संदर्भ
हाल ही में एम्स नई दिल्ली द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि एक वर्ष से कम आयु के बच्चों के ‘स्क्रीन टाइम’ में वृद्धि का संबंध तीन वर्ष की आयु तक ऑटिज्म-संबंधी लक्षणों के उच्च जोखिम से है।
संबंधित तथ्य
- यह अध्ययन केवल संपर्क पर नहीं, बल्कि उपकरण की लत तथा उसके मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रभावों पर केंद्रित है।
ऑटिज्म क्या है?
- ऑटिज्म एक तंत्रिका-विकास संबंधी स्थिति है, जो संप्रेषण और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करती है।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था संज्ञानात्मक और सामाजिक विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।
- ऑटिज्म के लक्षण: इसके प्रमुख लक्षणों में आँखों का संपर्क प्रभावित होना, बोलने में देरी तथा पूर्व क्षमताओं का कम होना शामिल है।
- वैश्विक प्रसार: अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के अनुसार, वर्तमान में लगभग 31 में से 1 बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर इसका अनुमान लगभग 100 में से 1 है।
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अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष
- अध्ययन का नमूना एवं कार्यप्रणाली: AIIMS द्वारा किया गया अध्ययन 3 से 6 वर्ष आयु के 250 बच्चों पर आधारित था, जिसमें 150 बच्चे ऑटिज्म से ग्रस्त थे तथा 100 बच्चों का विकास सामान्य था।
- ऑटिज्म-सदृश लक्षणों का बढ़ा हुआ जोखिम: शोधकर्ताओं के अनुसार, बच्चे 3 वर्ष की आयु तक ऑटिज्म जैसे लक्षण विकसित होने की संभावना के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।
- स्क्रीन एक्सपोजर संबंधी चिकित्सीय सिफारिश: डॉक्टर 18 महीनों से कम आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन एक्सपोजर न देने और आदर्श रूप से 3 वर्ष की आयु से पहले स्क्रीन से दूर रखने की सलाह देते हैं।
- सहसंबंध, कारण नहीं: अध्ययन में प्रारंभिक आयु में स्क्रीन एक्सपोजर और ऑटिज्म के बीच मजबूत सहसंबंध पाया गया, परंतु इसे कारण के रूप में नहीं बताया गया।
बच्चों में ‘स्क्रीन टाइम’ के बारे में
- ‘स्क्रीन टाइम’ से तात्पर्य उस अवधि से है, जो बच्चे स्मार्टफोन, टेलीविजन, टैबलेट और कंप्यूटर जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हुए बिताते हैं।
वैज्ञानिक आधार: ‘स्क्रीन टाइम’ मस्तिष्क विकास को कैसे प्रभावित करता है?
| पहलू |
मुख्य बिंदु (Key Points) |
| प्रारंभिक मस्तिष्क की क्षमता (0–3 वर्ष) |
जीवन के पहले तीन वर्ष में मस्तिष्क का तीव्र विकास होता है, जिसमें न्यूरल कनेक्शन अत्यधिक तेजी से संबंधित होते हैं, जिससे यह अवधि विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। मस्तिष्क में अधिक क्षमता होती है, अर्थात् यह परिवेशीय अनुभवों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील रहता है। बातचीत, खेल और आँखों का संपर्क जैसे वास्तविक जीवन की अंतःक्रियाएँ संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास के लिए आवश्यक न्यूरल मार्गों को सुदृढ़ करती हैं। अत्यधिक ‘स्क्रीन टाइम’ इन अंतःक्रियाओं को कम कर देता है, जिससे मस्तिष्क के विकास और सीखने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
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| एकाग्रता क्षमता |
अत्यधिक स्क्रीन सामग्री के संपर्क से मस्तिष्क निरंतर उत्तेजक सामग्री का अभ्यस्त हो जाता है, जिससे बच्चे की एकाग्रता क्षमता और धीमी, वास्तविक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है।
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| भाषायी विकास |
प्रारंभिक बाल्यावस्था में भाषा का विकास सक्रिय रूप से सुनने और अभिभावकों के साथ द्विपक्षीय संवाद पर निर्भर करता है। निष्क्रिय स्क्रीन देखने से मौखिक अंतःक्रिया सीमित हो जाती है, जिससे बोलने में विलंब और भाषा कौशल कमजोर हो सकते हैं।
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| सामाजिक अंतःक्रिया |
मानव अंतःक्रिया आँखों का संपर्क, भावनात्मक समझ और सामाजिक बंधन विकसित करने के लिए आवश्यक है। अत्यधिक स्क्रीन उपयोग इन अंतःक्रियाओं का स्थान ले लेता है, जिससे सामाजिक संप्रेषण और संबंधों में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
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| मेलाटोनिन (नींद संबंधी हार्मोन) |
विशेषकर रात में स्क्रीन के उपयोग से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन के स्राव को कम कर देती है, जिससे नींद चक्र बाधित होता है और मस्तिष्क विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
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| डोपामिन (पुरस्कार प्रणाली) |
डिजिटल माध्यम त्वरित संतुष्टि प्रदान करते हैं, जिससे मस्तिष्क में बार-बार डोपामिन स्राव होता है। इससे इसकी आदत जैसी प्रवृत्ति विकसित हो सकती है तथा वास्तविक गतिविधियों की अपेक्षा स्क्रीन की ओर अधिक आकर्षण बढ़ता है, जो प्रेरणा और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करता है।
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वर्तमान जीवनशैली में बच्चों में ‘स्क्रीन टाइम’ बढ़ने के कारण
- डिवाइस तक आसन पहुँच: किफायती स्मार्टफोन और टैबलेट की आसान उपलब्धता ने बच्चों में कम आयु में ही स्क्रीन के संपर्क को बढ़ा दिया है।
- उदाहरण: छोटे बच्चे भोजन के समय यूट्यूब पर कार्टून देखते हैं क्योंकि घर में स्मार्टफोन आसानी से उपलब्ध होते हैं।

- परिवार संरचना में परिवर्तन: एकल परिवारों और कामकाजी अभोभावकों की बढ़ती संख्या के कारण निगरानी का समय कम हो गया है, जिससे स्क्रीन ‘डिजिटल बेबीसिटर’ की तरह कार्य करने लगी हैं।
- उदाहरण: दोनों माता-पिता के काम पर होने पर बच्चे को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल फोन दे दिया जाता है।
- व्यस्त जीवनशैली एवं समय की कमी: आधुनिक जीवनशैली में समय की कमी माता-पिता को स्क्रीन जैसे सुविधाजनक साधनों की ओर प्रेरित करती है।
- उदाहरण: यात्रा के दौरान या घरेलू कार्य करते समय बच्चे को शांत रखने के लिए टैबलेट या मोबाइल दिया जाता है।
- आकर्षक डिजिटल मनोरंजन: एल्गोरिदम-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विकास ने बच्चों में स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ा दी है।
- उदाहरण: नेटफ्लिक्स पर ऑटो-प्ले सामग्री बच्चों को लगातार लंबे समय तक व्यस्त रखती है।
- शिक्षा का डिजिटलीकरण: ऑनलाइन शिक्षा ने बच्चों में लंबे समय तक स्क्रीन के उपयोग को सामान्य बना दिया है।
- उदाहरण: बच्चा ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने के बाद उसी डिवाइस का उपयोग गेमिंग या वीडियो देखने के लिए करता रहता है।
- ‘आउटडोर’ खेलों में कमी: शहरीकरण और सुरक्षित खेल स्थानों की कमी के कारण बच्चे इनडोर डिजिटल गतिविधियों की ओर अधिक झुकाव रखते हैं।
- उदाहरण: बच्चे खेल के मैदान में जाने के स्थान पर शाम को मोबाइल गेम खेलते हैं।
- अभिभावकीय धारणा एवं सामाजिक प्रवृत्तियाँ: स्क्रीन को शिक्षा के साधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे बच्चों में इसका उपयोग अधिक हो रहा है।
- उदाहरण: माता-पिता शैक्षिक वीडियो देखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जो धीरे-धीरे लंबे समय तक मनोरंजन देखने में बदल जाता है।
चुनौतियाँ
- संज्ञानात्मक विकास में कमी: डिजिटल स्क्रीन के अत्यधिक और प्रारंभिक संपर्क के कारण बच्चों के संज्ञानात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिससे ध्यान अवधि में कमी, स्मृति धारण क्षमता में कमजोरी तथा निष्क्रिय सामग्री उपभोग के कारण आलोचनात्मक सोच की क्षमता में कमी देखी जा रही है।
- शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट: लंबे समय तक निष्क्रिय रहकर स्क्रीन का उपयोग करने से बाल्यावस्था मोटापा, खराब शारीरिक मुद्रा, प्रारंभिक दृष्टि समस्याएँ और नींद विकार बढ़ रहे हैं, जिससे दीर्घकालिक शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।
- भावनात्मक एवं व्यावहारिक अस्थिरता: डिजिटल उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, भावनात्मक नियंत्रण में कमी तथा चिंता और अवसाद के प्रति अधिक संवेदनशीलता बढ़ रही है।
- सामाजिक कौशल में ह्रास: अत्यधिक ‘स्क्रीन टाइम’ वास्तविक सामाजिक अंतःक्रियाओं का स्थान ले रहा है, जिससे अंतर-व्यक्तिगत संचार कौशल कमजोर हो रहे हैं, सहानुभूति में कमी आ रही है तथा सार्थक सामाजिक संबंध बनाने में कठिनाई हो रही है।
- शैक्षणिक व्यवधान: विशेष रूप से गेमिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से अनियंत्रित डिजिटल संपर्क पढ़ाई से ध्यान भटका रहा है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट हो रही है और अनुशासित अध्ययन के स्थान पर तत्काल संतुष्टि की प्रवृत्ति विकसित हो रही है।
- अनुचित सामग्री के संपर्क का जोखिम: बच्चे ऑनलाइन हानिकारक, हिंसक या आयु-अनुपयुक्त सामग्री के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहे हैं, जो उनके व्यवहार, मूल्यों और मानसिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।
- निर्भरता: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम-आधारित डिजाइन से आसक्तिपूर्ण उपयोग के पैटर्न विकसित होते हैं, जिससे इस पर निर्भरता बढ़ती है, आत्म-नियंत्रण प्रभावित होता है और प्रारंभिक आयु से ही स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ती है।
- पारिवारिक अंतःक्रिया में कमी: घरों में व्यक्तिगत स्क्रीन उपयोग में वृद्धि के कारण गुणवत्तापूर्ण पारिवारिक समय में कमी आ रही है, जिससे माता-पिता और बच्चों के संबंध एवं संवाद कमजोर हो रहे हैं।
- डिजिटल विभाजन और असमानता: जहाँ कुछ बच्चे अत्यधिक स्क्रीन उपयोग का सामना कर रहे हैं, वहीं अन्य बच्चों के पास रचनात्मक डिजिटल साधनों की कमी है, जिससे डिजिटल साक्षरता और संतुलित उपयोग में असमानता उत्पन्न हो रही है।
- दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव: बचपन में उच्च स्क्रीन निर्भरता का सामान्यीकरण एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर सकता है, जिसमें शारीरिक गतिविधियों में कमी, अधिगम में कमी तथा वास्तविक जीवन में समस्या-समाधान क्षमता में कमी होगी।
‘स्क्रीन टाइम’ से निपटने के लिए सरकारी उपाय
- राज्य-स्तरीय नियामक पहल: सरकार, विशेषकर राज्य स्तर पर, आयु-आधारित प्रतिबंधों और समय-सीमाओं के माध्यम से बच्चों के स्क्रीन एक्सपोजर को नियंत्रित करने हेतु लक्षित डिजिटल डिटॉक्स नीतियाँ तैयार कर रही है।
- उदाहरण: कर्नाटक की प्रस्तावित डिजिटल डिटॉक्स नीति (2026) में मनोरंजनात्मक ‘स्क्रीन टाइम’ को एक घंटे तक सीमित करने और नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पहुँच पर प्रतिबंध का सुझाव दिया गया है।
- शिक्षा में डिजिटल कल्याण का एकीकरण: विद्यालय के पाठ्यक्रम में डिजिटल साक्षरता और उत्तरदायी प्रौद्योगिकी उपयोग को शामिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि बच्चों में अनुशासित स्क्रीन आदतें विकसित हों।
- उदाहरण: NCERT और CBSE द्वारा NEP-2020 के अंतर्गत साइबर सुरक्षा मॉड्यूल और डिजिटल नागरिकता शिक्षा।
- संरचित हस्तक्षेपों को बढ़ावा: शैक्षणिक संस्थानों को ‘टेक-फ्री’ समय और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ाने जैसे उपाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि स्क्रीन निर्भरता कम हो।
- उदाहरण: कर्नाटक और केरल में “नो गैजेट आवर्स” और खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु दिशा-निर्देश।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य परामर्श ढाँचा: सरकार समर्थित स्वास्थ्य संस्थाएँ बच्चों में संज्ञानात्मक और शारीरिक हानि को रोकने के लिए आयु-विशिष्ट ‘स्क्रीन टाइम’ मानक जारी कर रही हैं।
- उदाहरण: इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) द्वारा 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन एक्सपोजर न देने और बड़े बच्चों के लिए सीमित उपयोग की सिफारिश।
- मानसिक स्वास्थ्य समर्थन तंत्र: सरकार संस्थागत सहयोग और परामर्श सेवाओं के माध्यम से डिजिटल लत से निपटने के लिए मानसिक स्वास्थ्य उपायों को सुदृढ़ कर रही है।
- उदाहरण: NIMHANS द्वारा व्यावहारिक लत पर अनुसंधान और टेली-मानस हेल्पलाइन के साथ एकीकरण।
- ऑफलाइन गतिविधियों को प्रोत्साहन: नीतिगत प्रयासों का उद्देश्य शारीरिक गतिविधियों और मनोरंजन के वैकल्पिक साधनों को बढ़ावा देना है, ताकि निष्क्रिय डिजिटल जीवनशैली कम हो।
- उदाहरण: खेलो इंडिया प्रोग्राम के माध्यम से बच्चों और युवाओं में खेल सहभागिता को बढ़ावा।
- दंडात्मक के बजाय निवारक दृष्टिकोण पर बल: सरकारी रणनीति कड़े प्रवर्तन के बजाय जागरूकता और संस्थागत समर्थन के माध्यम से व्यवहार परिवर्तन पर बल देती है।
- उदाहरण: CBSE द्वारा COVID-19 महामारी के दौरान और बाद में छात्रों के लिए संतुलित स्क्रीन उपयोग संबंधी परामर्श।
‘स्क्रीन टाइम’ विनियमन पर अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाएँ
- चीन में सख्त गेमिंग समय विनियमन: सरकार नाबालिगों के लिए ऑनलाइन गेमिंग पर कानूनी रूप से बाध्यकारी समय-सीमाएँ लागू करती है, जिससे डिजिटल लत को नियंत्रित किया जा सके।
- ऑस्ट्रेलिया में समग्र डिजिटल कल्याण ढाँचा: राष्ट्रीय नीतियाँ अभिभावकीय मार्गदर्शन उपकरण, विद्यालयी हस्तक्षेप और जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से संतुलित स्क्रीन उपयोग को बढ़ावा देती हैं।
- यूनाइटेड किंगडम में ‘चाइल्ड ऑनलाइन सेफ्टी लॉ’: नियामक ढाँचे आयु-उपयुक्त डिजाइन, गोपनीयता संरक्षण और बच्चों को लक्षित आसक्तिपूर्ण विशेषताओं के नियंत्रण पर बल देते हैं।
- वैश्विक बाल-चिकित्सा के ‘स्क्रीन टाइम’ दिशा-निर्देश: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे संगठन बहुत छोटे बच्चों के लिए न्यूनतम या शून्य स्क्रीन एक्सपोजर और बड़े आयु समूहों के लिए संरचित समय-सीमाओं से संबंधित सुझाव देते हैं।
- स्कूल पाठ्यक्रम में डिजिटल साक्षरता का एकीकरण: कई विकसित देश डिजिटल नागरिकता संबंधी शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करते हैं, जिससे बच्चों में उत्तरदायी और संतुलित प्रौद्योगिकी उपयोग विकसित हो।
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आगे की राह
- आयु-उपयुक्त स्क्रीन दिशा-निर्देशों का प्रवर्तन: इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे साक्ष्य-आधारित दिशा-निर्देशों को अपनाते हुए उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें 2 वर्ष से कम आयु में शून्य स्क्रीन एक्सपोजर और उसके बाद नियंत्रित उपयोग शामिल हो।
- अभिभावक जागरूकता और व्यावहारिक प्रशिक्षण: बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान संचालित कर अभिभावकों को अत्यधिक ‘स्क्रीन टाइम’ के विकासात्मक जोखिमों के बारे में शिक्षित किया जाए और उचित पालन-पोषण (सह-दृश्यता, स्क्रीन सीमाएँ तय करना) को बढ़ावा दिया जाए।
- प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल तंत्र को सुदृढ़ करना: आंगनवाड़ी सेवाओं और बाल चिकित्सा परामर्श में ‘स्क्रीन टाइम’ संबंधी मार्गदर्शन को शामिल किया जाए, ताकि समेकित बाल विकास सेवाएँ (ICDS) जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत समुदाय स्तर पर प्रारंभिक हस्तक्षेप सुनिश्चित हो सके।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन का विनियमन: एल्गोरिदम-आधारित प्लेटफॉर्म्स (जैसे यूट्यूब या नेटफ्लिक्स) के लिए चाइल्ड सेफ्टी मोड, ऑटो-प्ले को डिफॉल्ट रूप से बंद करना और आसक्तिपूर्ण विशेषताओं को कम करना सुनिश्चित करने हेतु नियमन को प्रोत्साहित किया जाए।
- बाहरी और अनुभवात्मक सीख को बढ़ावा देना: खेलो इंडिया जैसी पहलों को सुदृढ़ कर सुरक्षित खेल स्थान, खेल अवसंरचना और समुदाय-आधारित गतिविधियों की उपलब्धता बढ़ाई जाए, जिससे स्क्रीन पर निर्भरता कम हो।
- विद्यालयी स्तर पर डिजिटल अनुशासन संबंधी ढाँचा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप स्कूलों में “नो-गैजेट आवर्स”, डिजिटल डिटॉक्स अवधि और अनुभवात्मक अधिगम को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि बच्चों में संतुलित डिजिटल व्यवहार विकसित हो।
- अनुसंधान, निगरानी और नीतिगत एकीकरण: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) जैसे संस्थानों द्वारा निरंतर शोध को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन किया जा सके और निष्कर्षों को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य तथा शिक्षा नीतियों में समाहित कर अनुकूली शासन सुनिश्चित किया जा सके।