संदर्भ
तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में बहुमत का आँकड़ा पार करते हुए चुनाव के बाद समर्थन हासिल करने के बाद, गवर्नर ने TVK नेता सी. जोसेफ विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।
राज्यपाल की भूमिका को परिभाषित करने वाले प्रावधान
- संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-164(1): अनुच्छेद-164(1) यह प्रावधान करता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति, मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाएगी।
- अनुच्छेद-163: अनुच्छेद-163 राज्यपाल को ऐसी स्थितियों में अपने विवेक का प्रयोग करने का अधिकार देता है, जहाँ संविधान विशेष रूप से स्वतंत्र निर्णय लेने की अनुमति देता है।
- संसदीय बहुमत का सिद्धांत: संवैधानिक शासन के लिए यह आवश्यक है कि कार्यपालिका को अपने पद पर बने रहने हेतु विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
- संवैधानिक परिपाटियाँ
- बहुमत-आधारित आमंत्रण: संवैधानिक परंपरा के अनुसार, राज्यपाल सरकार गठन के लिए उस दल के नेता को आमंत्रित करते हैं, जिसे विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो या जिसके पास बहुमत सिद्ध करने की सर्वाधिक संभावना हो।
- त्रिशंकु विधानसभा में प्राथमिकता: स्थापित परंपरा के अनुसार, सरकार गठन के समय चुनाव-पूर्व गठबंधनों को चुनाव-पश्चात् की व्यवस्थाओं पर प्राथमिकता दी जाती है।
- फ्लोर टेस्ट की परंपरा: संवैधानिक परंपरा इस बात का समर्थन करती है कि बहुमत सिद्ध करने के लिए राज्यपाल के व्यक्तिगत आकलन के बजाय ‘फ्लोर टेस्ट’ (सदन में शक्ति-परीक्षण) का सहारा लिया जाए।
- न्यायिक पूर्व-निर्णय
- एस.आर. बोम्मई मामला (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी सरकार के बहुमत समर्थन की जाँच केवल सदन के पटल पर ही की जानी चाहिए।
- रामेश्वर प्रसाद मामला (2006): न्यायालय ने इस बात को दोहराया कि किसी सरकार की संवैधानिक वैधता, विधानसभा में सिद्ध विधायी बहुमत पर निर्भर करती है।
- न्यायिक समीक्षा का सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों ने यह स्थापित किया कि राज्यपालों की विवेकाधीन शक्तियाँ न्यायिक समीक्षा के अधीन होती हैं, यदि उनका प्रयोग दुर्भावनापूर्ण तरीके से किया गया हो।
राज्यपाल की भूमिका को लेकर चिंताएँ
- पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली: आलोचकों का तर्क है कि राज्यपाल कभी-कभी निष्पक्ष रहने के बजाय केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पक्ष में कार्य करते हैं।
- असंगत मानक: सरकार बनाने के निमंत्रण के संबंध में कर्नाटक (2018) और गोवा-मणिपुर (2017) में अलग-अलग मानक अपनाए गए।
- फ्लोर टेस्ट (शक्ति परीक्षण) में देरी: फ्लोर टेस्ट में देरी से दल-बदल, राजनीतिक अस्थिरता और विधायी बहुमत के असंवैधानिक हेर-फेर को बढ़ावा मिल सकता है।
- संघवाद को कमजोर करना: राज्यपाल के विवेकाधिकार का कथित दुरुपयोग सहकारी संघवाद को कमजोर करता है और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा करता है।
राज्यपाल की भूमिका पर समितियों की सिफारिशें
- सरकारिया आयोग (1987)
- वरीयता क्रम: आयोग ने चुनाव बाद के गठबंधनों पर विचार करने से पहले बहुमत वाले चुनाव-पूर्व गठबंधन को आमंत्रित करने की सिफारिश की।
- तटस्थ आचरण: राज्यपालों को केंद्र सरकार के एजेंट के बजाय राजनीतिक रूप से तटस्थ संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने की सलाह दी गई।
- फ्लोर टेस्ट की आवश्यकता: आयोग ने सरकार के बहुमत समर्थन अनिश्चित होने पर शीघ्र फ्लोर टेस्ट कराने की सिफारिश की।
- पुंछी आयोग (2010)
- समयबद्ध फ्लोर टेस्ट: राजनीतिक हेर-फेर और हॉर्स-ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) को रोकने के लिए आयोग ने अल्प समय के भीतर अनिवार्य फ्लोर टेस्ट की सिफारिश की।
- सीमित विवेकाधिकार: त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री की नियुक्ति के दौरान, राज्यपालों को व्यक्तिगत विवेकाधीन शक्तियों को सीमित करने और वस्तुनिष्ठ मानदंडों का पालन करने का सुझाव दिया गया है।
- संवैधानिक नैतिकता: आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि राज्यपालों को संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए।
- न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति (2025)
- संहिताकरण प्रस्ताव: समिति ने राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को नियंत्रित करने वाले नियमों को संहिताबद्ध करने के लिए एक संवैधानिक अनुसूची जोड़ने की सिफारिश की।
- विवेकाधिकार में स्पष्टता: समिति ने उन परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का समर्थन किया, जिनके तहत राज्यपाल विवेकाधीन अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं।
राज्यपाल के बारे में
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और शासन की संसदीय प्रणाली के तहत नाममात्र की कार्यकारी शक्ति के रूप में कार्य करता है।
संवैधानिक प्रावधान
- संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद-153 से 167 राज्यपाल के कार्यालय, शक्तियों और कार्यों से संबंधित हैं।
- नियुक्ति: राज्यपाल की नियुक्ति अनुच्छेद-155 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- पात्रता मानदंड: अनुच्छेद-157 के तहत राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति को भारतीय नागरिक होना चाहिए और उसकी आयु कम-से-कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
- कार्यकाल: राज्यपाल अनुच्छेद-156 के तहत राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पाँच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करता है।
- पद: राज्यपाल, केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य संवैधानिक कड़ी के रूप में कार्य करता है।
प्रमुख भूमिकाएँ और कार्य
- कार्यकारी कार्य: राज्यपाल, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है तथा राज्य कार्यकारिणी का संचालन करता है।
- विधायी कार्य: अनुच्छेद 174 के अनुसार, राज्यपाल समय-समय पर राज्य विधानमंडल के सदन को आहूत करने, सत्रावसान करने और विधानसभा को विघटित करने की शक्ति रखता है। वह विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित भी रख सकता है।
- विवेकाधीन कार्य: त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में मुख्यमंत्री की नियुक्ति, अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को आरक्षित करने के मामलों में राज्यपाल अपने विवेक से कार्य करता है।
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निष्कर्ष
सरकार गठन में संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक वैधता सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी परिपाटियाँ, संहिताबद्ध दिशा-निर्देश तथा समयबद्ध फ्लोर टेस्ट (शक्ति परीक्षण) अनिवार्य हैं।