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वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र

17 Apr 2026

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने रचना गंगू बनाम भारत संघ (2026) में केंद्र सरकार को COVID-19 टीकाकरण के बाद उत्पन्न गंभीर प्रतिकूल घटनाओं के लिए ‘नो-फॉल्ट’ क्षतिपूर्ति नीति तैयार करने का निर्देश दिया है।

वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र के बारे में

  • परिभाषा: यह एक नीतिगत ढाँचा है, जो टीकाकरण के पश्चात् गंभीर प्रतिकूल प्रभावों से प्रभावित व्यक्तियों को वित्तीय क्षतिपूर्ति प्रदान करता है, सामान्यतः ‘नो-फॉल्ट’ प्रणाली के अंतर्गत, जिसमें राज्य या निर्माता की लापरवाही का प्रमाण आवश्यक नहीं होता है।
  • उद्देश्य: राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रमों में जन विश्वास बनाए रखते हुए, वैक्सीन क्षति केके मुआवजा के लिए समयबद्ध एवं न्यायसंगत प्रतितोष सुनिश्चित करना।

वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र की आवश्यकता के कारण 

  • दुर्लभ परंतु वास्तविक प्रतिकूल प्रभाव: यद्यपि टीके अत्यंत सुरक्षित होते हैं, फिर भी एनाफिलैक्सिस, थ्रोंबोसिस विद थ्रोंबोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (TTS), वैक्सीन-संबद्ध पक्षाघातजन्य पोलियो तथा एन्सेफैलोपैथी जैसी गंभीर प्रतिकूल घटनाएँ दर्ज की गई हैं।
  • टीकाकरण का व्यापक पैमाना: भारत ने COVID-19 टीकों की 219 करोड़ से अधिक खुराकें प्रदान कीं, जिससे दुर्लभ प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ भी परिमाणात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।
  • टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं (AEFI) के दर्ज मामले: सरकार द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत हालिया शपथ-पत्र के अनुसार 92,114 AEFI मामले दर्ज किए गए, जिनमें 89,332 मामूली, 2,782 गंभीर/अत्यंत गंभीर तथा 1,171 मृत्यु के मामले शामिल हैं।
  • सामाजिक अनुबंध का तर्क: नागरिकों ने टीकाकरण को आंशिक रूप से एक नागरिक कर्तव्य के रूप में स्वीकार किया; अतः सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से उत्पन्न दुर्लभ हानियों के लिए राज्य को उत्तरदायित्व ग्रहण करना चाहिए।
  • वर्तमान विधिक उपायों की सीमाएँ
    • टॉर्ट विधि की बाधाएँ: टॉर्ट दावों में निर्माता या राज्य की लापरवाही का प्रमाण आवश्यक होता है।
      • हालाँकि, प्रायः वैक्सीन द्वारा क्षति व्यक्तिगत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के कारण होती है, न कि किसी दोष के कारण, जिससे पीड़ितों के पास प्रभावी विधिक उपाय का अभाव रहता है।
    • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की सीमाएँ: जब टीके निःशुल्क प्रदान किए जाते हैं, तब दावे करना कठिन हो जाता है, क्योंकि ‘उपभोक्ता’ संबंध का अस्तित्व विवादित होता है तथा उपभोक्ता मंचों में फार्माकोविजिलेंस मूल्यांकन की विशेषज्ञता का अभाव होता है।
    • लोकहित याचिका (PIL) की अपर्याप्तता: PIL नीति निर्माण का निर्देश दे सकती है, परंतु व्यक्तिगत क्षतिपूर्ति तंत्र की स्थापना या संचालन नहीं कर सकती, जिससे एक समान प्रतितोष प्रणाली का अभाव बना रहता है।

संवैधानिक एवं विधिक आधार

  • अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार): संविधान केवल राज्य को टीकाकरण कार्यक्रम संचालित करने की अनुमति ही नहीं देता, बल्कि जनस्वास्थ्य की रक्षा करने का एक सकारात्मक दायित्व भी स्थापित करता है, जो अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है, जिसमें स्वास्थ्य का अधिकार भी सम्मिलित है।
  • वैध अपेक्षा का सिद्धांत (Doctrine of Legitimate Expectation): जब राज्य सामूहिक कल्याण हेतु किसी उपाय को अनिवार्य करता है या दृढ़ता से प्रोत्साहित करता है, तब उससे उत्पन्न हानि के लिए प्रभावित व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति प्रदान करने का दायित्व भी राज्य पर होता है।
    • “वैध अपेक्षा का सिद्धांत” इस विचार का समर्थन करता है, क्योंकि जो नागरिक राज्य के स्वास्थ्य निर्देशों का पालन करते हैं, वे यह वैध अपेक्षा कर सकते हैं कि यदि इसके पालन से उन्हें हानि होती है, तो उन्हें असहाय नहीं छोड़ा जाएगा।

भारत में वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र की स्थापना का महत्त्व 

  • जन विश्वास का निर्माण: पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा दुर्लभ हानि की स्थिति में सहायता के आश्वासन के माध्यम से टीकाकरण कार्यक्रमों में विश्वास को सुदृढ़ करता है।
  • समानता एवं सामाजिक न्याय को प्रोत्साहन: प्रभावित व्यक्तियों को न्यायसंगत क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करता है, विशेषकर गरीब नागरिकों के लिए, जो जटिल विधिक उपायों तक आसानी से पहुँच नहीं बना पाते हैं।
  • भविष्य के टीकाकरण अभियानों को सुगम बनाना: आगामी टीकाकरण कार्यक्रमों, जैसे भारत के बड़े पैमाने पर HPV टीकाकरण अभियान, में व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रथाएँ

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र के अंतर्गत एक समर्पित “वैक्सीन न्यायालय” की व्यवस्था।
  • यूनाइटेड किंगडम: वैक्सीन डैमेज पेमेंट स्कीम के अंतर्गत एकमुश्त भुगतान की व्यवस्था।
  • अन्य देश: जापान, जर्मनी, न्यूजीलैंड, नॉर्डिक देश, ताइवान में नो-फॉल्ट क्षतिपूर्ति ढाँचे विद्यमान हैं।

आगे की राह 

  • वैक्सीन क्षति मुआवजा अधिनियम: केवल कार्यपालिका के स्थान पर संसद द्वारा अधिनियमित एक वैधानिक ढाँचा स्थापित किया जाए।
  • वैक्सीन क्षति संबंधी तालिका: निर्धारित समय-सीमाओं के भीतर विशिष्ट अवस्थाओं की अनुमानित कारण सूची तैयार की जाए।
  • स्वतंत्र न्यायाधिकरण: दावों के निपटान हेतु चिकित्सीय एवं विधिक विशेषज्ञों वाला अर्द्ध-न्यायिक निकाय स्थापित किया जाए।
  • समर्पित क्षतिपूर्ति कोष: सरकार एवं वैक्सीन निर्माताओं द्वारा लेवी प्रणाली के माध्यम से संयुक्त रूप से वित्तपोषित एक कोष बनाया जाए।
  • सशक्त AEFI निगरानी: टीका सुरक्षा की निगरानी हेतु पारदर्शी, विभाजित (Disaggregated) रिपोर्टिंग तथा सार्वजनिक डैशबोर्ड विकसित किए जाएँ।

निष्कर्ष 

एक सुदृढ़ वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण की सामूहिक आवश्यकताओं एवं व्यक्तिगत न्याय के बीच संतुलन स्थापित करेगा तथा यह सुनिश्चित करेगा कि दुर्लभ प्रतिकूल घटनाओं का भार केवल प्रभावित व्यक्तियों पर न पड़े।

वैक्सीन क्षति मुआवजा तंत्र

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