संदर्भ:
भारत में घटती प्रजनन दर (Fertility Rate) और बढ़ती वृद्धजन आबादी को लेकर हाल में यह चर्चा काफी जोर पकड़ लिया है कि इसने जनसंख्या में गिरावट, श्रमबल की कमी और जनसांख्यिकीय असंतुलन संबंधी चिंताओं को पुनर्जीवित कर दिया है। हालाँकि, वास्तविक चुनौती भय-आधारित विमर्श को बढ़ावा देने के बजाय साक्ष्य-आधारित नीतियों के माध्यम से जनसांख्यिकीय संक्रमण का प्रभावी प्रबंधन करना है।
बदलता जनसांख्यिकीय परिदृश्य:
- जनसांख्यिकीय संक्रमण काल : हाल के दौर में भारत ने प्रजनन दर में उल्लेखनीय गिरावट हासिल की है और अब यह स्थिर जनसंख्या की ओर अग्रसर है।
- वृद्ध होती जनसंख्या: आगामी दशकों में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु वर्ग के लोगों की जनसंख्या का अनुपात उल्लेखनीय रूप से बढ़ने का अनुमान है।
- क्षेत्रीय भिन्नता: दक्षिणी राज्यों ने उत्तरी राज्यों की तुलना में पहले ही जनसांख्यिकीय संक्रमण की स्थिति को पूरा कर लिया है, जिससे जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय असमानता की स्थिति उत्पन्न हुई है।
- वैश्विक परिवर्तन: अनेक देशों में जनसंख्या संबंधी चिंताएँ अब अतिजनसंख्या (Overpopulation) के भय से हटकर अल्पजनसंख्या (Underpopulation) की चिंता की ओर स्थानांतरित हो गई हैं।
जनसंख्या संबंधी महत्त्वपूर्ण तथ्य :
- संयुक्त राष्ट्र (UN) : भारत की जनसंख्या लगभग 1.7 अरब (170 करोड़) के स्तर तक पहुँचकर अपने चरम (Peak) स्तर तक पहुँचने और उसके बाद शताब्दी के अंत तक धीरे-धीरे घटने की संभावना है।
- वैकल्पिक अनुमान: कुछ तथ्य जनसंख्या में अधिक और तीव्र गिरावट का संकेत देते हैं, किंतु ये ऐसे अनुमानों पर आधारित हैं जो प्रजनन दर पर उच्च शिक्षा के प्रभाव का आवश्यकता से अधिक आकलन कर सकते हैं।
- प्रजनन संबंधी प्रवृत्तियाँ: उच्च शिक्षित एवं कम शिक्षित महिलाओं के मध्य प्रजनन दर का अंतर लगातार कम होता जा रहा है, जो दीर्घकाल में अधिक स्थिर जनसंख्या वृद्धि-पथ (Population Trajectory) का संकेत देता है।
प्रमुख जनसांख्यिकीय चिंताएँ:
- वृद्धजन आबादी और कार्यबल: वृद्धजन (60 वर्ष एवं उससे अधिक आयु) की जनसंख्या का अनुपात 2021 में 11% से बढ़कर 2051 तक 28% तक होने का अनुमान है।
- हालाँकि, कार्यशील आयु (Working-age) की जनसंख्या में केवल मामूली गिरावट आने की संभावना है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन (Automation) तथा महिला श्रमबल भागीदारी में वृद्धि कार्यबल की संभावित कमी की भरपाई कर सकती है।
- क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असंतुलन: दक्षिणी राज्यों में उत्तरी राज्यों की तुलना में प्रजनन दर कम रही है तथा जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही है।
- भविष्य में जनसंख्या-आधारित परिसीमन (Delimitation) के कारण दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
- जनसांख्यिकीय प्रतिनिधित्व और आर्थिक योगदान के मध्य संतुलन स्थापित करना शासन के समक्ष एक महत्त्वपूर्ण चुनौती होगी।
- धार्मिक जनसांख्यिकी: यद्यपि मुस्लिम समुदाय की प्रजनन दर अभी भी हिंदू समुदाय की तुलना में थोड़ी अधिक है, फिर भी दोनों समुदायों के प्रजनन दर में लगभग समान गिरावट दर्ज की गई है।
- प्रजनन दर का यह अंतर व्यापक रूप से स्थिर बना हुआ है, जिससे बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकीय परिवर्तन की आशंकाएँ काफी हद तक निराधार सिद्ध होती हैं।
भारत की जनसांख्यिकीय शक्तियाँ:
- सुदृढ़ पारिवारिक संस्था: विवाह और परिवार आज भी भारतीय समाज की केंद्रीय और मजबूत सामाजिक संस्थाएँ बने हुए हैं।
- मानव पूँजी में निवेश: छोटे परिवार का आकार बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समग्र विकास पर अधिक निवेश करने में सहायक होता है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश : भारत के पास आज भी विश्व की सबसे बड़ी कार्यशील आयु (Working-age) वर्ग वाली आबादी है, जो आर्थिक विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।
चुनौतियाँ:
- बढ़ती जनसंख्या का भय : बढ़ती जनसंख्या को लेकर लोगों में व्याप्त भय-आधारित कथानक भ्रामक एवं अनुचित सार्वजनिक नीतियों को जन्म दे सकते हैं।
- लैंगिक भेदभाव संबंधी चिंताएँ : जनसंख्या संबंधी मुद्दों में अक्सर महिलाओं के प्रजनन संबंधी निर्णयों पर असंगत एवं अत्यधिक जिम्मेदारी डाल दी जाती है।
- वृद्ध होती समाज व्यवस्था: वृद्धजन की आबादी में वृद्धि के कारण स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन तथा सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता होगी।
- राजनीतिक चुनौतियाँ: जनसंख्या-आधारित संसदीय सीटों के पुनर्वितरण (Redistribution) से क्षेत्रीय असंतोष एवं चिंताएँ बढ़ सकती हैं।
- ऊर्जा एवं उत्पादकता: धीरे-धीरे वृद्ध होती जनसंख्या के मध्य आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए उत्पादकता बढ़ाने वाले संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता होगी।
भारत और जापान: एक जनसांख्यिकीय तुलना
- जापान: निम्न प्रजनन दर का संबंध कठोर लैंगिक मानदंडों, कार्य-जीवन संतुलन की कमी तथा विलंबित विवाह से है। इसके परिणामस्वरूप लगभग 30% महिलाएँ अपने तीसवें दशक (30–39 वर्ष) तक अविवाहित रहती हैं।
- भारत: भारत में विवाह आज भी लगभग सार्वभौमिक सामाजिक संस्था बना हुआ है, जहाँ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार 30 वर्ष की आयु तक 97% तक महिलाएँ विवाहित हो जाती हैं।
- हालाँकि, भारतीय परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा एवं अधिक अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अब छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं।
- शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, उसकी लागत को कम करना तथा कामकाजी माता-पिता को आवश्यक सहयोग प्रदान करना, प्रजनन दर बढ़ाने को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों की तुलना में अधिक प्रभावी उपाय सिद्ध हो सकते हैं।
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आगे की राह :
- साक्ष्य-आधारित जनसंख्या नीतियाँ: भय-आधारित कथानकों से बचते हुए जनसांख्यिकीय आँकड़ों एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर नीतियाँ निर्मित की जानी चाहिए।
- महिला श्रमबल भागीदारी दर में वृद्धि : बाल देखभाल (Childcare) सुविधाओं का विस्तार, कार्यस्थलों को महिलाओं की दृष्टि से सुलभ बनाया जाए तथा महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि किए जाने की आवश्यकता है।
- मानव पूँजी में निवेश : शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार किया जाए तथा उन्हें अधिक सुलभ एवं किफायती बनाए जाने की आवश्यकता है ।
- वृद्धावस्था के लिए तैयारी : पेंशन प्रणाली, जेरियाट्रिक (वृद्धजन) स्वास्थ्य सेवाओं तथा वृद्ध देखभाल अवसंरचना को सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है ।
- प्रौद्योगिकी लाभ : उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन (Automation) तथा कौशल विकास को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।
- संतुलित संघवाद की सुनिश्चितता : परिसीमन (Delimitation) से जुड़ी चिंताओं का समाधान करते हुए सभी क्षेत्रों के न्यायसंगत एवं संतुलित प्रतिनिधित्व की रक्षा की जानी चाहिए ।
निष्कर्ष:
निष्कर्षतः भारत की प्राथमिकता जनसंख्या को बढ़ाना या घटाना नहीं, बल्कि समावेशी विकास, उच्च उत्पादकता, लैंगिक समानता तथा सुदृढ़ मानव पूँजी के माध्यम से जनसांख्यिकीय संक्रमण का प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। संतुलित एवं साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण भारत को जनसांख्यिकीय परिवर्तन को दीर्घकालिक विकास के अवसर में परिवर्तित करने में सक्षम बनाएगा।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: 20वीं शताब्दी में जहाँ जनसंख्या विस्फोट का भय प्रमुख चिंता का विषय था, वहीं 21वीं शताब्दी में भारत के समक्ष जनसांख्यिकीय वृद्धावस्था तथा क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताओं की दोहरी चुनौती उभरकर सामने आई है। इन बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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