जनजातीय आरक्षण लाभ तथा अनुसूचित जनजातियों की डिलिस्टिंग

जनजातीय आरक्षण लाभ तथा अनुसूचित जनजातियों की डिलिस्टिंग 1 Jun 2026

संदर्भ:

25 मई, 2026 को लगभग 500 जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में एकत्रित होकर संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन की माँग की।

  • उनकी मुख्य माँग यह थी, कि जो व्यक्ति अपनी जनजातीय आस्था परंपराओं को छोड़कर दूसरे धर्म में परिवर्तित हो जाते हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा और उससे जुड़े आरक्षण लाभ नहीं प्राप्त होने चाहिए।
  • यह मुद्दा सकारात्मक कार्रवाई (अफरमेटिव एक्शन), धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान और आरक्षण लाभों के न्यायसंगत वितरण के संबंधों पर प्रश्न उठाता है।

प्रमुख अवधारणाएँ

  • सूची से बाहर करना (डिलिस्टिंग): किसी व्यक्ति या समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से हटाने की प्रक्रिया, जिसके परिणामस्वरूप ST दर्जे से जुड़े संवैधानिक लाभ तथा आरक्षण अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
  • अनुच्छेद 342: अनुच्छेद 342 भारत के राष्ट्रपति को एक सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों को निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है, जबकि संसद के पास अधिसूचित सूची में समुदायों को शामिल या बाहर करने का अधिकार सुरक्षित रहता है।
  • संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950: स्वतंत्रता पश्चात कार्यरत इस राष्ट्रपति आदेश ने भारत में अनुसूचित जनजातियों की पहली आधिकारिक सूची प्रदान की, जो ST पहचान का संवैधानिक आधार है।
  • अल्पसंख्यक कल्याणकारी योजनाएँ: ये धार्मिक अल्पसंख्यकों जैसे- मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन तथा पारसियों के शैक्षिक, आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिए क्रियान्वित सरकारी कार्यक्रम हैं।

माँग के मुख्य कारण

  • दुहरे लाभ” की धारणा: कई जनजातीय समूहों का तर्क है, कि जो व्यक्ति दूसरे धर्मों में परिवर्तित हो जाते हैं वे अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण लाभों को लेना जारी रखते हैं, एवं साथ ही अल्पसंख्यक कल्याणकारी योजनाओं के लिए भी पात्र बने रहते हैं, जिससे सीमित आरक्षण अवसरों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है।
  • न्यायसंगत वितरण संबंधी चिंताएँ: पारंपरिक जनजातीय समुदायों का तर्क है, कि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े जनजातियों के लिए अभिप्रेत आरक्षण लाभ तेजी से परिवर्तित आदिवासियों के मध्य केंद्रित हो रहे हैं, जिससे उन लोगों की पहुँच कम हो रही है जो जनजातीय रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करना जारी रखते हैं।
  • ऐतिहासिक साक्ष्य
    • कार्तिक उराँव रिपोर्ट (1960 का दशक): जनजातीय नेता और सांसद कार्तिक उराँव ने रेखांकित किया, कि यद्यपि परिवर्तित आदिवासी ST आबादी का केवल एक छोटा हिस्सा थे, कथित तौर पर उन्होंने आरक्षण लाभों का एक असमान रूप से बड़ा हिस्सा सुरक्षित कर लिया, जिससे सकारात्मक कार्रवाई की प्रभावशीलता पर चिंताएँ बढ़ गईं।
    • समसामयिक प्रासंगिकता: डिलिस्टिंग के समर्थकों का तर्क है, कि समय के साथ धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों का अनुपात बढ़ा है, जिससे आज लाभ वितरण तथा प्रतिनिधित्व संबंधी मुद्दा अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है।
  • संवैधानिक विसंगति
    • अनुसूचित जातियों (SCs) की स्थिति: संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 ने शुरुआत में SC दर्जे को हिंदुओं तक सीमित कर दिया था और बाद में इसे बौद्धों तथा सिखों तक विस्तारित किया गया। ईसाई या इस्लाम धर्म में परिवर्तन के परिणामस्वरूप आमतौर पर SC का दर्जा समाप्त हो जाता है।
    • अनुसूचित जनजातियों (STs) की स्थिति: संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में धर्म-आधारित कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। फलस्वरूप, कोई व्यक्ति धार्मिक परिवर्तन के बाद भी ST का दर्जा बनाए रख सकता है।
    • विद्यमान अंतर: SC और ST के बीच व्यवहार में इस अंतर को अक्सर एक संवैधानिक विसंगति के रूप में वर्णित किया जाता है, तथा यह विधिक सुधार की माँगों का आधार बनता है।

अनुसूचित जनजाति : परिभाषा

  • लोकुर समिति (1965) के मानदंड: समिति ने जनजातीय पहचान के लिए 5 व्यापक संकेतकों की पहचान की:
    • आदिम लक्षण (Primitive Traits) – पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं की उपस्थिति।
    • विशिष्ट संस्कृति – अद्वितीय रीति-रिवाज, भाषा, विश्वास और परंपराएँ।
    • भौगोलिक अलगाव – दूरदराज या अलग-थलग क्षेत्रों में निवास।
    • संपर्क की कमी – मुख्यधारा के समाज के साथ सीमित संपर्क।
    • पिछड़ापन – सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा होना।

न्यायिक स्थिति

  • SC दर्जे पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण: न्यायालय ने यह माना है, कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्मों में परिवर्तन के परिणामस्वरूप अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है, क्योंकि जाति-आधारित अक्षमताएँ ऐतिहासिक रूप से उन आस्था परंपराओं से जुड़ी हुई हैं।
  • ST दर्जे पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण (2004): न्यायालय ने यह टिप्पणी की, कि केवल धार्मिक परिवर्तन से ही अनुसूचित जनजाति का दर्जा स्वचालित रूप से समाप्त नहीं हो जाता है। मुख्य विचार यह है कि क्या वह व्यक्ति जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना जारी रखता है।
  • व्यावहारिक चुनौती: यह निर्धारित करना, कि एक परिवर्तित व्यक्ति किस सीमा तक जनजातीय प्रथाओं का पालन करता है, एक जटिल और व्यक्तिपरक अभ्यास बना हुआ है, जिससे विधिक और नीतिगत चर्चाएँ जारी हैं।

डिलिस्टिंग के पक्ष में तर्क

  • पारंपरिक जनजातीय समुदायों तक आरक्षण के लाभों को सुनिश्चित करके लाभों के संकेंद्रण को रोकता है।
  • जनजातीय सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करता है, तथा स्वदेशी रीति-रिवाजों और प्रथाओं को संरक्षित करता है।
  • ST आरक्षण और अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं तक एक साथ पहुँच से उत्पन्न होने वाले दुहरे लाभों को कम करता है।
  • सबसे वंचित समूहों को लाभ निर्देशित करके लक्षित सकारात्मक कार्रवाई को सुदृढ़ करता है।

डिलिस्टिंग के विपक्ष में तर्क

  • धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाले अनुच्छेद 25 का उल्लंघन कर सकता है।
  • जनजातीय पहचान मुख्य रूप से जातीय तथा सांस्कृतिक है, विशुद्ध रूप से धार्मिक नहीं।
  • धर्म परिवर्तन से आवश्यक रूप से वह नुकसान दूर नहीं होता, जिसका सामना जनजातीय समुदाय करते हैं।
  • परिवर्तित जनजातीय आबादी के खिलाफ बहिष्करण और भेदभाव का जोखिम।

संवैधानिक आयाम

  • अनुच्छेद 25 – धार्मिक स्वतंत्रता: व्यक्तियों को स्वतंत्र रूप से धर्म मानने, आचरण और उसका प्रचार करने के अधिकार की गारंटी देता है।
  • अनुच्छेद 29 – सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार: विभिन्न समुदायों की विशिष्ट संस्कृति, भाषा और विरासत की रक्षा करता है।
  • अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जनजातियों का संरक्षण: राज्य को अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक तथा आर्थिक हितों को बढ़ावा देने और उन्हें शोषण से बचाने का निर्देश देता है।
  • अनुच्छेद 342 – अनुसूचित जनजातियों की पहचान: राष्ट्रपति को अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करने का अधिकार देता है, जबकि संसद के पास अधिसूचित सूची में संशोधन करने का अधिकार सुरक्षित रहता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. धार्मिक संबद्धता से संबंधित “संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950” में अस्पष्टता ने वर्तमान में जटिल सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों को जन्म दिया है। न्यायिक घोषणाओं और संवैधानिक प्रावधानों के आलोक में परिवर्तित आदिवासियों को ‘सूची से बाहर करने’ (डीलिस्टिंग) की माँग पर चर्चा कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

जनजातीय आरक्षण लाभ तथा अनुसूचित जनजातियों की डिलिस्टिंग

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.