UPSC PYQs

Prelims, Mains & Optional PYQs

UPSC Notes

Comprehensive & Short Notes

सर्वोच्च न्यायालय और न्यायिक स्वतंत्रता

सर्वोच्च न्यायालय और न्यायिक स्वतंत्रता 11 Mar 2026

संदर्भ

संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय नाइन इन लर्निंग रिसोर्सेज इंक बनाम ट्रम्प (2025) [Nine in Learning Resources Inc. vs. Trump (2025)] में कार्यकारी शक्ति पर संवैधानिक सीमाओं की पुनः पुष्टि करता है। इस निर्णय ने न्यायिक स्वतंत्रता और संवैधानिक शासन की सुरक्षा में अदालतों की भूमिका पर चर्चाओं को फिर से सक्रिय कर दिया है।

शक्तियों का पृथक्करण (मोंटेस्क्यू का सिद्धांत)

  • परिभाषा: शक्तियों का पृथक्करण उस व्यवस्था को कहते हैं जिसमें शासन की शक्तियों को विभिन्न संस्थाओं के बीच विभाजित किया जाता है, ताकि सत्ता का केंद्रीकरण न हो और नियंत्रण एवं संतुलन की स्थिति कायम रहे।
    • विधायिका (Legislature): कानून बनाने की जिम्मेदारी विधायिका की होती है। भारत में यह कार्य संसद द्वारा किया जाता है।
    • कार्यपालिका (Executive): कानूनों को लागू करने और प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी कार्यपालिका की होती है। भारत में यह कार्य सरकार, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है।
    • न्यायपालिका (Judiciary): कानूनों की व्याख्या करने और उनकी संवैधानिक वैधता सुनिश्चित करने का कार्य न्यायपालिका का होता है। भारत में यह कार्य सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा किया जाता है।
  • उद्देश्य: इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी संस्था अपनी संवैधानिक सीमाओं से आगे न बढ़े, जिससे लोकतांत्रिक शासन की रक्षा होती है और तानाशाही प्रवृत्तियों को रोका जा सकता है।
  • न्यायिक साहस (Judicial Courage): जब न्यायाधीश न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए राजनीतिक दबाव और व्यक्तिगत हितों का विरोध करते हैं, तो यह न्यायिक साहस को दर्शाता है।

केस स्टडी – ट्रम्प बनाम अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय (2026)

  • वाद/मामला: नाइन इन लर्निंग रिसोर्सेज इंक बनाम ट्रम्प (2025)
  • मुद्दा: अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को आपातकालीन टैरिफ (आयात कर) लगाने की अनुमति प्रदान करता है, लेकिन इन शक्तियों का मनमाने तरीके से उपयोग नहीं किया जा सकता और इन्हें कांग्रेस (विधायिका) के प्रति जवाबदेह रहना होता है।
  • निर्णय: अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ को असंवैधानिक घोषित कर दिया और कार्यपालिका की शक्ति के वैध उपयोग और दुरुपयोग के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया।
  • व्यवहार में न्यायिक स्वतंत्रता: संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में 9 न्यायाधीश हैं — 6 की नियुक्ति रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों द्वारा और 3 की नियुक्ति डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों द्वारा की गई है।
    • वैचारिक मतभेदों के बावजूद, रिपब्लिकन द्वारा नियुक्त तीन न्यायाधीशों ने 6–3 के फैसले में डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध वोट दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संवैधानिक सिद्धांत राजनीतिक निष्ठा से ऊपर होते हैं।

अतीत में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले मामले:

  • ट्रम्प बनाम हवाई (2018): न्यायालय ने ट्रम्प प्रशासन द्वारा कई मुस्लिम-बहुल देशों पर लगाए गए यात्रा प्रतिबंध (ट्रैवल बैन) को बरकरार रखा।
  • ट्रम्प बनाम सिएरा क्लब (2019): न्यायालय ने अमेरिका–मेक्सिको सीमा दीवार के निर्माण के लिए रक्षा निधि को अन्य कार्यों से हटाकर उपयोग करने की अनुमति दी।
  • ट्रम्प बनाम नोर्मा एंडरसन (2024): कैपिटल विद्रोह में ट्रम्प की कथित भूमिका के बावजूद, न्यायालय ने उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने से इंकार कर दिया।
  • परिणाम: इन निर्णयों ने न्यायालय को पक्षपाती दिखाने की धारणा बनाई, हालांकि लर्निंग रिसोर्सेज (Learning Resources) (2026) के निर्णय ने अदालत की विश्वसनीयता को पुनः स्थापित करना शुरू कर दिया है।

भारत में न्यायिक स्वतंत्रता के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ

  • अनुच्छेद 370 और इंटरनेट का अधिकार (अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ, 2020)
    • पृष्ठभूमि: अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद जम्मू-कश्मीर में लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहा।
    • अधिकार की न्यायिक मान्यता: अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट तक पहुँच अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का अभिन्न अंग है।
    • मजबूत प्रवर्तन का अभाव: अदालत ने इस अधिकार को मान्यता दी, लेकिन परमादेश (एक आदेश जो सरकार को तुरंत इंटरनेट बहाल करने का निर्देश देता है) जारी करने से इनकार कर दिया।
    • निहितार्थ: परमादेश के माध्यम से अधिकार लागू करने में हिचकिचाहट ने कार्यकारी अधिकार का सामना करने में न्यायिक संयम (Judicial Restraint) की धारणा को जन्म दिया ।
  • तमिलनाडु के राज्यपाल और पॉकेट वीटो (तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल, 2025)
    • पृष्ठभूमि: इस मामले में तमिलनाडु के राज्यपाल ने कई विधेयकों पर सहमति नहीं दी और उन्हें लंबित रखा, जिससे प्रभावी रूप से पॉकेट वीटो का प्रयोग हुआ और निर्वाचित सरकार द्वारा पारित कानूनों में देरी हुई।
    • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकते, क्योंकि इससे निर्वाचित राज्य सरकार की संवैधानिक कार्यप्रणाली कमजोर होती है।
    • केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया: सरकार ने अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति विशेष संदर्भ संख्या 1, 2025 का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति से इस मामले को पुनः सर्वोच्च न्यायालय के पास भेजने का अनुरोध किया। इस कदम को न्यायालय के निर्णय की पुनः समीक्षा और संभावित रूप से उसे कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखा गया।

भारतीय न्यायपालिका के लिए प्रमुख उदाहरण

  • संविधान की सर्वोच्चता: न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संविधान और संस्थाएं सर्वोच्च हैं, और कोई भी राजनीतिक नेता संवैधानिक सीमाओं से ऊपर नहीं है।
  • न्यायिक साहस: वास्तविक न्यायिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है कि अदालतें कार्यपालिका के अतिक्रमण को रोकें, भले ही कार्यपालिका राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो या उसने ही न्यायाधीशों की नियुक्ति की हो।
  • वैश्विक उदाहरणों से सीख: भारतीय अदालतें अक्सर अमेरिकी न्यायशास्त्र का उल्लेख करती हैं, इसलिए उन्हें नाइन इन लर्निंग रिसोर्सेज इंक बनाम ट्रम्प (2025) [Nine in Learning Resources Inc. vs. Trump (2025)] में प्रदर्शित संस्थागत स्वतंत्रता का भी अनुकरण करनी चाहिए, ताकि राजनीतिक सुविधा से ऊपर कानून का शासन सुनिश्चित किया जा सके।

निष्कर्ष

न्यायिक स्वतंत्रता अंततः अदालतों के साहस और प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है कि वे संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखें और कार्यपालिका के अतिक्रमण को सीमित करें, ताकि कानून का शासन (Rule of Law) राजनीतिक शक्ति से ऊपर बना रहे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “न्यायिक स्वतंत्रता इसलिए नहीं दी जाती कि न्यायाधीश अपनी इच्छानुसार कार्य करें, बल्कि इसलिए दी जाती है ताकि वे वह कर सकें जो उन्हें करना चाहिए।” हाल के समय में अमेरिका और भारत में हुए न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में कार्यपालिका के अतिक्रमण के विरुद्ध शक्तियों के संवैधानिक संतुलन को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका की चर्चा कीजिए।

 (250 शब्द, 15 अंक)

सर्वोच्च न्यायालय और न्यायिक स्वतंत्रता

Explore UPSC Foundation Batches

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Free Counselling for UPSC Aspirants

Connect with our experts and take the right next step.

Expert Guidance
Personalized Strategy
100% Free

Book Your Free Session

NEED ASSISTANCE?

Request a Callback

Our counsellor will connect with you and help you choose the right course and centre.

  • Expert Guidance
  • Course & Fee Information
  • Quick Callback Support

Request a Callback

Books
UPSC PYQs
UPSC Notes
Current Affairs
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.