संदर्भ
- हाल ही में भारत ने अपने मूल लक्ष्य से पहले ही ई-20 ईंधन (E20 Fuel: 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) का देशव्यापी क्रियान्वयन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इसके साथ ही एथेनॉल मिश्रण देश की ऊर्जा संक्रमण रणनीति का एक प्रमुख घटक बन गया है।
- हालाँकि, इस नीति ने इसकी आर्थिक व्यवहार्यता, पर्यावरणीय स्थिरता, कृषि पर प्रभाव तथा उपभोक्ता कल्याण को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया है, विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में गिरावट के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में।
पृष्ठभूमि
- एथेनॉल एक नवीकरणीय जैव-ईंधन है, जिसका उत्पादन गन्ने के रस, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, मक्का (Maize) तथा अन्य जैव-आधारित कच्चे पदार्थों से किया जाता है।
- राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति, 2018 के अंतर्गत भारत ने 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) प्राप्त करने के लक्ष्य को वर्ष 2030 से घटाकर 2025 कर दिया था, जिसे अब सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया गया है।
- आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने तथा स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण किया जाता है।
एथेनॉल मिश्रण के उद्देश्य
- ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना
- भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है।
- पेट्रोल में एथेनॉल का अधिक मिश्रण आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता को कम करता है तथा ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाता है।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी
- एथेनॉल को स्वच्छ दहन वाला नवीकरणीय ईंधन माना जाता है।
- पेट्रोल में एथेनॉल के मिश्रण से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है तथा यह भारत की जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सहायक है।
- किसानों की आय में वृद्धि
- गन्ना, मक्का तथा क्षतिग्रस्त खाद्यान्न जैसे कृषि-आधारित कच्चे पदार्थों की बढ़ती माँग से किसानों को अतिरिक्त बाज़ार अवसर प्राप्त होने की अपेक्षा है, जिससे उनकी आय बढ़ाने में सहायता मिलेगी।
एथेनॉल मिश्रण के लाभ
- कच्चे तेल के आयात में कमी: आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम होने से भारत के भुगतान संतुलन में सुधार होगा तथा वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति देश की संवेदनशीलता में कमी आएगी।
- नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा: एथेनॉल भारत के स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है तथा सतत विकास को समर्थन प्रदान करता है।
- ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन: एथेनॉल उत्पादन के विस्तार से जैव-ईंधन उद्योग, ग्रामीण रोजगार तथा कृषि मूल्य श्रृंखलाओं के विकास के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
- जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोग: जीवाश्म ईंधनों की खपत में कमी से पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
प्रमुख चिंता एवं चुनौतियाँ
आर्थिक चुनौति
1. एथेनॉल मिश्रित ईंधन महँगा पड़ सकता है
- जब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से कम रहती है, तब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में अधिक महँगा हो सकता है।
- ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं को वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
2. किसानों तक लाभ पूरी तरह नहीं पहुँचता
- यह नीति इस धारणा पर आधारित है कि एथेनॉल की बढ़ती माँग से किसानों की आय में वृद्धि होगी।
- किंतु आर्थिक लाभ का एक बड़ा हिस्सा चीनी मिलों (Sugar Mills) और एथेनॉल आसवन संयंत्रों को प्राप्त होता है, जबकि किसानों को सामान्यतः केवल सीमित और अतिरिक्त लाभ ही मिल पाता है।
तकनीकी संबंधी चुनौतियाँ
पुराने वाहनों के साथ अनुकूलता की समस्या
- ई-20 (E20) अनुकूल इंजनों के आने से पहले निर्मित अनेक वाहनों में इंजन का घिसाव, इन पुराने वाहनों की पुर्जों को नुकसान तथा ईंधन दक्षता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- यद्यपि इन चिंताओं की पुष्टि के लिए अभी और वैज्ञानिक अध्ययन एवं सत्यापन की आवश्यकता है, फिर भी उपभोक्ताओं द्वारा इस प्रकार की समस्याओं की व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई है।
कृषि एवं पर्यावरणीय चुनौतियाँ
- अत्यधिक जल खपत
- एथेनॉल उत्पादन के लिए प्रमुख कच्चे पदार्थ के रूप में प्रयुक्त गन्ना अत्यधिक जल-गहन फसल है।
- गन्ने की खेती के विस्तार से भारत के पहले से ही दबावग्रस्त भूजल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- अस्थिर फसल प्रतिरूप को बढ़ावा
- एथेनॉल नीति सूखा-प्रवण क्षेत्रों में भी अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करती है, जिससे क्षेत्रीय जल संकट और गंभीर हो सकता है।
- मृदा क्षरण
- गन्ने की निरंतर खेती से एकल फसल प्रणाली को बढ़ावा मिलता है, उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग होता है तथा धीरे-धीरे मृदा उर्वरता में गिरावट आती है।
खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
- खाद्य बनाम ईंधन की दुविधा
- ऐसे देश में, जहाँ खाद्य असुरक्षा और कुपोषण अब भी विद्यमान हैं, खाद्य फसलों को ईंधन उत्पादन की ओर मोड़ना नैतिक एवं विकासात्मक चिंताएँ उत्पन्न करता है।
- जैव-ईंधन के उत्पादन के लिए खाद्य योग्य कृषि उपज का उपयोग दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
कृषि आय संबंधी चिंताएँ
- केवल एथेनॉल से किसानों की आय दोगुनी नहीं हो सकती
- किसानों की कम आय के प्रमुख कारणों में कटाई के बाद होने वाली हानि, सीमित बाज़ार पहुँच तथा मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री शामिल हैं।
- एथेनॉल मिश्रण की नीति भारतीय कृषि को प्रभावित करने वाली इन संरचनात्मक समस्याओं का प्रत्यक्ष समाधान नहीं करती।
सुझाए गए सुधार
1. द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल को बढ़ावा दिया जाए
- द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल के उत्पादन पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए, जो गैर-खाद्य जैव-अपशिष्ट (Non-food Biomass) से निर्मित होता है, जैसे—
- फसल अवशेष
- धान का पुआल
- गेहूँ का भूसा
- मूंगफली के छिलके
- यह दृष्टिकोण “खाद्य बनाम ईंधन” के संघर्ष को कम करने के साथ-साथ पराली जलाने एवं वायु प्रदूषण की समस्या के समाधान में भी सहायक होगा।
2. अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाया जाए
- सरकार को अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास तथा पूंजीगत सब्सिडी को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि वर्तमान में महँगे 2G एथेनॉल के उत्पादन की लागत कम की जा सके।
3. संसाधन-कुशल कच्चे पदार्थों को अपनाया जाए
- एथेनॉल उत्पादन को धीरे-धीरे कम जल-गहन फसलों तथा कृषि अवशेषों की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जिससे संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा मिले।
4. कृषि की संरचनात्मक समस्याओं का समाधान किया जाए
सरकारी हस्तक्षेप निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित होना चाहिए—
- कटाई के बाद होने वाली हानि में कमी
- बाज़ार तक पहुँच में सुधार
- कृषि आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ बनाना
- किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करना
- ये सुधार केवल एथेनॉल की मांग पर निर्भर रहने की तुलना में किसानों की आय बढ़ाने में अधिक प्रभावी सिद्ध होंगे।
5. एक सरल एथेनॉल मिश्रण नीति के अपनाए जाने की आवश्यकता है
- एथेनॉल मिश्रण के अनुपात की समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, घरेलू कच्चे माल की उपलब्धता तथा उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए समीक्षा की जानी चाहिए।
- ऐसी नीति से ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक दक्षता तथा उपभोक्ता कल्याण के मध्य संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।
निष्कर्ष
निष्कर्षस्वरूप एथेनॉल मिश्रण भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने तथा नवीकरणीय ईंधनों को बढ़ावा देने की रणनीति के एक प्रमुख सात्मभ के रूप में है। हालाँकि, इस कार्यक्रम की दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि आर्थिक दक्षता, उपभोक्ताओं के हित, जल संरक्षण तथा खाद्य सुरक्षा के मध्य किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाता है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न :
प्रश्न: जलवायु परिवर्तन के प्रति भारतीय कृषि की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए, जैव-ईंधन उत्पादन की ओर बढ़ते कदमों को खाद्य सुरक्षा तथा जल संसाधन प्रबंधन के साथ संतुलित करना आवश्यक है। समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(10 अंक, 150 शब्द)
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