एक महत्त्वपूर्ण निर्णय: भारत के भूकंप जोनिंग में संशोधन पर पुनर्विचार (Rollback)

एक महत्त्वपूर्ण निर्णय: भारत के भूकंप जोनिंग में संशोधन पर पुनर्विचार (Rollback) 12 Mar 2026

संदर्भ

केंद्र सरकार तथा भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा भारत के भूकंप क्षेत्र निर्धारण में किए गए संशोधन को वापस लेने का निर्णय लिया गया है। इसके पीछे पद्धति (methodology) को लेकर विद्यमान चिंताएँ और निर्माण तथा अवसंरचना परियोजनाओं पर बढ़ने वाली लागत प्रमुख कारण रहे।

भारत की वर्त्तमान भूकंप जोनिंग व्यवस्था की सीमाएँ

  • पुरानी जोनिंग प्रणाली: भारत की भूकंप जोनिंग प्रणाली लगभग 30–40 वर्ष पुरानी है। यह उस समय विकसित हुई थी जब तकनीक और शहरीकरण का स्तर आज की तुलना में काफी कम था।
  • भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र का दायरा: मौजूदा मॉडल के अनुसार भारत के लगभग 59% भू-भाग को भूकंपीय रूप से सक्रिय माना जाता है।
  • भारत का भूकंप जोन वर्गीकरण
    • जोन II (सबसे कम जोखिम): मुख्यतः दक्कन पठार और दक्षिण भारत का अधिकांश भाग।
    • जोन III (मध्यम जोखिम): मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से।
    • जोन IV (उच्च जोखिम): दिल्ली, उत्तर प्रदेश के कुछ भाग और मुंबई
    • जोन V (सबसे अधिक जोखिम): कश्मीर, उत्तर-पूर्व भारत और कच्छ क्षेत्र
  • स्थान-विशिष्ट आकलन की कमी: यह ढाँचा स्थानीय भूवैज्ञानिक परिस्थितियों को शामिल नहीं करता और कठोर चट्टान वाले क्षेत्रों तथा मुलायम जलोढ़ मृदा वाले क्षेत्रों को समान मानता है, जबकि मुलायम मृदा भूकंपीय तरंगों को बढ़ाती है और भूकंप के नुकसान को बढ़ा देती है।
  • संभाव्यता आधारित आकलन का अभाव: यह प्रणाली भूकंपीय जोखिम को स्थिर मानती है और बदलते जोखिम पैटर्न या संभाव्यता को शामिल नहीं करती।
  • कठोर वर्गीकरण: एक बार किसी क्षेत्र को किसी जोन में रखा गया तो वह लंबे समय तक स्थिर बना रहता है, उसमें गतिशील पुनर्मूल्यांकन नहीं होता।

संभाव्य भूकंपीय खतरे के आकलन (PSHA) ढाँचे में प्रस्तावित बदलाव

  • PSHA मॉडल को अपनाने का प्रस्ताव: BIS ने पारंपरिक स्थिर जोनिंग प्रणाली को हटाकर संभाव्य भूकंपीय खतरे के आकलन (PSHA) मॉडल अपनाने का प्रस्ताव दिया था। यह मॉडल अमेरिका और जापान जैसे देशों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
  • ऐतिहासिक भूकंपीय डेटा का उपयोग: यह ढाँचा पिछले 500 वर्षों के भूकंपों की आवृत्ति और तीव्रता का विश्लेषण करता है ताकि दीर्घकालिक पैटर्न को समझा जा सकें।
  • टेक्टोनिक फॉल्ट्स का मानचित्रण: इसमें टेक्टोनिक प्लेटों और भूमिगत फॉल्ट लाइनों का विस्तृत मानचित्रण शामिल है, जिससे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान हो सके।
  • संभाव्यता आधारित जोखिम अनुमान: यह मॉडल यह गणना करता है कि भविष्य की किसी समय सीमा (जैसे अगले 50 वर्षों) के भीतर विशेष तीव्रता के भूकंप आने की संभावना कितनी है।
  • नया जोन VI प्रस्तावित: प्रस्ताव में जोन VI, एक “अत्यंत उच्च जोखिम” भूकंपीय क्षेत्र, को शामिल किया गया। जिन क्षेत्रों को भूकंपीय जोन VI में रखने का प्रस्ताव था, वे थे:
    • जोन VI में प्रस्तावित क्षेत्र:
      • कश्मीर घाटी – हिमालयी टक्कर क्षेत्र में स्थित, जहाँ अक्सर झटके महसूस होते हैं।
      • उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश – सक्रिय हिमालयी भूकंपीय बेल्ट का हिस्सा।
      • कच्छ क्षेत्र (गुजरात) – यह 2001 के विनाशकारी भुज भूकंप का क्षेत्र है, जो 20,000 से अधिक लोगों की मौत का कारण बना।
      • पूरा उत्तर-पूर्व भारत – जटिल टेक्टोनिक क्रियाओं के कारण यह क्षेत्र एक अत्यंत सक्रिय भूकंपीय जोन में आता है।

संभाव्य भूकंपीय खतरे के आकलन (PSHA) ढाँचे को वापस लेने के कारण

  • निर्माण लागत में वृद्धि: भूकंपीय जोखिम जोन को उन्नत करने के लिए कड़े संरचनात्मक मानक लागू करना आवश्यक होगा, जिससे एक जोन के उन्नयन पर निर्माण लागत लगभग 20% और दो जोनों के उन्नयन पर लगभग 33% तक बढ़ जाएगी।
  • प्रमुख अवसंरचना को सुदृढ़ करने का भारी बोझ: जोन पुनर्वर्गीकरण के कारण 5,700 से अधिक बड़े बांध, मेट्रो सिस्टम, राजमार्ग और अन्य महत्वपूर्ण अवसंरचना को महंगी मरम्मत और सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता होगी, जिसकी लागत प्रति परियोजना हजारों करोड़ रुपये तक हो सकती है।
  • अनौपचारिक आवास क्षेत्र से संबंधित चुनौतियाँ: चूँकि भारत में लगभग 80% घर अनौपचारिक तरीके से और बिना पेशेवर निरीक्षण के बनाए जाते हैं, इसलिए बढ़ी हुई अनुपालन लागत के कारण परिवार सुरक्षा मानकों की पूरी तरह अनदेखी कर सकते हैं।
  • पर्यावरणीय संघर्ष: कड़े निर्माण मानकों के लिए अधिक स्टील और सीमेंट की आवश्यकता होती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है।
    • यह आपदा प्रतिरोध क्षमता और जलवायु शमन के बीच एक विरोधाभास उत्पन्न करता है।
  • पद्धतिगत सुसंगतता को लेकर चिंताएँ: कुछ मंत्रालयों और विशेषज्ञों का तर्क है कि PSHA के परिणाम हमेशा साइट-विशिष्ट भू-आकलनों के अनुरूप नहीं थे, जिससे इसके नियामक उपयोग में विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

आगे की राह 

  • चरणबद्ध कार्यान्वयन: सरकारी भवनों और महत्वपूर्ण सार्वजनिक अवसंरचना को पहले कड़े भूकंपीय सुरक्षा मानक अपनाने चाहिए, और बाद में ये मानक निजी निर्माणों तक विस्तारित किए जाने चाहिए।
  • सब्सिडी: गरीब और कमजोर परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाओं के माध्यम से वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए, ताकि वे भूकंप-प्रतिरोधी आवास का निर्माण कर सकें।
  • हाइब्रिड परीक्षण पद्धति: BIS और इंजीनियरिंग संस्थानों जैसी संस्थाओं को PSHA को साइट-विशिष्ट भू-परिक्षण के साथ मिलाकर एक सम्मिश्रित (hybrid) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि जोखिम मूल्यांकन की सटीकता बढ़ाई जा सके।
  • निर्माण क्षेत्र और उद्योग: निर्माणकर्ता और सामग्री उत्पादकों को फ्लाई ऐश सीमेंट और बांस जैसे लो-कार्बन सामग्री को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि भूकंप-प्रतिरोधकता और जलवायु शमन को संतुलित किया जा सके।
  • स्थानीय मजदूर और जमीनी स्तर के निर्माणकर्ता: स्थानीय मजदूर और निर्माण श्रमिकों को स्थानीय भाषाओं में प्रशिक्षण कार्यक्रम और भूकंप-सुरक्षित मार्गदर्शिकाएँ प्रदान की जानी चाहिए, ताकि सुरक्षा मानकों का पालन बेहतर तरीके से सुनिश्चित किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत में भूकंपीय जोनिंग सुधार में वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन, लागत क्षमता और व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि आपदा-प्रतिरोधी निर्मित वातावरण तैयार किया जा सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा प्रस्तावित संशोधित भूकंप जोनिंग ढाँचे को हाल ही में वापस लेना (Rollback) इस बात को दर्शाता है कि आपदा-लचीलापन (Disaster Resilience), आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability) और जलवायु शमन (Climate Mitigation) के बीच जटिल संतुलन मौजूद है। भारत के तेजी से बढ़ते शहरी अवसंरचना के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए तथा भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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