संदर्भ
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) अधिनियम, 1937 के तहत भेदभावपूर्ण विरासत प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की, कि पूरे भारत में महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने का एकमात्र उपाय ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) है।
- न्यायालय ने कहा, कि व्यक्तिगत भेदभावपूर्ण पर्सनल लॉ को एक-एक करके रद्द करना कानूनी भ्रम उत्पन्न करता है।
- एक एकीकृत संहिता संवैधानिक स्पष्टता सुनिश्चित करती है- प्रत्येक नागरिक के लिए समान कानून एवं एकसमान अधिकार।
समान नागरिक संहिता (UCC):
- UCC का अर्थ: समान नागरिक संहिता विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार को विनियमित करने वाले व्यक्तिगत कानूनों का एक सामान्य समूह है, जो धर्म की चिंता किए बिना सभी नागरिकों पर लागू होता है, जिससे समान नागरिक अधिकार सुनिश्चित होते हैं।
- संवैधानिक आधार: यह विचार भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में परिलक्षित होता है, जो राज्य को नागरिकों के लिए UCC सुरक्षित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
- संविधान सभा का दृष्टिकोण: 1948 की संविधान सभा की चर्चाओं के दौरान, बी. आर. अंबेडकर ने विधिक एकरूपता, लैंगिक न्याय और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने के साधन के रूप में UCC का समर्थन किया था।
समान नागरिक संहिता के लिए बी. आर. अंबेडकर के मुख्य तर्क:
- कानूनी ढाँचे को पूर्ण करना: अंबेडकर ने तर्क दिया, कि भारत ने पहले से ही लगभग सभी अन्य कानूनी क्षेत्रों में एकरूपता प्रपात कर ली है, जिसमें अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC), कानूनी प्रक्रियाओं के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और वाणिज्यिक लेनदेन के लिए संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम शामिल हैं।
- उन्होंने तर्क दिया, कि पर्सनल लॉ ही एकमात्र अछूता क्षेत्र था, और सभी नागरिकों के लिए निरंतर अधिकार सुनिश्चित करने के लिए इसे भी समान बनाया जाना चाहिए।
- पर्सनल लॉ की ऐतिहासिक परिवर्तनशीलता: उन्होंने इस दावे को चुनौती दी, कि धार्मिक व्यक्तिगत कानून अपरिवर्तनीय हैं।
-
- इसे सिद्ध करने के लिए, उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा 1937 का शरिया अधिनियम लागू किए जाने तक, उत्तर-पश्चिम सीमांत, संयुक्त प्रांत और बॉम्बे जैसे प्रांतों में कई मुस्लिम समुदाय ऐतिहासिक रूप से हिंदू विरासत रीति-रिवाजों का पालन करते थे।
- यह ऐतिहासिक साक्ष्य दिखाता है, कि व्यक्तिगत कानून पहले भी बदले गए थे और उन्हें पुनः सुधारा जा सकता है।
- सामाजिक सुधार की आवश्यकता: उन आपत्तियों के जवाब में, कि UCC धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करेगा, अंबेडकर ने तर्क दिया कि चूँकि भारत में धर्म जन्म से मृत्यु तक जीवन के प्रत्येक पहलूओं को कवर करता है, इसलिए यदि राज्य धार्मिक रीति-रिवाजों द्वारा शासित मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, तो सामाजिक सुधार असंभव हो जाएगा।
- उन्होंने माना कि सामाजिक प्रगति के लिए सुधार आवश्यक है।
संविधान सभा संबंधी चर्चा तथा आकार
- अनुच्छेद 44 और DPSP: समान नागरिक संहिता पर मूल रूप से अनुच्छेद 35 के रूप में चर्चा की गई थी, लेकिन अंततः इसे राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांतों (DPSP) के तहत भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 के रूप में शामिल किया गया।
- इससे संसद को इसे तुरंत लागू करने योग्य अधिकार की बजाय लोकतांत्रिक सहमति के माध्यम से धीरे-धीरे लागू करने की अनुमति मिली।
- समर्थक बनाम विरोधी: इस प्रस्ताव का बी. आर. अंबेडकर, के. एम. मुंशी और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने कठोर समर्थन किया।
- मोहम्मद इस्माइल खान और महबूब अली बेग जैसे सदस्यों ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया, कि संबंधित समुदाय की स्पष्ट सहमति के बिना व्यक्तिगत कानूनों को नहीं बदला जाना चाहिए।
- स्वैच्छिक स्वीकृति का विचार: अंबेडकर ने सुझाव दिया, कि UCC शुरू में स्वैच्छिक आधार पर कार्य कर सकता है।
- व्यवहार में उदाहरण: विशेष विवाह अधिनियम, 1954 इस दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो व्यक्तियों को उनके संबंधित धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों की बजाय धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानूनों के तहत विवाह करने की अनुमति देता है।
निष्कर्ष
UCC के लिए बी. आर. अंबेडकर के दृष्टिकोण को लागू करना कानूनी एकरूपता, लैंगिक न्याय और एक सामान्य नागरिक पहचान की ओर एक कदम के रूप में देखा जाता है, जो राजनीतिक तथा धार्मिक विभाजनों से ऊपर है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता के संवैधानिक आधार और व्यक्तिगत कानूनों में समानता सुनिश्चित करने के लिए इसके महत्त्व पर चर्चा कीजिए।
(10 अंक, 150 शब्द)
|