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‘परिमॉर्टम स्पर्म’ निष्कर्षण

17 Apr 2026

संदर्भ

एक ऐतिहासिक निर्णय में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महिला को अपने पति, जो वर्तमान में ‘वेजिटेटिव’ अवस्था (Vegetative State) में हैं और एक भारतीय सैनिक हैं, के ‘शुक्राणु’ (स्पर्म) निष्कर्षण एवं संरक्षण की अनुमति प्रदान की है।

‘परिमॉर्टम स्पर्म’ निष्कर्षण (Perimortem Sperm Retrieval) के बारे में

  • यह एक चिकित्सीय प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी गंभीर रूप से बीमार, कोमा में या मृत पुरुष (मृत्यु के उपरांत शीघ्र) से शुक्राणु प्राप्त किए जाते हैं, ताकि उनका उपयोग सहायक प्रजनन तकनीकों में किया जा सके।
  • सहायक प्रजनन में उपयोग: प्राप्त किए गए शुक्राणुओं को क्रायोप्रिजर्वेशन (‘फ्रीज’ संरक्षण) के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है तथा बाद में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) या इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (ICSI) में उपयोग किया जाता है।
    • क्रायोप्रिजर्वेशन में शुक्राणुओं को अत्यंत निम्न तापमान पर, सामान्यतः द्रव नाइट्रोजन का उपयोग कर, जमाया जाता है।
    • जमे हुए शुक्राणु लगभग एक दशक तक जीवित (Viable) रह सकते हैं तथा बाद में IVF प्रक्रियाओं में उपयोग किए जा सकते हैं।

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शुक्राणु निष्कर्षण की विधियाँ 

  • पेनाइल वाइब्रेटरी स्टिमुलेशन (PVS): रीढ़ की स्पाइनल रिफ्लेक्सेस (Spinal reflexes) सुरक्षित होने पर स्खलन प्रेरित करने हेतु गैर-आक्रामक उत्तेजना तकनीक का उपयोग किया जाता है।
  • इलेक्ट्रो-इजैक्युलेशन (Electroejaculation): स्खलन को प्रेरित करने के लिए तंत्रिकाओं को विद्युत उत्तेजना दी जाती है।
  • टेस्टिकुलर स्पर्म एस्पिरेशन (TESA): जब स्खलन आधारित विधियाँ विफल हो जाएँ, तब अंडकोष (Testes) में सुई प्रविष्ट कर सीधे शुक्राणु निकाले जाते हैं
  • शुक्राणु प्राप्ति की प्रभावशीलता
    • शुक्राणु प्राप्ति की सफलता: अनेक मामलों में लगभग 100% तक सफलता प्राप्त होती है।
    • जीवित शुक्राणुओं की उपलब्धता: प्राप्त नमूनों में से लगभग 80–90% में निषेचन के योग्य जीवित शुक्राणु पाए जाते हैं।

पूर्व उदाहरण: यूनाइटेड किंगडम (UK) में वर्ष 2018 के एक उच्च न्यायालय के निर्णय में, जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर एक अचेत व्यक्ति से शुक्राणु प्राप्त करने की अनुमति दी गई, क्योंकि यह प्रमाणित हुआ कि दंपत्ति पूर्व में संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त कर चुके थे।

कोमा की स्थिति में शुक्राणु निष्कर्षण का जैविक आधार 

  • महत्त्वपूर्ण शारीरिक क्रियाओं की निरंतरता: कोमा या ‘वेजिटेटिव’ अवस्था में भी शरीर में हृदय गति, रक्त परिसंचरण एवं अंगों की क्रियाशीलता जैसी आवश्यक जैविक प्रक्रियाएँ जारी रह सकती हैं।
  • सक्रिय निष्कर्षण क्रिया (Active Testicular Function): वृषण जैविक रूप से सक्रिय बने रह सकते हैं, जिससे शुक्राणु उत्पादन जारी रहना संभव होता है और कुछ परिस्थितियों में शुक्राणु प्राप्ति चिकित्सकीय रूप से संभव हो जाती है।

सीमाएँ एवं चिकित्सीय चिंताएँ 

  • गंभीर बीमारी एवं औषधियों का प्रभाव: गंभीर रोग अवस्था और एंटीबायोटिक्स, सिडेटिव्स तथा लाइफ-सपोर्ट दवाओं के उपयोग से शुक्राणुओं की गुणवत्ता एवं मात्रा में कमी आ सकती है। प्राप्ति के बाद गुणवत्ता शीघ्र घट सकती है, अतः त्वरित निष्कर्षण एवं संरक्षण आवश्यक होता है।
  • आईवीएफ परिणामों में अनिश्चितता: निषेचन, भ्रूण विकास एवं प्रत्यारोपण की सफलता सुनिश्चित नहीं होती है।
  • संभावित आनुवंशिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: बच्चे के संदर्भ में आनुवंशिक अखंडता तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

कानूनी एवं नैतिक मुद्दे

  • व्यक्ति की सहमति: शुक्राणु निष्कर्षण से पूर्व यह निर्धारित करना कि क्या रोगी ने मरणोपरांत प्रजनन के लिए स्पष्ट या अनुमानित सहमति प्रदान की थी।
  • प्रजनन स्वायत्तता: जीवनसाथी के प्रजनन अधिकारों तथा अक्षम व्यक्ति की स्वायत्तता एवं संभावित इच्छाओं के बीच संतुलन स्थापित करना।
  • मातृत्व-पितृत्व एवं उत्तराधिकार: ऐसे बच्चों की वैधानिक स्थिति, अभिभावकत्व तथा उत्तराधिकार अधिकारों का निर्धारण, जिनका जन्म पिता की अक्षम अवस्था या मृत्यु के पश्चात् होता है।

निष्कर्ष

यद्यपि यह प्रक्रिया चिकित्सकीय रूप से संभव है, तथापि ‘पेरिमॉर्टम स्पर्म’ निष्कर्षण से संबंधित अनेक चिकित्सीय, नैतिक एवं विधिक अनिश्चितताएँ हैं, जिनका सावधानीपूर्वक परीक्षण एवं संतुलित समाधान आवश्यक है।

‘परिमॉर्टम स्पर्म’ निष्कर्षण

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