संदर्भ
आयात पर निर्भरता, सब्सिडी का बढ़ता बोझ और मृदा का क्षरण भारत को जैव उर्वरकों और एक सतत जैव-पथ (बायो-पाथवे) की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
वर्त्तमान संकट और निर्भरता
- भू-राजनैतिक आपूर्ति श्रृंखला संबंधी जोखिम: ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद करने से भारत में LPG और कच्चे तेल का संकट उत्पन्न हुआ है, साथ ही यह उर्वरक आपूर्ति के लिए भी बड़ा खतरा है।
- कच्चे तेल के विपरीत, भारत के पास नाइट्रोजन उर्वरकों का कोई रणनीतिक भंडार नहीं है, जिससे आपूर्ति असुरक्षा बढ़ती है।
- आयात पर निर्भरता: भारत अपने 60% यूरिया (नाइट्रोजन उर्वरक) का आयात ओमान, सऊदी अरब और कतर से करता है।
- खरीफ मौसम (जून–जुलाई) के दौरान उर्वरकों की मांग चरम पर होती है, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद रहता है, तो जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता अपनाना पड़ेगा, जिससे किसानों के लिए यूरिया महंगा हो जाएगा।
आर्थिक ब्लैक होल – उर्वरक सब्सिडी जाल
- सब्सिडी का बोझ: सरकार ने 2025–26 में उर्वरक सब्सिडी के रूप में ₹18.86 लाख करोड़ प्रदान किए (कुल सब्सिडी का 40% से अधिक)।
- बढ़ती लागत: बाह्य कारकों जैसे माल ढुलाई लागत में वृद्धि और भूराजनैतिक तनाव (जैसे होर्मुज़ क्षेत्र) के कारण यह बोझ और बढ़ सकता है।
- रासायनिक उर्वरकों पर नकारात्मक प्रतिफल: रासायनिक उर्वरकों पर खर्च किया गया ₹1 केवल 88 पैसे का प्रतिफल देता है, जो कम दक्षता और नकारात्मक आर्थिक लाभ को दर्शाता है।
- वहीं, कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&D) में सार्वजनिक निवेश प्रति ₹1 पर ₹1 से अधिक का लाभ प्रदान करता है।
- आवंटन में असंतुलन: उर्वरक सब्सिडी का वितरण असंतुलित है।
- ₹1.86 लाख करोड़ रासायनिक उर्वरकों के लिए आवंटित किए गए हैं, जबकि राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) के लिए केवल ₹2,481 करोड़, जो लगभग 75 गुना का अंतर दर्शाता है।
- उत्तम विकल्पों की उपेक्षा: प्राकृतिक खेती और जैव-इनपुट्स को दीर्घकालिक पर्यावरणीय और आर्थिक लाभों के बावजूद पर्याप्त वित्तपोषण नहीं मिल रहा है।
पर्यावरण और मृदा का क्षरण
- N-P-K असंतुलन: नाइट्रोजन (N) का अत्यधिक उपयोग, फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) की तुलना में, मृदा की गुणवत्ता को खराब करता है, फसल उत्पादकता घटाता है और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है।
- भारत में N:P:K अनुपात अक्सर 8–10:3–4:1 तक पहुँच जाता है, जबकि आदर्श अनुपात 4:2:1 है—मुख्यतः सब्सिडी वाले यूरिया के अधिक उपयोग के कारण।
- रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव:
- वाष्पीकरण (Volatilisation): रासायनिक उर्वरक गैसों में परिवर्तित हो जाते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है।
- संदूषण (Contamination): अतिरिक्त उर्वरक मृदा में रिसकर भूजल और नदियों को प्रदूषित करते हैं।
- डीनाइट्रीफिकेशन (Denitrification): मृदा में विद्यमान बैक्टीरिया नाइट्रेट को वायुमंडलीय नाइट्रोजन (N₂) में परिवर्तित कर देते हैं।
- मृदा की सेहत में गिरावट: लगातार रासायनिक उपयोग से लाभकारी सूक्ष्मजीव मर जाते हैं, जिससे दीर्घकालिक मृदा उत्पादकता घटती है।
जैव उर्वरक – समाधान
- परिभाषा: जैव उर्वरक जीवित सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया और फफूंद) होते हैं, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य रूप में कार्य करते हैं।
- मुख्य कार्य:
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: वायुमंडलीय नाइट्रोजन (N₂) को पौधों के उपयोग योग्य रूप में बदलना।
- फॉस्फेट का घुलनशीलकरण: मृदा में उपस्थित फॉस्फेट को पौधों के उपयोग के लिए घुलनशील रूप में परिवर्तित करना।
- मृदा जीव-विज्ञान में सहयोग: प्राकृतिक मृदा उत्पादकता बढ़ाने के लिए लाभकारी सूक्ष्मजीवों को सशक्त बनाना।
- रणनीतिक लाभ: स्थानीय रूप से उत्पादित, रासायनिक उर्वरकों की तुलना में किफायती, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करता है और दीर्घकालिक रूप से मृदा की सेहत में सुधार करता है।
- आयात पर निर्भरता में कमी: जैव उर्वरकों के विस्तार से यूरिया आयात खर्च घटता है, जिससे भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता कम होती है।
- कम लागत: जैव उर्वरकों को अपनाने से लागत में कमी आती है, जिससे विशेष रूप से सीमित विकल्पों तक पहुँच रखने वाले लघु किसानों को लाभ मिलता है।
सफलता के उदाहरण
- सिक्किम: यह भारत का पहला 100% जैविक राज्य है, जिसने 76,000 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक खेती में परिवर्तित किया और वर्ष 2018 में UN फ्यूचर पॉलिसी अवार्ड(UN Future Policy Award) जीता।
- आंध्र प्रदेश: 10 लाख से अधिक किसानों ने सामुदायिक प्रबंधित प्राकृतिक खेती (CMNF) और शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) अपनाई, जिससे 2–3 मौसम में लागत में भारी कमी देखी गई।
जैव उर्वरकों को अपनाने में विद्यमान चुनौतियाँ
- खंडित बाजार संरचना: राष्ट्रीय वितरण नेटवर्क की कमी के कारण एक बिखरा हुआ इकोसिस्टम बन गया है, जिसमें छोटे क्षेत्रीय खिलाड़ी/व्यापारी हावी हैं, जिससे पैमाने, मानकीकरण और पहुँच सीमित हो जाती है।
- किसानों का भरोसा कम होना: निष्क्रिय सूक्ष्मजीवों वाले घटिया या नकली उत्पादों के प्रसार से खराब परिणाम होते हैं, जिससे जैव उर्वरकों को अपनाने की प्रवृत्ति कम होती है।
- अंतिम चरण पर मार्गदर्शन की कमी: अपर्याप्त विस्तार सेवाएँ और तकनीकी मार्गदर्शन जैव-इनपुट्स के सही उपयोग और उनका सर्वोत्तम अनुप्रयोग बाधित करते हैं।
- सब्सिडी में विद्यमान नीतिगत असंतुलन: असंतुलित सब्सिडी रासायनिक उर्वरकों के पक्ष में है, जिससे एक असंतुलित प्रोत्साहन संरचना का निर्माण होता है जो जैव उर्वरकों को अपनाने की प्रवृत्ति को कम करती है।
आगे की राह
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) सुधार: उर्वरक सब्सिडी सीधे किसानों को स्थानांतरित करें ताकि वे रासायनिक और जैव-इनपुट्स के बीच उत्तम विकल्प को अपना सकें, और संतुलित पोषक तत्व उपयोग को बढ़ावा मिले।
- जैव-इनपुट बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करना: राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 10,000 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र स्थापित करना, जिनका प्रदर्शन मापनीय मृदा स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा हो।
- नवाचार और गुणवत्ता को बढ़ावा देना: नए सूक्ष्मजीव स्ट्रेन के लिए अनुमोदन को तीव्र करना तथा उत्पाद की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए कड़े पोस्ट-मार्केट निगरानी लागू करना।
- चरणबद्ध संक्रमण रणनीति: आर्थिक और उत्पादकता संबंधी समस्याओं से बचने के लिए जैव उर्वरकों की ओर धीरे-धीरे संक्रमण को बढ़ावा देना, तथा श्रीलंका के अचानक रासायनिक उर्वरक प्रतिबंध जैसे संकटों से सबक लेना।
निष्कर्ष
जैव उर्वरक तत्काल रासायनिक उर्वरकों का पूर्ण विकल्प नहीं हैं, बल्कि दोनों साथ-साथ चलेंगे।
- रासायनिक प्रधान कृषि से जैविक समृद्ध कृषि की ओर संक्रमण धीमा होगा तथा फसल और क्षेत्र के अनुसार भिन्न होगा, इसलिए मृदा की सेहत, उत्पादकता और दीर्घकालिक संप्रभुता के लिए एक नियंत्रित संक्रमण आवश्यक है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट ने भारत के उर्वरक क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है। भारत की कृषि सुरक्षा के संदर्भ में इसके कारणों और प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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