संदर्भ
भारत में तेजी से हो रहे बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विस्तार के साथ निर्माण कार्यों से होने वाला वायु प्रदूषण भी बढ़ रहा है। विशेष रूप से सड़क की धूल और अधूरी राजमार्ग परियोजनाएँ शहरी कणीय प्रदूषण (Particulate Pollution) के बड़े स्रोत बनती जा रही हैं।
भारतीय शहरों में “ग्रे क्लाउड” (Grey Cloud) की घटना
- पराली जलाने से आगे की समस्या: दिल्ली-एनसीआर में धुंध को अक्सर पराली जलाने से जोड़ा जाता है, लेकिन मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी ग्रे धुंध दिखाई देना दर्शाता है कि समस्या केवल पराली तक सीमित नहीं है।
- निर्माण धूल एक बड़ा स्रोत: यह धुंध मुख्यतः सिलिका, सीमेंट के कण और बारीक मिट्टी से बनी होती है, जो बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों से उत्पन्न होती है।
- धूल बनने की प्रक्रिया: भारी निर्माण मशीनें और खुदाई की प्रक्रियाएँ मिट्टी और अन्य पदार्थों को अत्यंत सूक्ष्म कणों में बदल देती हैं, जो लंबे समय तक वायु में विद्यमान रहते हैं और शहरी वायु गुणवत्ता को खराब करते हैं।
बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में देरी और जनता पर लागत
- अधूरी परियोजनाएँ: राजमार्ग और फ्लाईओवर जैसी कई बड़ी परियोजनाएँ अक्सर लंबित रहती हैं।
- वर्त्तमान में 574 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएँ समय से पीछे हैं, जिससे लगभग ₹3600 करोड़ करदाताओं का धन फँसा हुआ है।
- पूर्णता से अधिक राजनीतिक प्रदर्शन: राजनेता अक्सर प्रतीकात्मक रूप से सड़क के छोटे हिस्सों का उद्घाटन कर देते हैं, जबकि बाकी भाग अधूरा रह जाता है।
- नतीजतन, अधूरी सेवा सड़कें से लंबे समय तक धूल उड़ती रहती हैं।
- गोल्डन क्वाड्रिलेटरल परियोजना: वर्ष 2000 में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन अभी भी कई स्थानों पर निर्माण कार्य और नेटवर्क में खामियों के कारण ये शहर पूरी तरह सुचारु रूप से जुड़े नहीं हैं।
नियामक और क्रियान्वयन संबंधित विफलताएँ
- प्रदूषण के स्रोतों में बदलाव: राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) की रिपोर्टों के अनुसार, धूल कणों और उत्सर्जन का प्रमुख स्रोत परिवहन की बजाय अब निर्माण कार्य बन गया है।
- नियमों का उल्लंघन: निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के बावजूद, अनुपालन अभी भी कमजोर है।
- हरित परदे, पवन अवरोध और लगातार पानी छिड़काव जैसी उपायों की अक्सर अनदेखी की जाती है।
- अप्रभावी नियंत्रण उपाय: विशेष धूल-नियंत्रण मशीनरी का उपयोग करने के बजाय, निर्माण स्थल अक्सर एक ही कर्मचारी पर निर्भर रहते हैं जो जल हाथ से छिड़कता है, जबकि जेसीबी और बुलडोज़र बड़ी मात्रा में धूल उत्पन्न करते रहते हैं।
- जवाबदेही की कमी: ठेकेदारों को अक्सर देरी के लिए न्यूनतम जिम्मेदारी का सामना करना पड़ता है।
- छोटे जुर्माने को वे निर्माण लागत में जोड़ देते हैं, जिससे उनका मुनाफा प्रभावित नहीं होता तथा उनकी कार्यप्रणाली में बदलाव नहीं आता।
स्वास्थ्य बनाम विकास
- गैरेट हार्डिन का ‘सामान्य संसाधनों का त्रासद’: स्वच्छ वायु एक साझा संसाधन है जिसका उपयोग हर कोई करता है, लेकिन इसे कोई सुरक्षित नहीं करता।
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: हालाँकि अवसंरचना विकास राष्ट्रीय आवश्यकता है, यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
- वर्त्तमान “धूल अर्थव्यवस्था” में निर्माण की गति और राजनीतिक प्रदर्शन को नागरिकों की स्वच्छ हवा की आवश्यकता से अधिक प्राथमिकता दी जा रही है।
आगे की राह
- कठोर धूल निवारण प्रवर्तन: निर्माण स्थलों पर धूल कम करने के उपायों को अनिवार्य रूप से लागू करना और धूल उत्सर्जन तथा प्रदूषण नियंत्रण मानकों के पालन की वास्तविक समय में निगरानी करना।
- समयबद्ध परियोजना पूर्णता: लंबी निर्माण अवधि को रोकने के लिए परियोजना प्रबंधन, जवाबदेही और दंड प्रणाली को मजबूत करना।
- एकीकृत शहरी वायु गुणवत्ता योजना: शहरी वायु प्रबंधन रणनीतियों में निर्माण धूल को प्रमुख प्रदूषण स्रोत के रूप में मान्यता देना।
निष्कर्ष
अवसंरचना विकास को पर्यावरणीय शासन और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ संरेखित किया जाना चाहिए, ताकि विकास न केवल बेहतर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करे बल्कि साफ और श्वास योग्य शहरी वातावरण भी सुनिश्चित करे।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: हाल के वर्षों में शहरी निर्माण परियोजनाओं के कारण “धूल अर्थव्यवस्था” (Dust Economy) का निर्माण हुआ है। यह आर्थिक प्राथमिकताओं और नागरिकों की वायु गुणवत्ता के संरक्षण के बीच संघर्ष को उजागर करता है।
(150 शब्द, 10 अंक)
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