संदर्भ:
भारत ने आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा विस्तार तथा स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति के तहत एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP) शुरू किया।
एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP) के बारे में
- इस कार्यक्रम के तहत गन्ना, मक्का तथा चावल जैसी फसलों से उत्पादित एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाया जाता है। भारत ने समय से पहले ही E20 लक्ष्य (20% एथेनॉल सम्मिश्रण) हासिल कर लिया है।
भारत का वर्तमान लक्ष्य: E20
E20 लक्ष्य के तहत, भारत में बेचे जाने वाले ईंधन में शामिल होना चाहिए:
एथेनॉल सम्मिश्रण के अपेक्षित लाभ
- कच्चे तेल के आयात में कमी: एथेनॉल सम्मिश्रण पेट्रोल के एक हिस्से को घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल से बदलकर आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता को कम करता है।
- विदेशी मुद्रा की बचत: कच्चे तेल के कम आयात से अमेरिकी डॉलर में होने वाले व्यय में कमी आती है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार को संरक्षित करने में मदद मिलती है।
- रुपये को मजबूती: डॉलर के कम बहिर्वाह (outflow) से मुद्रा की स्थिरता को समर्थन मिलता है, तथा भारतीय रुपया मजबूत होता है।
- किसानों की आय में वृद्धि: गन्ना, मक्का और चावल की उच्च माँग से अतिरिक्त बाजार अवसर उत्पन्न होते हैं, और किसानों की आय बढ़ती है।
नवीन समस्याएँ
- जैसा कि अर्थशास्त्री थॉमस सोवेल ने रेखांकित किया है, आर्थिक नीतियों में समझौते (trade-offs) शामिल होते हैं, तथा यह चुनौती भारत के एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
एथेनॉल का अत्यधिक उत्पादन
- भारत को E20 सम्मिश्रण लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल 10-11 बिलियन लीटर एथेनॉल की आवश्यकता है, जबकि इसकी उत्पादन क्षमता पहले ही 20 बिलियन लीटर को पार कर चुकी है और इसका विस्तार जारी है।
- यह अतिरिक्त आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न करता है, जिससे अधिशेष एथेनॉल का उपयोग कठिन हो जाता है और एथेनॉल उत्पादन संयंत्रों में फंसी हुई परिसंपत्तियों तथा निम्न उपयोग किए गए निवेशों का जोखिम बढ़ जाता है।
क्षमता में इतनी तेजी से वृद्धि क्यों हुई?
- सरकार ने एथेनॉल उत्पादन संयंत्र स्थापित करने के लिए, रियायती ऋण, ब्याज सहायता तथा विभिन्न वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किए।
- इन नीतिगत उपायों ने बड़े पैमाने पर निजी निवेश को आकर्षित किया, जिससे देश भर में एथेनॉल उत्पादन क्षमता का तेजी से विस्तार हुआ।
खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव
- शुरुआत में, एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने से उत्पादित किया जाता था, लेकिन सरकार ने बाद में चीनी की कमी को दूर करने के लिए मक्का तथा चावल का उपयोग करने वाले अनाज-आधारित डिस्टिलरी को बढ़ावा दिया।
- एथेनॉल फीडस्टॉक (कच्चे माल) की उच्च माँग किसानों को दलहन, तिलहन और अन्य खाद्य फसलों से दूर जाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे संभावित रूप से खाद्य तेलों तथा दालों का आयात बढ़ सकता है।
आयात निर्भरता स्थानांतरित हुई है, समाप्त नहीं
- भले ही एथेनॉल सम्मिश्रण के कारण कच्चे तेल का आयात कम हो सकता है, लेकिन एथेनॉल फीडस्टॉक फसलों की बढ़ती खेती से उर्वरकों की माँग बढ़ती है, जिसका उत्पादन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है।
- परिणामस्वरूप, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता प्राकृतिक गैस के उच्च आयात द्वारा प्रतिस्थापित हो सकती है, जिसका अर्थ है कि आयात निर्भरता समाप्त होने के बजाय केवल स्थानांतरित हुई है।
पर्यावरणीय चिंताएँ
- जल की खपत: एथेनॉल के उत्पादन के लिए अत्यधिक मात्रा में जल की आवश्यकता होती है।
| एथेनॉल का प्रकार |
आवश्यक जल |
| गन्ने से एथेनॉल |
~2,860 लीटर प्रति लीटर |
| मक्के से एथेनॉल |
~493 लीटर प्रति लीटर |
| चावल से एथेनॉल |
~10,790 लीटर प्रति लीटर |
उदाहरण : महाराष्ट्र
- गन्ना खेती के कुल क्षेत्र के केवल लगभग 10% भाग पर उगाया जाता है।
- फिर भी यह सिंचाई के लगभग 50% जल की खपत करता है।
- एथेनॉल उत्पादन का विस्तार जल संकट को और बढ़ा सकता है।
आगे की राह
- एक व्यापक मूल्यांकन जल-उपयोग दक्षता, फसल विविधीकरण, खाद्य सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और आयात निर्भरता पर वास्तविक प्रभाव पर केंद्रित होना चाहिए।
- मार्गदर्शक सिद्धांत यह होना चाहिए, कि ईंधन सुरक्षा किसी भी कीमत पर खाद्य सुरक्षा तथा जल स्थिरता की कीमत पर नहीं आनी चाहिए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. “भारत का एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम एक ऊर्जा सुरक्षा उपाय से बदलकर अधिशेष औद्योगिक क्षमता को खपाने के एक साधन के रूप में परिवर्तित हो गया है।” इसमें शामिल आर्थिक तथा पर्यावरणीय समझौतों के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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