कर्नाटक मंत्रिमंडल द्वारा अनुसूचित जाति उप-वर्गीकरण को स्वीकृति

25 Apr 2026

संदर्भ

हाल ही में कर्नाटक सरकार ने अनुसूचित जाति के 15 प्रतिशत आरक्षण के अंतर्गत एक नई उप-वर्गीकरण रूपरेखा को स्वीकृति दी है, जिसका उद्देश्य नौकरियों में दीर्घकालिक भर्ती गतिरोध को समाप्त करना तथा आंतरिक दलित असमानताओं को संबोधित करना है।

नीतिगत प्रमुख बिंदु

  • भर्ती का पुनः प्रारंभ: कर्नाटक सरकार द्वारा 56,432 रिक्त पदों को तत्काल भरने की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी। पूर्व में पुराने 6:6:5 अनुपात (17 प्रतिशत योजना के अंतर्गत) पर आधारित अधिसूचनाओं को वापस लेकर इस नई व्यवस्था से प्रतिस्थापित किया जाएगा।
  • घुमंतू समुदायों के लिए सुरक्षा प्रावधान: श्रेणी 3 के अंतर्गत प्रत्येक पाँच पदों में से एक पद विशेष रूप से 59 घुमंतू (अलेमारी) समुदायों के लिए आरक्षित होगा। यदि इन समूहों से कोई उपयुक्त अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं होता है, तो वह पद उसी श्रेणी के अन्य उप-समूहों के अंतर्गत ही रखा जाएगा।

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  • 50 प्रतिशत सीमा का समाधान: यद्यपि राज्य विधानमंडल ने पूर्व में 17 प्रतिशत अनुसूचित जाति आरक्षण हेतु विधेयक पारित किया था, वर्तमान में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा से संबंधित विधिक चुनौतियों से बचने हेतु 15 प्रतिशत सीमा को ही बनाए रखा है।
  • बैकलॉग’ प्रावधान: मुख्यमंत्री के अनुसार, 6 प्रतिशत पदों (2 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 4 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति) को बैकलॉग’ के रूप में माना जाएगा, जो राज्य द्वारा कुल आरक्षण को 56 प्रतिशत तक बढ़ाने के निर्णय पर उच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक लंबित रहेंगे।

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उप-वर्गीकरण के बारे में

  • उप-वर्गीकरण’ का अर्थ है किसी व्यापक आरक्षित श्रेणी, जैसे अनुसूचित जाति, को उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के विभिन्न स्तरों के आधार पर छोटे-छोटे समूहों में विभाजित करना, ताकि लाभों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित किया जा सके।
  • उप-वर्गीकरण की आवश्यकता: उप-वर्गीकरण आवश्यक है क्योंकि आरक्षण के लाभ प्रायः अपेक्षाकृत सक्षम उप-जातियों तक अधिक पहुँच जाते हैं, जिससे सबसे अधिक वंचित समूह अब भी लाभ से वंचित रह जाते हैं।
    • उदाहरण के लिए, अन्य पिछड़ा वर्ग में एक निश्चित आय सीमा से अधिक आय अर्जित करने वाले व्यक्तियों को क्रीमी लेयर’ कहा जाता है और उन्हें आरक्षण से बाहर रखा जाता है, जिससे लाभ वास्तविक रूप से वंचित नॉन-क्रीमी लेयर’ तक पहुँच सके।

अनुसूचित जातियों के बारे में

  • परिभाषा: अनुसूचित जातियाँ वे समुदाय हैं जो ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं और जिन्हें अस्पृश्यता तथा सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है।
  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 341(1) के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के लिए उन जातियों को निर्दिष्ट करते हैं जिन्हें अनुसूचित जाति माना जाएगा।
  • संसदीय शक्ति: अनुच्छेद 341(2) के अंतर्गत संसद को विधि के माध्यम से अनुसूचित जातियों की सूची में जातियों को शामिल करने या बाहर करने की शक्ति प्राप्त है।

अनुसूचित जातियों और आरक्षण से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता की गारंटी देता है।
  • अनुच्छेद 15(4): सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, जिसमें अनुसूचित जातियाँ शामिल हैं, के उन्नयन हेतु विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है।
  • अनुच्छेद 16(1): सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 16(4): पिछड़े वर्गों के लिए सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की अनुमति देता है।
  • अनुच्छेद 341(1): राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियों को अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 341(2): संसद को अनुसूचित जाति सूची में संशोधन करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 246: संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों के विषय-वस्तु से संबंधित है, जो अनुसूचित जातियों की पहचान के पश्चात प्रासंगिक होता है।

उप-वर्गीकरण के पक्ष में तर्क उप-वर्गीकरण के विरोध में तर्क
समान वितरण: यह सुनिश्चित करता है कि अनुसूचित जातियों के भीतर सर्वाधिक वंचित समूहों को आरक्षण का लाभ मिले, न कि केवल अपेक्षाकृत उन्नत समूहों को। खंडीकरण का जोखिम: यह अनुसूचित जातियों को विभाजित कर सकता है, जिससे उनकी सामूहिक राजनीतिक और सामाजिक शक्ति कमजोर हो सकती है।
सार्थक समानता को बढ़ावा: यह औपचारिक समानता से आगे बढ़कर वास्तविक आवश्यकताओं के आधार पर सामाजिक न्याय प्राप्त करने का प्रयास करता है। समानरूपता सिद्धांत से विचलन: अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों को एक समरूप समूह के रूप में मान्यता दी गई थी; उप-वर्गीकरण इस आधार को कमजोर कर सकता है।
ऐतिहासिक अन्याय का समाधान: यह बहु-स्तरीय भेदभाव को पहचानता है और सबसे वंचित वर्गों के लिए लक्षित सकारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करता है। प्रशासनिक जटिलता: उप-समूहों की पहचान, विश्वसनीय डेटा संग्रह और कार्यान्वयन की निगरानी में जटिलता बढ़ जाती है।
न्यायिक समर्थन: सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णय (2024-25) डेटा-आधारित और उचित होने पर उप-वर्गीकरण की अनुमति देते हैं। राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना: उप-वर्गीकरण वास्तविक सामाजिक पिछड़ेपन के बजाय राजनीतिक दबावों से प्रभावित हो सकता है।
OBC मॉडल से सीख: OBC में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा ने आरक्षण को वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुँचाने में मदद की है। कानूनी अनिश्चितता: निरंतर मुकदमेबाजी और स्पष्ट मानदंडों की कमी प्रक्रिया को विलंबित या बाधित कर सकती है।
परिवर्तन के प्रति गतिशील प्रतिक्रिया: यह अनुसूचित जातियों के भीतर बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर आरक्षण नीति को अद्यतन करने की अनुमति देता है। लाभ में कमी संबंधी भय: कुछ उप-जातियों को वर्तमान में प्राप्त लाभों के कम होने का डर हो सकता है।

अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • ई.वी. चिन्नैया मामला (2005): यह माना गया कि अनुच्छेद 341 के अंतर्गत अनुसूचित जातियाँ एक समानरूप समूह हैं और उनका उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता है।
  • दविंदर सिंह प्रकरण (2014): इस मुद्दे को पुनर्विचार हेतु पाँच-न्यायाधीश वाली संविधान पीठ को संदर्भित किया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का 2020 निर्णय: पाँच-न्यायाधीश वाली पीठ ने यह पाया कि ई.वी. चिन्नैया निर्णय के पुनर्विचार की आवश्यकता है।
  • वर्ष 2024 में संविधान पीठ (सात-न्यायाधीश)–पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह: अनुच्छेद 341 की व्याख्या का पुनर्मूल्यांकन करते हुए यह निर्णय दिया गया कि अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण संवैधानिक रूप से वैध है, बशर्ते इसके लिए प्रायोगिक आधार हो तथा यह न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन हो।

आगे की राह

  • आयोग की स्थापना: अन्य पिछड़ा वर्ग उप-वर्गीकरण हेतु गठित जी. रोहिणी आयोग के समान एक आयोग की स्थापना की जा सकती है।
  • आंतरिक असमानताओं का समाधान: उद्देश्य यह होना चाहिए कि अनुसूचित जातियों के अंतर्गत आंतरिक असमानताओं को दूर किया जाए, साथ ही समुदाय की एकता और सामूहिक शक्ति को बनाए रखा जाए।
  • बहु-हितधारक परामर्श: नीति-निर्माताओं को बेहतर समझ के लिए अनुसूचित जाति समुदाय के प्रतिनिधियों, कानूनी विशेषज्ञों तथा सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए।

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