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महानदी जल विवाद

25 Apr 2026

संदर्भ

महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण ने संकेत दिया है कि वह ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच जल-वितरण को लेकर शीघ्र ही अपना अंतिम निर्णय सुना सकता है, क्योंकि दोनों राज्य आपसी सहमति से किसी ठोस समाधान पर पहुचने में विफल रहे हैं।

महानदी जल विवाद के बारे में

  • विवाद की प्रकृति: यह विवाद महानदी के जल बंटवारे से संबंधित है, विशेषकर मानसून के अलावा अन्य समय में, जब निचले क्षेत्रों में जल की उपलब्धता अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। औपचारिक अंतर-राज्यीय जल बंटवारा समझौते का अभाव इस संघर्ष को और बढ़ाता है।

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  • ओडिशा की चिंताएँ: ओडिशा का तर्क है कि छत्तीसगढ़ द्वारा किए गए ऊपरी प्रवाह क्षेत्र में व्यापक निर्माण, जैसे अनेक बाँध या चेक डैम और बैराज, के कारण निचले क्षेत्रों में जल का प्रवाह कम हुआ है जिससे सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, मत्स्य पालन और पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।
  • छत्तीसगढ़ का पक्ष: छत्तीसगढ़ का कहना है कि नदी के जल के उपयोग पर उसका वैध अधिकार है, क्योंकि बेसिन के जलग्रहण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा उसके क्षेत्र में  है। राज्य का यह भी तर्क है कि उसकी परियोजनाएँ क्षेत्रीय विकास और जल सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। साथ ही, उसने प्रक्रियात्मक पारदर्शिता को लेकर भी यह चिंता व्यक्त की है कि पर्याप्त परामर्श का पालन नहीं किया गया।
  • ऐतिहासिक विकास: यह विवाद लगभग वर्ष 2016 के आसपास बढ़ा, जब ऊपरी जल क्षेत्र  में अवसंरचना विकास तीव्र हुआ।
    • इसके बाद ओडिशा ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, परिणामस्वरूप अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत न्यायाधिकरण का गठन किया गया।
    • कई दौर की वार्ताओं और समाधान के प्रयासों के बावजूद अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है।

न्यायाधिकरण के हालिया घटनाक्रम

  • समझौते का अंतिम अवसर: न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों को वर्ष 2026 में निर्धारित समय-सीमा के भीतर आपसी सहमति से जल-वितरण को निर्धारित करने का अंतिम अवसर दिया है। ऐसा न होने पर उसने स्पष्ट किया है कि वह उपलब्ध साक्ष्यों और विधिक सिद्धांतों के आधार पर विवाद का निर्णय करेगा।
  • न्यायिक असंतोष: न्यायाधिकरण ने बार-बार स्थगन और ठोस प्रगति के अभाव पर गंभीर असंतोष व्यक्त किया है। उसने कहा कि समझौते के प्रयासों के आश्वासन के बावजूद कोई ठोस प्रस्ताव या विवादित मुद्दों का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं किया गया है।
  • गतिरोध के कारण: इस निरंतर गतिरोध का मुख्य कारण विश्वसनीय और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य जल-विज्ञान संबंधी आँकड़ों का अभाव तथा दोनों राज्यों के बीच विश्वास की कमी है, जिससे सार्थक वार्ता और सहमति बनने में बाधा आई है।
    • तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: कावेरी और कृष्णा नदी विवादों की तरह, महानदी विवाद भी आँकड़ों में पारदर्शिता का अभाव, निर्णय में देरी, और ऊपरी नदी क्षेत्र के उपयोग तथा निचले क्षेत्रों के अधिकारों के संतुलन जैसी निरंतर उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को उजागर करता है।

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महानदी नदी के बारे में

  • उद्गम और प्रवाह: महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ राज्य में है और यह ओडिशा से प्रवाहित होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 851 किलोमीटर है।
  • जलग्रहण क्षेत्र का वितरण: नदी का जल-संग्रहण क्षेत्र लगभग 1.41 लाख वर्ग किलोमीटर में है, जिसमें से लगभग 53.9 प्रतिशत छत्तीसगढ़ और 45.7 प्रतिशत ओडिशा में है, जिससे ऊपरी और निचले राज्यों के बीच असमान नियंत्रण की स्थिति बनती है।
  • सहायक नदियाँ: नदी को कई सहायक नदियों से जल प्राप्त होता है, जिनमें बाएँ तट पर शिवनाथ, हसदेव, मांड और इब, तथा दाएँ तट पर जोंक, ओंग और तेल नदियाँ शामिल हैं, जो मिलकर इसके प्रवाह और जलागम तंत्र को प्रभावित करते हैं।
  • आर्थिक महत्त्व: यह जलग्रहण क्षेत्र व्यापक कृषि गतिविधियों में सहायक है, पेयजल और औद्योगिक जल आपूर्ति प्रदान करता है तथा इसमें पर्याप्त जलविद्युत क्षमता है, जिससे यह क्षेत्रीय विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण संसाधन बनता है।
  • प्रमुख अवसंरचना: इस नदी पर हीराकुंड बाँध जैसी प्रमुख परियोजनाएँ स्थित हैं, जो बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और विद्युत उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और यह विश्व के सबसे लंबे मिट्टी के बाँधों में से एक है।

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भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद

  • संवैधानिक और विधिक ढाँचा: संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदियों से संबंधित विवादों के निपटारे का अधिकार प्रदान करता है तथा ऐसे मामलों में न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को सीमित करने की शक्ति भी प्रदान करता है।
    • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 ऐसे विवादों के समाधान के लिए न्यायाधिकरणों के गठन का विधिक आधार प्रदान करता है।
    • प्रविष्टि 17 (राज्य सूची): यह राज्यों को जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरों, जल निकासी और तटबंधों पर अधिकार प्रदान करती है।
    • प्रविष्टि 56 (संघ सूची): यह संघ को जनहित में अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन और विकास का अधिकार देती है।
  • संस्थागत तंत्र: अंतर-राज्यीय नदी विवादों का निपटारा संघ सरकार द्वारा गठित अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, जिनके निर्णय संबंधित राज्यों पर बाध्यकारी होते हैं, हालांँकि उनके क्रियान्वयन में प्रायः  चुनौतियाँ बनी रहती हैं।
  • मुख्य चुनौतियाँ: भारत में अंतर-राज्यीय नदी विवाद प्रायः विश्वसनीय और साझा जल-विज्ञान संबंधी आँकड़ों की कमी, राजनीतिक और संघीय तनाव, निर्णय और क्रियान्वयन में देरी तथा ऊपरी नदी जल क्षेत्र के उपयोग और निचले क्षेत्रों के अधिकारों के बीच प्रतिस्पर्धी दावों जैसी समस्याओं को चिह्नित करते हैं।

आगे की राह

  • आँकड़ों की पारदर्शिता और साझाकरण: बेसिन राज्यों के बीच रियल टाइम आधारित पारदर्शी जल-विज्ञान संबंधी आँकड़ों के साझा तंत्र की स्थापना की जाए, ताकि आँकड़ों की असमानता से उत्पन्न विवादों को कम किया जा सकें।
  • संस्थागत नदी घाटी शासन: विरोधात्मक प्रदर्शन से आगे बढ़ते हुए समेकित और सहकारी जल प्रबंधन के लिए नदी घाटी संगठनों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना: केंद्र की मध्यस्थता में संवाद और अंतर-राज्यीय परिषद जैसे तंत्रों को मजबूत कर संरचित वार्ता और सहमति निर्माण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • न्यायाधिकरण सुधार और क्रियान्वयन: समयबद्ध निर्णय और न्यायाधिकरण के आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जाए, जिसमें अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) अधिनियम, 2019 के सुधारों पर आधारित प्रयास शामिल हों।
  • मार्गदर्शक जल-वितरण सिद्धांतों को अपनाना: क्षति न पहुँचाने के सिद्धांत के माध्यम से निचले नदी जल क्षेत्रों को संरक्षित करते हुए न्यायसंगत और उचित उपयोग के सिद्धांतों को क्रियान्वित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

महानदी विवाद जल-विज्ञान, संघीय राजनीति और विधिक शासन के परस्पर संबंध को उजागर करता है तथा एक स्थायी समाधान के लिए आँकड़ा-आधारित और सहकारी जल-वितरण तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

महानदी जल विवाद

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