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भारत का उत्तर-दक्षिण विभाजन तथा परिसीमन संकट

भारत का उत्तर-दक्षिण विभाजन तथा परिसीमन संकट 30 Mar 2026

संदर्भ:

आगामी जनगणना और परिसीमन ने दक्षिण भारतीय राज्यों तथा हिंदी भाषी क्षेत्रों के बीच बढ़ते आर्थिक अंतर के साथ-साथ, जनसंख्या वृद्धि में अंतर पर विवाद को पुनः जीवित कर दिया है।

सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ:

  • विभिन्न विकास संकेतक: तमिलनाडु और केरल में स्वास्थ्य तथा शिक्षा परिणाम बिहार और उत्तर प्रदेश की तुलना में अत्यंत बेहतर हैं।
  • आय अंतराल: तमिलनाडु में प्रति व्यक्ति आय बिहार की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है, जो व्यापक क्षेत्रीय असमानता को दर्शाती है।

परिसीमन संकट:

  • जनसंख्या स्थिरीकरण अंतराल: दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में जनसंख्या में महत्त्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई।
  • संसदीय प्रतिनिधित्व में परिवर्तन: यदि परिसीमन नवीनतम जनगणना पर आधारित होता है, तो उत्तरी राज्यों को सीटें प्राप्त हो सकती हैं जबकि दक्षिणी राज्य अपना प्रतिनिधित्व खो सकते हैं।
    • उदाहरण: तमिलनाडु की सीटें 39 से घटकर 28, केरल की 20 से घटकर 13 हो सकती हैं, जबकि बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 52 और उत्तर प्रदेश की 80 से बढ़कर 105 हो सकती हैं।
  • राजकोषीय और राजनीतिक असंतुलन की धारणा: दक्षिणी राज्यों को भय है, कि वे अधिक कर का योगदान दे रहे हैं जबकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व खो रहे हैं, जिससे संघ के भीतर अनुचित व्यवहार की चिंताएँ उत्पन्न हो रही हैं।

राष्ट्रीय एकता के लिए जोखिम:

  • उप-राष्ट्रवाद का उदय: आर्थिक असंतुलन की धारणा क्षेत्रीय पहचान को मजबूत तथा राष्ट्रीय एकजुटता को कमजोर कर सकती हैं।
    • ऐतिहासिक सबक: अमीर और गरीब क्षेत्रों के बीच इसी तरह के तनाव ने सोवियत संघ तथा युगोस्लाविया जैसे राज्यों के पतन में योगदान दिया था।
  • संभावित संस्थागत समाधान: भारत यूरोपीय संसद जैसे मॉडलों का पता लगा सकता है, जहाँ छोटे राज्यों को क्षेत्रीय इक्विटी के साथ जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व को संतुलित करने के लिए अधिक प्रतिनिधित्व भार दिया जाता है।

दक्षिण भारत की आंतरिक चुनौतियाँ:

  • मध्यम आय जाल: दक्षिणी राज्यों में पहले की वृद्धि के बावजूद मध्यम आय स्तर पर आर्थिक स्थिरता का जोखिम है।
  • शहरी-ग्रामीण विभाजन: विकास बंगलूरू और चेन्नई जैसे शहरों में केंद्रित है, जबकि कई ग्रामीण जिले पीछे हैं।
  • निरंतर सामाजिक और शासन संबंधी मुद्दे: जातिगत भेदभाव, भ्रष्टाचार, पर्यावरणीय उल्लंघन और बुनियादी ढाँचगत तनाव, जैसे- यातायात की भीड़, शासन को प्रभावित करना जारी रखते हैं।

क्षेत्रीय विभाजन में कमी:

  • उत्तर में तीव्र आर्थिक विकास: उत्तरी राज्यों में तेजी से विकास के माध्यम से अंतराल में कमी अल्पावधि में कठिन है, क्योंकि आय की बड़ी असमानता को कम करने में दशकों लगेंगे।
  • समायोजन तंत्र के रूप में प्रवसन: उत्तरी से दक्षिणी राज्यों में श्रम प्रवासन बढ़ रहा है, लेकिन यह अक्सर स्थानीय आबादी और प्रवासी श्रमिकों के बीच तनाव का कारण बनता है।
  • दक्षिण-नेतृत्व वाला राष्ट्रीय विकास: एक अधिक सतत मार्ग दक्षिणी राज्यों में तेजी से विकास है, जो राष्ट्रीय आर्थिक विस्तार को गति दे सकता है, बशर्ते वे अपनी स्वयं की संस्थागत और शासन संबंधी चुनौतियों का समाधान करें।

निष्कर्ष

भारत में सहकारी संघवाद और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए, क्षेत्रीय इक्विटी और समावेशी आर्थिक विकास के साथ जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व को संतुलित करना आवश्यक होगा।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. भारत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच बढ़ते आर्थिक तथा राजनीतिक असंतुलन में योगदान देने वाले कारकों का परीक्षण कीजिए। संघीय संतुलन के लिए जनसंख्या-आधारित परिसीमन के संभावित निहितार्थ क्या हैं?

(10 अंक, 150 शब्द)

भारत का उत्तर-दक्षिण विभाजन तथा परिसीमन संकट

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