भारत में सिविल सेवा सुधार

भारत में सिविल सेवा सुधार 30 Mar 2026

संदर्भ:

भारत की सिविल सेवाएँ लोकतांत्रिक शासन के केंद्र में बनी हुई हैं, फिर भी राजनीतिक हस्तक्षेप, सीमित विशेषज्ञता तथा भ्रष्टाचार पर बढ़ती चिंताओं ने प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता को तीव्र कर दिया है।

ऐतिहासिक संदर्भ और स्वतंत्रता के बाद का विकास:

  • उत्पत्ति: वर्तमान सिविल सेवा प्रणाली ब्रिटिश काल की ‘इंपीरियल सिविल सर्विस’ (ICS) से विकसित हुई है।
  • स्वतंत्रता के बाद निरंतरता: स्वतंत्रता के बाद, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने सरकारी नीतियों को लागू करने तथा प्रमुख प्रशासनिक एवं अर्द्ध-न्यायिक कार्यों को करने के लिए प्रशासनिक ढाँचे को बनाए रखने का निर्णय लिया, तथा इसका नाम बदलकर ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ (IAS) कर दिया।
  • भारत का ‘स्टील फ्रेम’: सरदार वल्लभभाई पटेल ने सिविल सेवाओं को “भारत का स्टील फ्रेम” बताया था, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि जहाँ राजनीतिक नेतृत्व समय-समय पर बदलता रहता है, वहीं स्थायी नौकरशाही शासन में संस्थागत निरंतरता एवं स्थिरता सुनिश्चित करती है।

संवैधानिक प्रावधान:

  • अनुच्छेद 312: संसद को राष्ट्रीय हित में नई अखिल भारतीय सेवाएँ बनाने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 310 (प्रसाद का सिद्धांत): सिविल सेवक राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं तथा उन्हें सरकार द्वारा हटाया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 311 (सुरक्षा उपाय): यह औपचारिक जाँच और अधिकारी को सुने जाने का अवसर प्रदान करके मनमानी बर्खास्तगी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है।

प्रशासनिक संरचना:

  • सेवा संरचना: भारत में 36 संगठित सेवाएँ हैं, जिनमें अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS, IPS, IFoS), केंद्रीय सिविल सेवाएँ (जैसे- IRS, IFS, IRTS) सहित सैन्य सेवाएँ शामिल हैं।
  • भर्ती तंत्र: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा (CSE) के माध्यम से 28 सेवाओं में अधिकारियों की भर्ती की जाती है।

आचरण और सेवा नियम:

  • अखिल भारतीय सेवा नियम: अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 द्वारा शासित।
  • केंद्रीय सेवा नियम: केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 द्वारा शासित।

परीक्षा और भर्ती संबंधी चुनौतियां:

  • रटने की प्रवृत्ति: परीक्षा पैटर्न अक्सर व्यावहारिक शासन कौशल, विश्लेषणात्मक क्षमता और वास्तविक जीवन के निर्णय लेने के मूल्यांकन की बजाय तथ्यों को याद रखने को पुरस्कृत करता है।
  • उच्च प्रवेश आयु: लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में प्रवेश करने वाले उम्मीदवारों की औसत आयु लगभग 28 वर्ष है, जिसका अर्थ है कि कई अभ्यर्थी सेवा में प्रवेश करने से पहले तैयारी चक्र में अपने जीवन के 6-7 महत्त्वपूर्ण वर्ष बिता देते हैं।
  • लंबी भर्ती प्रक्रिया: सिविल सेवा परीक्षा चक्र अधिसूचना से ज्वाइनिंग तक लगभग 18 महीने लेता है, जिससे सरकारी विभागों में महत्त्वपूर्ण रिक्तियों के बावजूद भर्ती धीमी हो जाती है।
  • प्रमुख दक्षताओं का सीमित मूल्यांकन: वर्तमान प्रणाली भावनात्मक बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता, नागरिकों के प्रति सहानुभूति और संकट प्रबंधन क्षमता का अपर्याप्त मूल्यांकन करती है, जो प्रभावी लोक प्रशासन के लिए आवश्यक हैं।

मानव संसाधन और प्रतिभा की बर्बादी:

  • अत्यधिक कम चयन अनुपात: लगभग 10 लाख आवेदकों में से केवल 1,000 चयन होने के कारण, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी “सब-कुछ-या-कुछ-नहीं” प्रणाली उन अभ्यर्थियों के बीच तीव्र तनाव, चिंता और मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करती है जिनका चयन नहीं होता है।
  • सेवा असंतोष: केवल लगभग 30% उम्मीदवार ही अपनी आवंटित सेवा से संतुष्ट होते हैं, जबकि कई अन्य पसंदीदा सेवाओं को सुरक्षित करने के लिए फिर से परीक्षा देते हैं, जिससे नए प्रवेशकों के अवसर सीमित हो जाते हैं।
  • प्रशासनिक जड़ता: अपनी सेवा आवंटन से असंतुष्ट अधिकारी अक्सर पुनः परीक्षा की तैयारी जारी रखते हैं, जिससे प्रेरणा कम हो सकती है और उनकी वर्तमान प्रशासनिक जिम्मेदारियों में प्रभावी योगदान सीमित हो सकता है।

प्रस्तावित परीक्षा और भर्ती सुधार:

  • स्थितिजन्य निर्णय परीक्षण: ऐसे मूल्यांकन प्रस्तुत करना, जो यह आकलन करते हैं कि उम्मीदवार वास्तविक प्रशासनिक परिदृश्यों (जैसे- सीमित संसाधनों के साथ कानून-व्यवस्था की स्थिति का प्रबंधन) पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं।
  • द्वि-स्तरीय परीक्षा प्रणाली: एक सामान्य परीक्षा चरण के बाद सेवा-विशिष्ट प्रश्नपत्रों (जैसे- IRS या विदेश सेवा के लिए अलग विशेष प्रश्नपत्र) वाला मॉडल अपनाना, ताकि उम्मीदवारों को उनके कौशल और रुचि के अनुरूप सेवा प्राप्त हो सके।
  • अनिवार्य कार्य अनुभव: न्यायपालिका के समान, सिविल सेवा में प्रवेश से पूर्व व्यावहारिक अनुभव सुनिश्चित करने के लिए 2-3 वर्ष के पूर्व पेशेवर अनुभव की आवश्यकता।
  • परीक्षा चरणों के लिए प्रमाणन: प्रारम्भिक या मुख्य परीक्षा पास करने के लिए औपचारिक प्रमाण पत्र प्रदान करना, जिससे असफल उम्मीदवार निजी क्षेत्र के जॉब मार्केट में अपनी उपलब्धियों का लाभ उठा सकें।
  • तकनीक का उपयोग: भर्ती प्रक्रियाओं में तेजी लाने और ऑनबोर्डिंग में देरी को कम करने के लिए, दस्तावेज़ सत्यापन हेतु ब्लॉकचेन-आधारित प्रणालियों का उपयोग करना।

सांस्कृतिक और संरचनात्मक सुधार:

  • सिविल सेवाओं का वि-औपनिवेशीकरण: प्रस्तावों में भारतीय प्रशासनिक सेवा का नाम बदलकर ‘भारतीय सार्वजनिक सेवा’ करने और सदस्यों को औपनिवेशिक अधिकार-उन्मुख मानसिकता से नागरिक-सेवा उन्मुखीकरण की ओर ले जाने के लिए “ऑफिसर” की बजाय “सेवक” कहने का सुझाव दिया गया है।
  • सेवाओं का सरलीकरण: विखंडन को कम करने के लिए ओवरलैपिंग सेवाओं को युक्तिसंगत बनाना और उनका विलय करना, जैसे कि आठ रेलवे सेवाओं का ‘भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा’ (IRMS) में विलय।
  • पार्श्व प्रवेश का विस्तार: विशिष्ट नीति-निर्माण और प्रशासनिक क्षमता को मजबूत करने के लिए निजी क्षेत्र और शिक्षा जगत के विषय विशेषज्ञों को शामिल करना।

प्रशिक्षण और निरंतर क्षमता निर्माण:

  • प्रशिक्षण-फील्ड अंतराल को कम करना: LBSNAA में प्रशिक्षण में वास्तविक प्रशासनिक संकटों का उपयोग करते हुए केस-आधारित शिक्षण को शामिल करना चाहिए, ताकि क्लासरूम प्रशिक्षण को फील्ड की वास्तविकताओं से बेहतर तरीके से जोड़ा जा सके।
  • सिंगापुर मॉडल से सीखना: सिविल सेवकों को नई प्रबंधन प्रथाओं और तकनीकी कौशल से परिचित कराने के लिए 2-3 वर्षों के लिए निजी क्षेत्र में संरचित प्रतिनियुक्ति शुरू करना।
  • आजीवन सीखने को संस्थागत बनाना: ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म, सेवानिवृत्त अधिकारियों से परामर्श और डेटा एनालिटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और GIS मैपिंग जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षण के माध्यम से निरंतर व्यावसायिक विकास को बढ़ावा देना।

पोस्टिंग, कार्यकाल और योग्यता (Meritocracy):

  • कार्यकाल की सुरक्षा: बार-बार होने वाले तबादले प्रशासनिक निरंतरता को सीमित करते हैं।
    • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने और नीति कार्यान्वयन में सुधार के लिए, न्यूनतम दो वर्षों के कार्यकाल की सिफारिश की थी।
  • क्षेत्रीय अनुभव की आवश्यकता: वरिष्ठ नीति-निर्माण भूमिकाओं में जाने से पूर्व अधिकारियों को जमीनी स्तर की प्रशासनिक समझ मजबूत करने के लिए कम-से-कम 9 वर्षों की क्षेत्र-स्तरीय पोस्टिंग (ब्लॉक या सब-डिवीजन स्तर) पूरी करनी चाहिए।
  • कौशल-आधारित भूमिका आवंटन: पोस्टिंग अधिकारियों की विशेषज्ञता और प्रशिक्षण के अनुरूप होनी चाहिए (उदाहरण के लिए, वित्तीय विशेषज्ञता वाले अधिकारियों को आर्थिक या वित्त संबंधी विभागों में नियुक्त करना)।
  • योग्यता-आधारित स्थानांतरण: स्थानांतरण और पोस्टिंग राजनीतिक विचारों की बजाय प्रदर्शन तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।

निष्कर्ष

आधुनिक शासन मांगों को पूर्ण करने में सक्षम एक पेशेवर, योग्यता-आधारित और नागरिक-उन्मुख नौकरशाही सुनिश्चित करने के लिए व्यापक सिविल सेवा सुधार अनिवार्य हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. भारत में सिविल सेवाओं की मुख्य समस्याएँ क्या हैं? सिविल सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के उपाय सुझाइएँ।

(10 अंक, 150 शब्द)

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