जिसे विश्वास का एकमात्र वैध परीक्षण माना जाता है।
- पदच्युति एवं संवैधानिक उपचार: यदि मुख्यमंत्री बहुमत खोने के बावजूद त्याग-पत्र देने से इनकार करे, तो राज्यपाल सरकार को बर्खास्त कर सकता है अथवा अनुच्छेद-356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर सकता है।
मुख्यमंत्री से संबंधित मामलों में न्यायिक दृष्टांत
- बहुमत परीक्षण सिद्धांत: एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बहुमत का परीक्षण केवल विधानसभा के पटल पर ही होना चाहिए, न कि राज्यपाल के विवेक से।
- राज्यपाल के विवेकाधिकार की सीमाएँ: नाबम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016) में न्यायालय ने निर्णय दिया कि राज्यपाल मनमाने ढंग से कार्य नहीं कर सकता तथा निर्वाचित सरकार को दरकिनार नहीं कर सकता है।
- मुख्यमंत्री पद हेतु पात्रता: बी.आर. कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य (2001) में न्यायालय ने कहा कि अयोग्य घोषित व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता है।
निष्कर्ष
संविधान लोकतांत्रिक निरंतरता सुनिश्चित करता है, जिसके अंतर्गत बहुमत समर्थन की अनिवार्यता, राज्यपाल के विवेकाधिकार पर सीमाएँ तथा बहुमत परीक्षण के माध्यम से राजनीतिक अनिश्चितता का समाधान किया जाता है।