संक्षेप में समाचार

15 May 2026

भारत का पहला मेगा ग्रीनफील्ड शिपयार्ड 

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तमिलनाडु के थूथुकुडी में भारत के पहले मेगा ग्रीनफील्ड शिपयार्ड के विकास हेतु त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया है।

समझौता ज्ञापन के प्रमुख पक्ष

  • एचडी कोरिया जहाज निर्माण एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग: यह विश्व की अग्रणी जहाज निर्माता कंपनियों में से एक है, जो इस विशाल जहाज निर्माण केंद्र के विकास में भागीदार बनी है।
  • राष्ट्रीय जहाज निर्माण एवं भारी उद्योग पार्क, तमिलनाडु: यह एक विशेष प्रयोजन इकाई है, जिसे वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह प्राधिकरण और तमिलनाडु औद्योगिक प्रोत्साहन निगम द्वारा संयुक्त रूप से स्थापित किया गया है।
    • विशेष प्रयोजन इकाई: किसी विशेष परियोजना के क्रियान्वयन हेतु बनाई गई पृथक संस्था।
  • सागरमाला वित्त निगम लिमिटेड: पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत वित्तीय सहयोगी संस्था।

भारत–कोरिया गणराज्य समुद्री सहयोग ढाँचा

  • VOYAGES पहल: यह समझौता भारत–कोरिया गणराज्य के “VOYAGES” ढाँचे के अंतर्गत किया गया है, जिसका आशय है — दक्षता और व्यापकता के साथ जहाज निर्माण केंद्र आधारित विकास के संचालन हेतु साझा दृष्टि।
  • रणनीतिक समुद्री साझेदारी: यह परियोजना जहाज निर्माण, समुद्री परिवहन और समुद्री आपूर्ति तंत्र के क्षेत्रों में भारत तथा कोरिया गणराज्य के बढ़ते सहयोग को दर्शाती है।

थूथुकुडी शिपयार्ड प्रोजेक्ट के बारे में

  • वार्षिक जहाज निर्माण क्षमता: प्रस्तावित केंद्र की अनुमानित वार्षिक क्षमता 25 लाख सकल टन भार होगी।
  • रोजगार सृजन: इस परियोजना से लगभग 15,000 प्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होने के साथ-साथ बड़े स्तर पर अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
  • जहाज निर्माण समूह की प्रमुख सुविधा: यह केंद्र तमिलनाडु में विकसित किए जा रहे थूथुकुडी जहाज निर्माण समूह की मुख्य आधारभूत सुविधा के रूप में कार्य करेगा।
  • परियोजना तैयारी की स्थिति: तकनीकी एवं आर्थिक व्यवहार्यता प्रतिवेदन पूरा हो चुका है तथा विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार किया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय जहाज निर्माण मिशन की स्वीकृति: प्रस्तावित हरित-क्षेत्र जहाज निर्माण समूह को राष्ट्रीय जहाज निर्माण मिशन से सैद्धांतिक स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।
    • ग्रीनफील्ड (हरित-क्षेत्र) परियोजना: यह एक ऐसी परियोजना है, जिसे किसी पूर्व-अविकसित या खाली भूमि पर बिल्कुल प्रारंभ से विकसित किया जाता है, जहाँ पहले से कोई ढाँचागत निर्माण मौजूद नहीं होता है।

परियोजना का महत्त्व

  • सहायक उद्योगों का विकास: इस परियोजना से सहायक एवं पुर्जा निर्माण उद्योग समूहों को बढ़ावा मिलने की अपेक्षा है।
    • सहायक उद्योग: वे उद्योग जो मुख्य उद्योगों को पुर्जे, सेवाएँ और आवश्यक घटक उपलब्ध कराते हैं।
  • समुद्री उपकरणों का स्वदेशीकरण: इस परियोजना का उद्देश्य घरेलू समुद्री उपकरण तथा अभियांत्रिकी आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करना है।
  • कार्यबल कौशल विकास: इस सहयोग के माध्यम से भारतीय पेशेवरों और श्रमिकों को कोरिया गणराज्य स्थित एचडी KSOI की इकाइयों में प्रशिक्षण मिलने की संभावना है।
  • हरित एवं डिजिटल जहाज निर्माण: यह परियोजना उन्नत विनिर्माण, डिजिटल जहाज निर्माण तथा हरित समुद्री परिवहन प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित है।
  • समुद्री केंद्र के रूप में थूथुकुडी: समुद्री अमृत काल दृष्टि 2047 के अंतर्गत तूतीकोरिन के एक रणनीतिक समुद्री एवं औद्योगिक केंद्र के रूप में उभरने की संभावना है।

समुद्री अमृत काल विजन 2047 (MAKV 2047)

  • वैश्विक जहाज निर्माण महत्त्वाकांक्षा: MAKV 2047 का उद्देश्य भारत को विश्व के शीर्ष पाँच जहाज निर्माण देशों में स्थान दिलाना है।
  • लक्षित जहाज निर्माण उत्पादन: भारत ने वर्ष 2047 तक प्रतिवर्ष 45 लाख सकल टन भार जहाज निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है।

भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र की स्थिति

  • समुद्री आधार: भारत के पास 11,098 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा है, जिसमें 12 प्रमुख परिचालित बंदरगाह तथा 217 गौण बंदरगाह शामिल हैं।
  • बढ़ती समुद्री परिवहन क्षमता: मार्च 2025 तक भारत के पास कुल 13.5 मिलियन सकल टन भार क्षमता वाले 1,544 जहाज थे।
    • इसके बावजूद भारतीय स्वामित्व वाले जहाज भारत के विदेशी व्यापार का केवल 6.09% ही वहन कर पाए, जो घरेलू समुद्री परिवहन क्षमता की सीमित स्थिति को दर्शाता है।
  • विस्तारित जहाज निर्माण तंत्र: वर्तमान में, भारत के सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के अंतर्गत लगभग 45 शिपयार्ड (जहाज निर्माण केंद्र) अवस्थित हैं, जो पोत निर्माण तथा पोत मरम्मत गतिविधियों में संलग्न हैं।
  • जहाज मरम्मत अवसंरचना: भारत के पास जहाज मरम्मत हेतु 44 ड्राई डॉक उपलब्ध हैं।
    • ड्राई डॉक: विशेष प्रकार की बंद संरचनाएँ या जलाशय, जहाँ जहाजों को निर्माण, रखरखाव, मरम्मत, सफाई या निरीक्षण के लिए लाया जाता है तथा इसमें जहाज के प्रवेश करने के बाद सारा पानी बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे जहाज के निचले हिस्से पर सूखी सतह में कार्य किया जा सके।
  • जहाज आपूर्ति में वृद्धि: भारतीय जहाज निर्माण केंद्रों ने वर्ष 2024–25 के दौरान 259 जहाजों की आपूर्ति की, जिसमें निजी क्षेत्र की कंपनियों का योगदान सर्वाधिक रहा।
  • रोजगार सृजन: वर्ष 2024–25 में जहाज निर्माण एवं जहाज मरम्मत उद्योग में लगभग 24,875 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ।
  • जहाज निर्माण नीति पैकेज: भारत सरकार ने सितंबर 2025 में देश को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी जहाज निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से, एक चार-स्तरीय दृष्टिकोण के तहत ₹69,725 करोड़ का व्यापक ‘जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र पुनरुद्धार पैकेज’ प्रारंभ किया।

भारत की पहली अल्जाइमर रोग-परिवर्तनकारी चिकित्सा 

भारत ने “लोरमल्जी” नामक ब्रांड के अंतर्गत डोनानेमैब औषधि को प्रस्तुत करते हुए अल्जाइमर रोग के लिए अपनी पहली रोग-परिवर्तनकारी चिकित्सा शुरू की है। 

भारत की पहली अल्जाइमर रोग-परिवर्तनकारी चिकित्सा के बारे में

  • डोनानेमैब आधारित चिकित्सा: यह उपचार डोनानेमैब पर आधारित है, जो एक एकल-प्रतिरक्षी (मोनोक्लोनल एंटीबॉडी) औषधि है और प्रारंभिक अवस्था के अल्जाइमर रोग के उपचार में प्रयुक्त होती है।
  • कार्यप्रणाली: यह मस्तिष्क में मौजूद एमिलॉयड-बीटा प्लाक (Amyloid-beta plaques) को लक्षित करके हटाता है, जिससे संज्ञानात्मक गिरावट की गति धीमी हो जाती है।
    • एमिलॉयड-बीटा प्लाक (Amyloid-beta plaques) असामान्य, गोंद जैसे प्रोटीन के जमाव होते हैं जो मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच जमा हो जाते हैं, जिससे तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुँचता है और संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट आती है।
  • उपयुक्त रोगी: यह उपचार हल्की संज्ञानात्मक अक्षमता अथवा प्रारंभिक अवस्था के अल्जाइमर रोग से ग्रस्त रोगियों के लिए निर्धारित है।
  • प्रशासन: यह औषधि प्रत्येक चार सप्ताह में एक बार शिरा के माध्यम से दी जाती है तथा उपचार अवधि लगभग 18 महीने तक चलती है।
  • नैदानिक लाभ: परीक्षणों में पाया गया कि इस चिकित्सा ने प्रारंभिक अवस्था के रोगियों में संज्ञानात्मक गिरावट को लगभग 35% तक धीमा किया।
  • संभावित जोखिम: इस उपचार से एमिलॉयड-संबंधित प्रतिचित्रण असामान्यताएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिनमें मस्तिष्क में सूजन और रक्तस्राव शामिल हैं।
  • महत्त्व: यह शुरुआत भारत में तंत्रिका-विज्ञान तथा मनोभ्रंश देखभाल व्यवस्था के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती है।
    • भारत में अल्जाइमर रोग और मनोभ्रंश का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में लगभग 88 लाख लोग इससे प्रभावित हैं और वर्ष 2036 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 1.69 करोड़ होने का अनुमान है।
  • चुनौतियाँ
    • स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ: इस चिकित्सा के प्रभावी उपयोग के लिए प्रारंभिक पहचान, MRI निगरानी, आनुवंशिक परीक्षण तथा विशेषीकृत तंत्रिका-विज्ञान देखभाल अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
    • सुलभता संबंधी चुनौती: लगभग 91,688 रुपये प्रति शीशी की अत्यधिक लागत तथा 18 महीने तक चलने वाली उपचार अवधि के कारण यह चिकित्सा अधिकांश लोगों की पहुँच से बाहर बनी हुई है।

अल्जाइमर रोग के बारे में

  • अल्जाइमर रोग: यह एक प्रगतिशील तंत्रिका-अपक्षयी विकार है, जो धीरे-धीरे स्मृति, सोचने की क्षमता और संज्ञानात्मक कार्यों को क्षति पहुँचाता है।
  • मनोभ्रंश: यह विश्वभर में मनोभ्रंश (Dementia) का प्रमुख कारण है, विशेषकर वृद्ध जनसंख्या में।
  • मस्तिष्कीय परिवर्तन: यह रोग मस्तिष्क में एमिलॉयड-बीटा पट्टिकाओं और टाउ प्रोटीन गाँठों के असामान्य संचय से जुड़ा होता है।
  • लक्षण: स्मृति ह्रास, भ्रम, भाषा संबंधी कठिनाइयाँ, व्यवहार में परिवर्तन तथा निर्णय लेने की क्षमता में कमी इसके सामान्य लक्षण हैं।
  • अवस्थाएँ: यह रोग हल्की संज्ञानात्मक अक्षमता से बढ़ते हुए गंभीर मनोभ्रंश और आत्मनिर्भरता की हानि तक पहुँच जाता है।
  • उपचार: वर्तमान में इसका पूर्ण उपचार उपलब्ध नहीं है, किंतु कुछ चिकित्साएँ प्रारंभिक अवस्थाओं में रोग की प्रगति को धीमा कर सकती हैं।

मिजोरम अदरक मिशन

पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (भारत सरकार) ने मिजोरम अदरक मिशन (Mizoram Ginger Mission) का शुभारंभ किया है।

मिजोरम अदरक मिशन के बारे में

मिजोरम अदरक मिशन पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय की एक अभिसरण-आधारित पहल है, जिसका उद्देश्य मिजोरम में संपूर्ण अदरक मूल्य शृंखला को विकसित करना है।

  • उद्देश्य: इसका लक्ष्य GI-प्रमाणित मिजो अदरक की टिकाऊ खेती, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, मूल्यवर्द्धन और निर्यात संवर्द्धन में सुधार करना है।
  • रणनीतिक फोकस: यह मिशन चार स्तंभों [अभिसरण, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग और बाजार एकीकरण] पर आधारित है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • किसानों का एकीकरण: लगभग 20,000 किसान परिवारों को एक एकीकृत अदरक मूल्य-शृंखला पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ा जाएगा।
    • बुनियादी ढाँचा विकास: इस परियोजना के तहत फसल कटाई के बाद के प्रबंधन और प्रसंस्करण के लिए एक एकीकृत प्रसंस्करण हब और तीन स्पोक सेंटर स्थापित किए जाएँगे।
    • संस्थागत सहायता: इस मिशन में नाबार्ड (NABARD), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के साथ सहयोग शामिल है।
  • अपेक्षित प्रभाव: इस मिशन का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना, फसल कटाई के बाद के नुकसान को कम करना और उत्तर-पूर्व भारत में कृषि-प्रसंस्करण को मजबूत करना है।
  • ब्रांड नॉर्थ ईस्ट’ पहल: यह मिशन व्यापक ब्रांड नॉर्थ ईस्ट” विजन का हिस्सा है, जो क्षेत्रीय विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देता है जैसे:-
    • मेघालय की लाकाडोंग हल्दी (Lakadong Turmeric)
    • अरुणाचल प्रदेश का कीवी (Kiwi)
    • त्रिपुरा का क्वीन पाइनएप्पल (Queen Pineapple)
    • नागालैंड की कॉफी
    • सिक्किम के जैविक उत्पाद।

मिजो अदरक के बारे में

  • GI-प्रमाणित किस्म: मिजो अदरक मिजोरम में उगाई जाने वाली एक भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त अदरक की किस्म है।
  • फार्मा-ग्रेड: यह अपने बेहतर औषधीय और फार्मास्युटिकल-ग्रेड गुणों के लिए विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है।
  • ओलियोरेसिन की उच्च मात्रा: मिजो अदरक में 6-8% ओलियोरेसिन होता है, जो लगभग 3% के वैश्विक औसत से काफी अधिक है।
    • ओलियोरेसिन (Oleoresin): ओलियोरेसिन मसालों और पौधों से प्राप्त एक सांद्रित प्राकृतिक अर्क है, जिसमें आवश्यक तेल, स्वाद, सुगंध और सक्रिय औषधीय यौगिक होते हैं।
  • निर्यात क्षमता: अपनी गुणवत्ता और सुगंध के कारण, इसकी दक्षिण-पूर्व एशियाई, मध्य पूर्वी और यूरोपीय बाजारों में मजबूत निर्यात क्षमता है।
  • अदरक की राजधानी: नीति आयोग द्वारा मिजोरम को भारत की अदरक राजधानी’ (Ginger Capital of India) घोषित किया गया है।

वन्यजीव अभयारण्यों के प्रस्ताव का विरोध 

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निकोबारी जनजातीय परिषद (Nicobarese Tribal Council) ने ₹92,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना’ से जुड़े लिटिल निकोबार द्वीप, मेंचल द्वीप और मेरो द्वीप में वन्यजीव अभयारण्यों की अधिसूचना का विरोध किया है।

  • निकोबारी जनजातीय परिषद निकोबार द्वीपसमूह के विभिन्न गाँवों के निर्वाचित प्रतिनिधियों से बनी है।

ग्रेट निकोबार परियोजना के बारे में

यह एक बड़े पैमाने की बुनियादी ढाँचा पहल है, जिसका उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप को रसद, व्यापार और रक्षा के लिए एक रणनीतिक केंद्र के रूप में परिवर्तित करना है। इसके महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय और सामाजिक निहितार्थ हैं।

ग्रेट निकोबार बुनियादी ढाँचा परियोजना के प्रमुख घटक

  • इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांस-शिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलाथिया खाड़ी में लगभग 16 मिलियन TEU की हैंडलिंग क्षमता वाला एक बंदरगाह है।
  • ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: नागरिक और रक्षा उद्देश्यों के लिए एक दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा, जिसमें वर्ष 2050 तक प्रति घंटे लगभग 4,000 यात्रियों को प्रबंधित करने की क्षमता है।
  • एकीकृत टाउनशिप विकास: आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत बुनियादी ढाँचे के साथ लगभग 3-4 लाख लोगों की आबादी के लिए एक आधुनिक टाउनशिप का विकास।
  • विद्युत बुनियादी ढाँचा: 450 MVA गैस और सौर-आधारित पॉवर प्लांट की स्थापना।

सरकार द्वारा अधिसूचित अभयारण्य

  1. लिटिल निकोबार द्वीप के कुछ हिस्सों में ‘लेदरबैक टर्टल’ अभयारण्य
    • लेदरबैक टर्टल: यह दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है, जो अन्य कछुओं की तरह कठोर कवच (Carapace) के बजाय अपनी मोटी और लचीले कवच के लिए जाना जाता है।
    • यह IUCN द्वारा सुभेद्य’ (Vulnerable) के रूप में सूचीबद्ध है और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के समुद्र तटों पर घोंसला बनाता है।
    • लिटिल निकोबार द्वीप: यह निकोबार द्वीपसमूह का एक सुदूर, पहाड़ी और वनाच्छादित द्वीप है, जो दक्षिण-पूर्वी बंगाल की खाड़ी में कत्चल द्वीप और ग्रेट निकोबार द्वीप के मध्य स्थित है।
  2. मेंचल द्वीप पर ‘मेगापोड अभयारण्य’
    • निकोबार मेगापोड: यह निकोबार द्वीपसमूह का एक स्थानिक पक्षी है, जो अपने अंडों की सुरक्षा के लिए रेत, मिट्टी और अपशिष्ट वनस्पतियों को मिलाकर एक विशाल टीलेनुमा घोंसला बनाता है।
    • मेंचल द्वीप: यह निकोबार समूह का एक उष्णकटिबंधीय द्वीप है, जो पूर्वी हिंद महासागर में लिटिल निकोबार द्वीप के उत्तर-पूर्व में स्थित है।
  3. मेरो द्वीप पर ‘प्रवाल (कोरल) अभयारण्य’
    • प्रवाल भित्ति (Coral Reef): ये प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) कोरल पॉलिप्स के समूहों द्वारा निर्मित विविध अंतर्जलीय पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो अत्यंत समृद्ध समुद्री जैव विविधता को आश्रय प्रदान करते हैं और तटीय क्षेत्रों को अपरदन से सुरक्षा देते हैं।
    • मेरो द्वीप: यह निकोबार समूह का एक निचला उष्णकटिबंधीय द्वीप है, जो अपने सदाबहार वर्षावन और विशिष्ट समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जाना जाता है।

वन्यजीव अभयारण्यों के विरुद्ध निकोबारी जनजातीय परिषद द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे

  • परामर्श का अभाव: निवासियों और प्रभावित गाँवों से परामर्श किए बिना अभयारण्यों को अधिसूचित किया गया था।
  • वन अधिकार प्रक्रियाओं का उल्लंघन: आरोप है कि परियोजना के लिए सहमति जनजातीय परिषद के बजाय बसने वाले परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाली ग्राम सभाओं के माध्यम से ली गई थी।
  • सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चिंताएँ: मेंचल और मेरो द्वीपों को पवित्र माना जाता है क्योंकि स्थानीय निकोबारी समुदाय इन्हें अपने पूर्वजों की आत्माओं का घर मानते हैं। पारंपरिक प्रथाओं के तहत, ये समुदाय इन द्वीपों के पेड़ों, चट्टानों और प्राकृतिक स्थलों की पूजा करते हैं।
  • आजीविका संबंधी चिंताएँ: स्थानीय जनजातीय समुदाय लघु वनोपज (NTFP), औषधीय पौधों, झोपड़ियों के निर्माण और डोंगी (Canoes) के लिए लकड़ी हेतु वनों तथा तटीय क्षेत्रों पर पूरी तरह निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त, मेंचल और मेरो द्वीप दक्षिण निकोबारी समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण नारियल संसाधन क्षेत्र हैं।
  • पारंपरिक अधिकारों पर चिंता: समुदायों को डर है कि अभयारण्य उनके आनुष्ठानिक प्रथाओं, वृक्षारोपण गतिविधियों और संसाधनों के पारंपरिक उपयोग को प्रभावित करेंगे। जनजातीय परिषद ने तर्क दिया कि अभयारण्य पहले से मौजूद सामुदायिक अधिकारों का अतिक्रमण करेंगे।
  • पारिस्थितिकी-पर्यटन का विरोध: जनजातीय परिषद ने अभयारण्य क्षेत्रों में प्रस्तावित इको-टूरिज्म गतिविधियों का विरोध किया।

उन्होंने इसके बजाय शौचालय, जेटी, फुटपाथ, जल सुविधाएँ और सेलुलर टॉवर जैसे बुनियादी ढाँचे की माँग की।

बिरसा 101 (BIRSA 101) 

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जनजातीय कार्य मंत्रालय (भारत सरकार) ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) तथा CSIR-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी  (IGIB) के साथ मिलकर जनजातीय गौरव उत्सव 2026′ समारोह के तहत नई दिल्ली में “BIRSA 101” पर एक कार्यशाला का आयोजन किया है।

BIRSA 101 के बारे में

  • पहली स्वदेशी जीन थेरेपी: “BIRSA 101” सिकल सेल रोग (Sickle Cell Disease) के लिए भारत की पहली स्वदेशी CRISPR-आधारित जीन थेरेपी है।
  • जनजातीय नायक के नाम पर: इस पहल का नाम बिरसा मुंडा के नाम पर रखा गया है।
  • जनजातीय स्वास्थ्य पर ध्यान: इसे सिकल सेल रोग के लिए एक किफायती उपचार मार्ग प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है, जो जनजातीय आबादी को अत्यधिक प्रभावित करता है।
  • सरकारी सहायता: इस पहल को जनजातीय कार्य मंत्रालय से लगभग ₹3.75 करोड़ की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है।

जनजातीय गौरव उत्सव, 2026 के बारे में

  • जनजातीय गौरव उत्सव 2026 एक महीने तक चलने वाला उत्सव है, जो विकसित भारत की यात्रा’ को प्रदर्शित करता है।
  • जनजातीय कल्याण पर ध्यान: यह जनजातीय सशक्तीकरण, कल्याण और विकास से संबंधित पहलों पर प्रकाश डालता है।
  • प्रौद्योगिकी विषय (थीम): पहला सप्ताह विकास चालक के रूप में प्रौद्योगिकी” को समर्पित है, जो जनजातीय समुदायों के लिए नवाचार-नेतृत्व वाले परिवर्तन और तकनीकी उपलब्धियों पर केंद्रित है।

सिकल सेल रोग (Sickle Cell Disease) के बारे में

  • आनुवंशिक रक्त विकार: सिकल सेल रोग एक आनुवंशिक विकार है, जिसमें असामान्य हीमोग्लोबिन के कारण लाल रक्त कोशिकाएँ हँसिए के आकार की हो जाती हैं।
  • ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी: असामान्य आकार की कोशिकाएँ रक्त प्रवाह को बाधित करती हैं और शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर देती हैं।
  • प्रमुख स्वास्थ्य जटिलताएँ: यह गंभीर दर्द, एनीमिया (रक्तल्पता), अंगों की क्षति, संक्रमण और स्ट्रोक का कारण बन सकता है।
  • जनजातीय क्षेत्रों में उच्च प्रसार: यह बीमारी विशेष रूप से मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कुछ हिस्सों की जनजातीय आबादी में प्रचलित है।
  • सरकारी उन्मूलन मिशन: भारत ने वर्ष 2047 तक इस बीमारी को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने के लक्ष्य के साथ वर्ष 2023 में राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया था।

कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड’  (Common Criteria Development Board- CCDB)

भारत ने वर्ष 2026-2028 के लिए कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड (CCDB) की अध्यक्षता ग्रहण की है, जो वैश्विक साइबर सुरक्षा शासन में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।

कॉमन क्राइटेरिया डेवलपमेंट बोर्ड (CCDB) के बारे में

CCDB वह तकनीकी निकाय है, जो ‘कॉमन क्राइटेरिया फ्रेमवर्क’ के तहत वैश्विक आईटी सुरक्षा मूल्यांकन मानकों को विकसित करने और बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है।

  • मूल संगठन: CCDB ‘कॉमन क्राइटेरिया रिकग्निशन अरेंजमेंट’ (CCRA), 1998 के तहत कार्य करता है, जो आईटी सुरक्षा प्रमाण-पत्रों की पारस्परिक मान्यता के लिए एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था है।
  • भारत की भागीदारी: भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और STQC निदेशालय (आधिकारिक प्रमाणन प्राधिकरण) के माध्यम से इसमें भाग लेता है।
  • सदस्यता संरचना: सुरक्षित IT उत्पादों की वैश्विक मान्यता हेतु ‘कॉमन क्राइटेरिया रिकग्निशन अरेंजमेंट’ (CCRA) में वर्तमान में 20 प्रमाण-पत्र-जारीकर्ता राष्ट्र और 18 प्रमाण-पत्र-उपभोक्ता राष्ट्र शामिल हैं।

CCDB के मुख्य उद्देश्य

  • तकनीकी मानकीकरण: CCDB ‘कॉमन क्राइटेरिया’ (ISO/IEC 15408) और ‘आईटी सुरक्षा मूल्यांकन के लिए सामान्य पद्धति’ (CEM) मानकों के विकास का प्रबंधन करता है।
  • पारस्परिक मान्यता ढाँचा: यह सुनिश्चित करता है कि एक सदस्य राष्ट्र द्वारा जारी किए गए प्रमाण-पत्रों को बिना किसी पुन: प्रमाणन की आवश्यकता के सभी भागीदार देशों में मान्यता दी जाए।
  • सुरक्षित आईटी पारिस्थितिकी तंत्र: CCDB ऑपरेटिंग सिस्टम, फायरवॉल, स्मार्ट कार्ड और डिजिटल सुरक्षा प्रणालियों जैसे उत्पादों के लिए सुरक्षा मूल्यांकन मानदंड परिभाषित करता है।
  • उभरती प्रौद्योगिकी का मूल्यांकन: यह उभरती हुई डिजिटल और महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिए साइबर सुरक्षा मानकों को संबोधित करने हेतु तकनीकी कार्य समूहों का समन्वय करता है।

महत्त्व

भारत की अध्यक्षता इसके वैश्विक साइबर सुरक्षा नेतृत्व को मजबूत करती है और अंतरराष्ट्रीय आईटी सुरक्षा मानकों तथा डिजिटल ट्रस्ट ढाँचे पर अधिक प्रभाव डालने में सक्षम बनाती है।

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