भारत में कृषि ऋण माफी (Farm Loan Waivers in India)

भारत में कृषि ऋण माफी (Farm Loan Waivers in India) 12 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में, महाराष्ट्र सरकार ने ₹35,000 करोड़ की ऋण माफी योजना की घोषणा की, जिसका राज्य की ऋण संस्कृति और वित्तीय स्थिति पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है।

कृषि ऋण माफी की पृष्ठभूमि

  • कृषि ऋण लेने का उद्देश्य: किसान फसल की खेती के लिए आवश्यक बीज, उर्वरक और कृषि उपकरण खरीदने हेतु संस्थागत ऋण लेते हैं।
  • कृषि में विद्यमान उच्च जोखिम: कृषि में प्राकृतिक जोखिम (सूखा, बाढ़) और बाजार जोखिम (फसल की कीमतों में गिरावट) होते हैं, जो किसानों की ऋण चुकाने की क्षमता को कम कर सकते हैं।
  • ऋण माफी का कारण: जब फसल की विफलता या कीमतों में गिरावट गंभीर आर्थिक संकट उत्पन्न करती है और किसान ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं।
  • सरकारी हस्तक्षेप: ऐसी स्थिति में सरकार किसानों की ओर से बैंकों को बकाया संस्थागत ऋण का भुगतान करती है।
  • कृषि ऋण माफी का अर्थ: यह एक नीति है जिसमें राज्य किसान के ऋण दायित्व को अपने ऊपर ले लेता है, जिससे किसान ऋण चुकाने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।

महाराष्ट्र की ₹35,000 करोड़ की कृषि ऋण माफी योजना

  • कुल आवंटन: ₹35,000 करोड़ की योजना को दो भागों में विभाजित किया गया है ताकि कृषि संकट को कम किया जा सके और ऋण अनुशासन को बढ़ावा दिया जा सके।
  • ऋण चुकाने में असमर्थ किसानों के लिए सहायता (₹20,000 करोड़): जो किसान कृषि संकट के कारण ऋण चुकाने में असमर्थ हैं, उन्हें पूर्ण ऋण माफी प्रदान की जाएगी।
    • यह उन किसानों पर केंद्रित है जो गंभीर और प्रमाणित कृषि संकट का सामना कर रहे हैं।
  • समय पर ऋण चुकाने वाले किसानों के लिए प्रोत्साहन (₹15,000 करोड़): जिन्होंने समय पर ऋण चुकाया उन्हें प्रति किसान ₹50,000 का प्रोत्साहन दिया जाएगा।
    • यह योजना समय पर ऋण चुकाने को पुरस्कृत करने का प्रयास करती है, जो पहले की अधिकांश कृषि ऋण माफी योजनाओं में दुर्लभ विशेषता थी।

भारत में राष्ट्रीय कृषि ऋण माफी का इतिहास

  • ARDRS, 1990 (कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना): यह योजना 15 मई 1990 को शुरू की गई थी और इसके तहत 2 अक्टूबर 1989 तक के बकाया ऋण को शामिल किया गया था।
    • कवरेज: यह योजना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) पर लागू होती थी, जिसमें प्रति किसान अधिकतम ₹10,000 की माफी प्रदान की गई थी, और भूमि के आकार के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया था।
    • वित्तीय पैमाना: आज की कीमतों के अनुसार इसकी लागत लगभग ₹50,600 करोड़ आंकी जाती है।
  • ADWDRS, 2008 (कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना): यह एक विस्तृत कार्यक्रम था, जो वाणिज्यिक बैंकों और सहकारी बैंकों को भी शामिल करता था।
    • लक्षित समूह: मुख्य रूप से 5 एकड़ तक की भूमि रखने वाले छोटे और सीमांत किसानों पर केंद्रित।
    • वित्तीय पैमाना: वर्त्तमान समय के अनुसार इसकी लागत लगभग ₹81,200 करोड़ आंकी जाती है।
  • चुनावी संदर्भ: भारत में बड़ी कृषि ऋण माफियाँ अक्सर चुनावी चक्रों के साथ मेल खाती हैं, जैसे कि वर्ष 1991 के आम चुनाव से पहले 1990 की माफी और वर्ष 2009 के चुनाव से पहले 2008 की माफी।
  • SBI अनुसंधान के निष्कर्ष
    • सीमित कवरेज: वर्ष 2014 और मार्च 2022 के बीच, केवल लगभग 50% योग्य किसानों को ही वास्तव में माफी का लाभ प्राप्त हुआ।
    • कार्यान्वयन में कमी: प्रशासनिक देरी और अक्षमताओं के कारण कई लक्षित लाभार्थी योजना से बाहर रह गए।
    • समग्र आकलन: कृषि ऋण माफी अस्थायी राहत प्रदान करती है, लेकिन यह कृषि संकट का स्थायी समाधान नहीं है।

वर्ष 2014 के बाद राज्य स्तर पर ऋण माफी में वृद्धि

  • राज्यों की ओर झुकाव: वर्ष 2014 के बाद, केंद्र सरकार ने देशव्यापी कृषि ऋण माफियाँ अधिकांशतः बंद कर दीं, जबकि कई राज्यों ने अपनी स्वयं की योजनाएँ शुरू कीं।
  • ऋण माफी लागू करने वाले राज्य: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, और छत्तीसगढ़ ने ऋण माफी कार्यक्रम शुरू किए।
  • कुल पैमाना: राज्य स्तर की ऋण माफी योजनाओं का कुल आकार लगभग ₹2.4 लाख करोड़ है, जो पहले की राष्ट्रीय योजनाओं से भी अधिक है।
  • RBI कार्य समूह का निष्कर्ष: राज्यों में घोषित 10 में से लगभग 8 ऋण माफी योजनाएँ चुनाव परिणामों के 90 दिनों के भीतर घोषित की गईं।
    • यह पैटर्न दर्शाता है कि कृषि ऋण माफियाँ लंबे समय तक चलने वाले कृषि नीति उपकरणों की बजाय चुनावी साधनों के रूप में अधिक कार्य करती हैं।

राज्य बजट पर कृषि ऋण माफी का वित्तीय प्रभाव

  • GSDP का अर्थ: सकल राज्य घरेलू उत्पाद (Gross State Domestic Product) किसी राज्य की कुल आर्थिक उत्पादन क्षमता को दर्शाता है।
  • दीर्घकालिक वित्तीय बोझ: ऋण माफी का भुगतान सामान्यतः 3–5 वर्षों में बैंकों को किया जाता है, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव पड़ता है।
  • GSDP के प्रतिशत के रूप में लागत:
    • आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु: लगभग 0.1% GSDP
    • छत्तीसगढ़: GSDP का लगभग 1.8%, जो मध्यम वित्तीय दबाव को दर्शाता है।
    • मध्य प्रदेश: GSDP का 4.5% तक, जो राज्यों में सबसे गंभीर वित्तीय बोझों में से एक को दर्शाता है।
  • बजटीय प्रभाव: 
    • राजकोषीय विचलन (Fiscal Slippage): कृषि ऋण माफियाँ राजकोषीय विचलन में योगदान करती हैं, जिससे राजस्व व्यय में लगभग 13 आधार अंक की वृद्धि होती है, जिसमें से केवल माफियों के कारण 5 आधार अंक बढ़ते हैं।
    • क्राउडिंग-आउट प्रभाव: ऋण माफी पर बढ़ते खर्च से सिंचाई, ग्रामीण सड़क निर्माण और उत्पादक कृषि निवेश के लिए उपलब्ध धन कम हो सकता है।

कृषि ऋण माफी में विद्यमान नैतिक जोखिम (Moral Hazard)

  • क्रेडिट व्यवहार में विद्यमान नैतिक जोखिम: यदि किसानों को भविष्य में ऋण माफी की उम्मीद हो, तो कुछ किसान रणनीतिक रूप से ऋण चुकाने में देरी या भुगतान बंद कर सकते हैं।
  • ऋण अनुशासन का क्षरण: यदि ऋण चूक करने वाले किसानों को माफी मिलती है जबकि नियमित भुगतान करने वालों को कोई तुलनीय लाभ नहीं मिलता, तो जिम्मेदार ऋण चुकाने के व्यवहार में विश्वास कम हो जाता है।
  • ग्रामीण ऋण संस्कृति पर प्रभाव: समय के साथ, रणनीतिक डिफॉल्ट (Strategic Defaults) ग्रामीण बैंकिंग प्रणाली में ऋण संस्कृति को कमजोर कर देते हैं।

कृषि ऋण माफियों का गैर-निष्पादित संपत्तियों (NPAs) पर प्रभाव

  • कृषि क्षेत्र में बढ़ते NPA: कृषि क्षेत्र की गैर-निष्पादित संपत्तियाँ (NPAs) मार्च 2019 तक लगभग 8.44% तक बढ़ गईं, जो लगातार ऋण माफी चक्रों के साथ सहसंबंध को दर्शाती हैं।
  • ऋण माफी वाले राज्यों में अधिक NPA: जो राज्य ऋण माफी घोषित करते हैं वहाँ बाद के वर्षों में NPA अधिक दर्ज किए जाते हैं।
  • बैंक ऋण में कमी: बढ़ती डिफॉल्ट दरों के कारण बैंक नए ऋण देने में अधिक सतर्क हो जाते हैं, जिससे नए या वास्तविक उधारकर्ताओं के लिए क्रेडिट तक पहुँच सीमित हो जाती है।

कृषि ऋण माफी पर विशेषज्ञों के विचार (पूर्व RBI गवर्नर)

  • रघुराम राजन: कृषि ऋण माफी अक्सर सबसे गरीब और सबसे अधिक संकटग्रस्त किसानों तक नहीं पहुँच पाती।
    • इसका लाभ प्रायः उन किसानों को अधिक मिलता है जो अपेक्षाकृत बेहतर रूप से जुड़े होते हैं और जिनकी राजनीतिक पहुँच होती है, बजाय सबसे कमजोर किसानों के।
  • उर्जित पटेल: ऋण माफी ग्रामीण भारत में ईमानदार ऋण चुकाने की संस्कृति को कमजोर करती है।
    • यह रणनीतिक डिफॉल्ट (जानबूझकर ऋण न चुकाना) को प्रोत्साहित करती है, क्योंकि उधारकर्ता भविष्य में ऋण माफी की उम्मीद करने लगते हैं।

सुझाया गया वैकल्पिक मॉडल – PM-KISAN मॉडल

  • प्रत्यक्ष आय अंतरण: ऋण माफी पर खर्च होने वाले धन को DBT (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खातों में भेजा जा सकता है। इससे बिचौलियों और देरी की समस्या कम होगी।
    • PM-KISAN मॉडल सार्वभौमिक, पारदर्शी और प्रत्यक्ष भुगतान प्रदान करता है, जिसे बड़े पैमाने पर प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
    • किसान आय सहायता प्राप्त करते हैं, बिना ग्रामीण ऋण प्रणालियों में ऋण चुकाने की संस्कृति को कमजोर किए।
  • दीर्घकालिक दृष्टिकोण: नीति का ध्यान बार-बार होने वाले ऋण राहत चक्रों के बजाय कृषि की लाभप्रदता और उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में होना चाहिए।

निष्कर्ष

कृषि ऋण माफियाँ केवल अल्पकालिक राहत प्रदान करती हैं। कृषि संकट का समाधान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आय समर्थन और संरचनात्मक कृषि सुधारों के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाना आवश्यक है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत में कृषि संकट से निपटने के लिए कृषि ऋण माफी का अक्सर एक नीतिगत उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है। हालाँकि, इससे राजकोषीय स्थिरता (fiscal sustainability) और क्रेडिट अनुशासन (credit Discipline) को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं। किसानों की समस्या के समाधान में कृषि ऋण माफी की प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए तथा सतत कृषि आय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक नीतिगत उपाय सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द) 

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