प्रौद्योगिकी विकास एवं निवेश प्रोत्साहन (TDIP)
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सरकार ने देश की वैश्विक दूरसंचार उपस्थिति को सुदृढ़ करने के लिए प्रौद्योगिकी विकास एवं निवेश प्रोत्साहन (TDIP) योजना के संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
प्रौद्योगिकी विकास एवं निवेश प्रोत्साहन (TDIP) योजना के बारे में
- उद्देश्य: भारत की वैश्विक दूरसंचार मानकीकरण में भूमिका को मजबूत करना और स्वदेशी दूरसंचार प्रौद्योगिकियों के विकास को गति देना।
- वित्तीय प्रावधान: वर्ष 2026–31 की अवधि के लिए ₹203 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
- समर्थन ढाँचा: यह भारतीय संस्थाओं को वैश्विक मानकों के निर्माण में योगदान देने, अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने, तथा 5G/6G प्रौद्योगिकियों में प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता बढ़ाने हेतु एक संरचित मंच प्रदान करता है।
- वैश्विक मानकीकरण: यह निम्नलिखित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भागीदारी को प्रोत्साहित करता है:
- अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ
- थर्ड जेनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट (3GPP)
- वनएम2एम (oneM2M) पार्टनरशिप प्रोजेक्ट
- विस्तारित दायरा: इस योजना का दायरा बढ़ाकर नव उद्यम, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम, शिक्षण संस्थान, अनुसंधान संस्थान, दूरसंचार सेवा प्रदाता तथा उद्योग के अन्य भागीदारों को शामिल किया गया है, जिससे सहयोगात्मक नवाचार को बढ़ावा मिलता है।
- कार्यान्वयन तंत्र: यह योजना निम्नलिखित संस्थाओं के माध्यम से लागू की जाती है:-
- दूरसंचार मानक विकास सोसायटी, भारत
- दूरसंचार उत्कृष्टता केंद्र
- दूरसंचार परामर्शी इंडिया लिमिटेड
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दिल्ली में ब्रिक्स–मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका (MENA) बैठक
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भारत ने 23–24 अप्रैल को नई दिल्ली में ब्रिक्स के उप-विदेश मंत्रियों और मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका (MENA) के विशेष दूतों की बैठक की अध्यक्षता की।
ब्रिक्स–MENA चर्चाओं के परिणाम
- गाजा संघर्ष पर चिंता: सदस्यों ने मध्य पूर्व की स्थिति, विशेषकर फिलिस्तीन–गाजा संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की।
- मानवीय सहायता एवं आतंकवाद-रोधी ध्यान: मानवीय संकटों के समाधान, संघर्षोत्तर पुनर्निर्माण, तथा आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता बनाए रखने पर जोर दिया गया।
- क्षेत्रीय स्थिरता संबंधी प्राथमिकता: सीरिया, यमन, इराक, लीबिया और सूडान में राजनीतिक स्थिरता और विकास की आवश्यकता पर बल दिया गया।
- संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का समर्थन: फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) की मानवीय सहायता में भूमिका को मान्यता दी गई।
- समूह ने लेबनान में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल (UNIFIL) पर हमलों की भी निंदा की।
- भविष्य की भागीदारी: क्षेत्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2027 में चीन की अध्यक्षता में संवाद जारी रखने पर सहमति बनी।
ब्रिक्स–मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका (MENA) के बारे में
- यह ब्रिक्स देशों और मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र के बीच सहयोगात्मक संवाद मंच है।
- यह मंच शांति, सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और विकास से जुड़े मुद्दों पर बहुपक्षीय संवाद को बढ़ावा देता है।
- सदस्यता: ब्रिक्स–MENA कोई औपचारिक संगठन नहीं है, जिसकी स्थायी सदस्यता निश्चित हो।
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चीन का एटलस ड्रोन स्वार्म सिस्टम
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चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने अपना नया एटलस ड्रोन स्वार्म सिस्टम (Atelasi) प्रस्तुत किया है।
‘एटलस ड्रोन स्वार्म सिस्टम’ के बारे में
- एटलस ड्रोन स्वार्म सिस्टम एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित, ट्रक पर स्थापित की जाने वाली सैन्य प्रणाली है, जो एक साथ दर्जनों ड्रोन को लॉन्च और नियंत्रित कर सकती है।
- निर्माणकर्ता: इस प्रणाली का निर्माण चाइना इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉर्पोरेशन (CETC) द्वारा किया गया है।
- विशेषताएँ:
- सामूहिक प्रक्षेपण क्षमता: यह लगभग 300 सेकंड में 96 ड्रोन तैनात कर सकती है, जिससे समन्वित अभियानों को संचालित किया जा सकता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ‘स्वार्म’ क्षमता: ड्रोन स्वायत्त रूप से कार्य करते हैं, तथा न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के माध्यम से रियल टाइम में लक्ष्य में बदलाव कर सकते हैं।
- एकल ऑपरेटर नियंत्रण: पूरे स्वार्म को एक ही नियंत्रण प्रणाली के माध्यम से संचालित किया जाता है जिससे मानव संसाधन और प्रतिक्रिया समय कम होता है।
- उच्च गतिशीलता और छद्मावरण: ट्रक आधारित प्रणाली होने के कारण यह तीव्र तैनाती, छद्मावरण और स्थान परिवर्तन में सक्षम है, विशेषकर दूरदराज क्षेत्रों में।
- बहु-भूमिका संचालन: यह टोही, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और सटीक हमले जैसे कई कार्य एक साथ कर सकती है।
- नेटवर्क-केंद्रित युद्ध: यह एक लघु युद्धक्षेत्र नेटवर्क की तरह कार्य करती है जिसमें डेटा साझा करना और हमलों का समन्वय गतिशील रूप से होता है।
- AI आधारित युद्ध सिद्धांत: यह चीन की कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित, मानवरहित और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध रणनीति के अनुरूप है, जो उसके दीर्घकालिक सैन्य दृष्टिकोण का हिस्सा है।
- रणनीतिक प्रभाव: यह प्रणाली वायु रक्षा प्रणालियों को प्रभावित कर सकती है और रसद तंत्र को बाधित कर सकती है, जो विशेष रूप से LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा) और ताइवान जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
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तथागत के पवित्र अवशेषों का प्रदर्शन

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भगवान गौतम बुद्ध के पवित्र अवशेषों का वर्ष 2026 में पहली बार भारत के भीतर लद्दाख में प्रदर्शन किया जा रहा है।
तथागत के पवित्र अवशेषों का प्रदर्शन
- परिचय: यह एक ऐतिहासिक आयोजन है, जो मई 2026 में आयोजित हो रहा है, जिसमें नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय से लाए गए पिपरहवा अवशेषों को प्रदर्शित किया जा रहा है। इसका केंद्र शांति और करुणा के विषय पर है।
- “तथागत” बुद्ध के लिए प्रयुक्त एक आदरणीय उपाधि है, जिसका अर्थ है “जो इस प्रकार आए या गए”।
- यह आध्यात्मिक ज्ञान, प्रज्ञा और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का प्रतीक है।
- प्रदर्शनी का विषय: “सीमाओं से परे शांति”
- प्रदर्शनों की शृंखला: अवशेषों को पहले जीवेत्सल, लेह में प्रदर्शित किया जाएगा, इसके बाद उन्हें जांस्कर ले जाया जाएगा, और अंततः धर्म केंद्र में, जहाँ भिक्षु और भिक्षुणियाँ विशेष प्रार्थनाएँ करेंगी।
पिपरहवा अवशेषों के बारे में
- पिपरहवा अवशेष बुद्ध से संबंधित प्राचीन वस्तुएँ हैं और इन्हें सबसे पवित्र बौद्ध अवशेषों में माना जाता है।
- खोज: इन अवशेषों की खोज 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा उत्तर प्रदेश के पिपरहवा में की गई थी।
- यह स्थल प्राचीन कपिलवस्तु, अर्थात शाक्य गणराज्य की राजधानी, माना जाता है।
- अवशेषों का संग्रह:
- इस संग्रह में अस्थि अवशेष शामिल हैं, जो बुद्ध से संबंधित है।
- इसके साथ ही इसमें सिलखड़ी और क्रिस्टल के पात्र, बलुआ पत्थर से निर्मित संदूक, तथा अन्य मूल्यवान भेट की गई वस्तुएँ भी शामिल हैं।
- इन कलाकृतियों में स्वर्ण आभूषण, मोती, माणिक, पुखराज और नीलम सम्मिलित हैं।
- सांस्कृतिक महत्व:
- इन अवशेषों को उन मूल आठ स्तूपों का हिस्सा माना जाता है, जिनमें बुद्ध के दाह संस्कार के अवशेष स्थापित किए गए थे।
- पिपरहवा स्तूप को शाक्य कुल द्वारा बुद्ध के सम्मान में निर्मित किया गया।
- इनसे संबद्ध रत्नों का काल मौर्य साम्राज्य (लगभग 240–200 ईसा पूर्व) का है।
- ये अवशेष धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं तथा भारत की बौद्ध विरासत और वैश्विक आध्यात्मिक संबंधों का प्रतीक हैं।
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सोल थ्रेड्स (Soul Threads)

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केंद्रीय कुटीर उद्योग निगम (CCIC) ने “सोल थ्रेड्स” नामक एक डिजाइनर संग्रह लॉन्च किया है।
‘सोल थ्रेड्स’ के बारे में
- सोल थ्रेड्स, केंद्रीय कुटीर उद्योग निगम का पहला विरासत-आधारित डिजाइनर संग्रह है जिसमें हैंडलूम, हस्तशिल्प, डिजाइनर परिधान और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ शामिल हैं।
- सोल थ्रेड्स के उद्देश्य:
- मंच का निर्माण: यह डिजाइनरों, कारीगरों और सांस्कृतिक कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।
- विरासत संरक्षण: इसका उद्देश्य भारत की वस्त्र परंपराओं और शिल्प कौशल के संरक्षण पर केंद्रित है।
- महत्व:
- पुनर्जीवन पहल: यह केंद्रीय कुटीर उद्योग निगम की पुनर्जीवन पहल को दर्शाता है।
- बाजार में स्थिति सुदृढ़ करना: यह आधुनिक बाजारों में भारतीय हस्तशिल्प तक पहुँच को बढ़ाता है।
केंद्रीय कुटीर उद्योग निगम के बारे में:
- केंद्रीय कुटीर उद्योग निगम वस्त्र मंत्रालय के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम है, जो प्रामाणिक भारतीय हैंडलूम और हस्तशिल्प उत्पादों के संवर्द्धन तथा खुदरा विपणन से संबंधित है।
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भारत ने डोपिंग में ‘अत्यंत उच्च जोखिम’ की आशंका जताई

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एथलेटिक्स इंटीग्रिटी यूनिट (AIU), जो वैश्विक एथलेटिक्स में निष्पक्षता की निगरानी करती है, के द्वारा भारत को विश्व एथलेटिक्स एंटी-डोपिंग नियमों के तहत ‘श्रेणी ए’ में रखा गया है।
उच्च जोखिम वर्गीकरण के कारण:
- उच्च एडीआरवी भार: भारत में निरंतर एंटी-डोपिंग नियम उल्लंघनों (ADRVs) की संख्या बढ़ रही है।
- प्रणालीगत कमजोरी: भारत की डोपिंग-रोधी व्यवस्था, डोपिंग की व्यापकता के अनुपात में पर्याप्त नहीं है।
- सुधारों का सीमित प्रभाव: एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (AFI) द्वारा किए गए प्रयास पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं।
श्रेणी A का अर्थ:
- सर्वोच्च जोखिम की स्थिति: यह AIU द्वारा निर्धारित डोपिंग जोखिम की सबसे उच्च श्रेणी है।
- कठोर परीक्षण ढाँचे:
- बार-बार और कठोर परीक्षण
- राष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए न्यूनतम परीक्षण आवश्यकताएँ
- नियमों के तहत पुनर्वर्गीकरण: नियम 15 के अंतर्गत भारत को श्रेणी B से श्रेणी A में स्थानांतरित किया गया है।
- विश्व एथलेटिक्स एंटी-डोपिंग नियम 15: यह राष्ट्रीय संघों को उनके डोपिंग-रोधी कार्यक्रमों के लिए उत्तरदायी ठहराता है और डोपिंग जोखिम के अनुसार उपयुक्त व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है।
- सुधार का उदाहरण: बहरीन को श्रेणी A से हटा दिया गया है।
डोपिंग के मूल कारण:
- प्रशिक्षण-चक्र डोपिंग: खिलाड़ी प्रतियोगिताओं से पहले उच्च प्रदर्शन के लिए लॉन्ग ऑफ-सीजन प्रेक्टिस/प्रशिक्षण के दौरान प्रतिबंधित पदार्थों का उपयोग करते हैं।
- जूनियर स्तर की संवेदनशीलता: कमजोर निगरानी के कारण युवा खिलाड़ी डोपिंग में अधिक शामिल हो रहे हैं।
- जागरूकता और दबाव कारक: डोपिंग नियमों के प्रति कम जागरूकता और उच्च प्रदर्शन का दबाव खिलाड़ियों को प्रतिबंधित पदार्थों की ओर प्रेरित करता है।
राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी (NADA) से संबंधित समस्याएँ:
- पुरानी संरचनात्मक समस्याएँ: पुरानी व्यवस्थाएँ और संस्थागत कमजोरियाँ अब भी बनी हुई हैं।
- गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ: परीक्षणों में गुणवत्ता के बजाय संख्या पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
- मानव संसाधन की कमी: प्रशिक्षित कर्मियों की कमी तथा नेतृत्व में निरंतरता का अभाव।
- परीक्षण में कमियाँ: ठोस परीक्षण योजना का अभाव तथा कुछ आँकड़ों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध हो सकती है।
- संचालन संबंधी समस्याएँ: संविदा कर्मचारियों के बीच रिजाइन की उच्च दर।
समग्र प्रभाव:
- विश्वसनीयता का संकट: भारतीय एथलेटिक्स को गंभीर विश्वसनीयता संकट का सामना करना पड़ रहा है तथा भारतीय खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।
- भविष्य के जोखिम: यदि सुधार नहीं किए गए, तो अधिक प्रतिबंध, व्यक्तिगत पहचान को नुकसान, और वैश्विक अवसरों में कमी देखी जा सकतीहै।
- उदाहरण: वर्ष 2024 में फ्रांस ने डोपिंग चिंताओं के कारण भारत के तीन शीर्ष खिलाड़ियों को प्रवेश देने से मना कर दिया था।
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