संदर्भ:
फ्रांस में 2026 के G7 शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री की आगामी उपस्थिति, यूरोप तथा वीश्विक दक्षिण पर एक नए राजनयिक फोकस के कारण, भारत के एक आमंत्रित सदस्य से एक महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक भागीदार के रूप में परिवर्तन को रेखांकित करती है।
भारत-G7 संबंधों का विकास:
- ऐतिहासिक घटनाक्रम: भारत की साझेदारी 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में शुरू हुई, डॉ. मनमोहन सिंह (2005-2009) को मिले पाँच आमंत्रणों के माध्यम से आगे बढ़ी, और 2019 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वार्षिक भागीदारी के माध्यम से और अधिक मजबूत हुई।
- परिवर्तित आर्थिक परिदृश्य: भारत और चीन जैसी प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के उदय के कारण वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में G7 की हिस्सेदारी घटकर लगभग 40% रह गई है, जिससे यह समूह एक स्थिर लोकतांत्रिक आधार और प्रौद्योगिकी भागीदार के रूप में भारत पर तेजी से निर्भर हो रहा है।
- वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व: वर्तमान नेतृत्व के तहत, भारत ने उन्नत पश्चिमी शक्तियों के वर्चस्व वाले बहुपक्षीय मंचों के भीतर विकासशील देशों के लिए स्वयं को प्राथमिक वार्ताकार के रूप में स्थापित किया है।

भारत-भूमध्यसागरीय रणनीतिक रूपरेखा:
- भू-रणनीतिक अभिसरण: आधुनिक भारतीय विदेश नीति की एक परिभाषित विशेषता भारत-भूमध्यसागरीय गलियारा है| यह एक उभरती हुई रूपरेखा है, जो व्यापार, प्रौद्योगिकी, डेटा और ऊर्जा मार्गों के माध्यम से हिंद महासागर को यूरोप से स्पष्ट रूप से जोड़ती है।
- IMEC उत्प्रेरक: भारत की 2023 की G20 अध्यक्षता के दौरान शुरू किया गया भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), इस 21वीं सदी के आर्थिक नेटवर्क के लिए परिचालन आधार के रूप में कार्य करता है।
- संयुक्त राजनयिक दृष्टिकोण: मई 2026 में, प्रधानमंत्री मोदी और इतालवी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक बुनियादी ऑप-एड (संपादकीय लेख) सह-लेखन किया, जिसमें इस लिंक को विचारों, डेटा और हरित प्रौद्योगिकी के लिए एक आवश्यक गलियारे के रूप में सुदृढ़ किया गया।
घरेलू आवश्यकताएँ और यूरोपीय सहयोग:
- आर्थिक लक्ष्य: डीप-टेक में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और अपने युवाओं के लिए तीव्र औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए, भारत यूरोपीय पूंजी तथा तकनीकी सहयोग पर बहुत अधिक निर्भर है।
- व्यापारिक उपलब्धि: इन गहन संबंधों को प्रदर्शित करते हुए, भारत ने इस वर्ष की शुरुआत में यूरोपीय संघ (EU) के साथ एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया।
- भू-राजनीतिक संतुलन: उभरते भू-राजनीतिक परिवर्तनों तथा क्षेत्रीय धुरी प्रतिद्वंद्विता के खिलाफ मध्य पूर्व के माध्यम से पारगमन मार्गों को सुरक्षित रखने के लिए, भारत हेतु यूरोपीय समर्थन प्राप्त करना महत्वपूर्ण है।
वैश्विक रणनीतिक क्षेत्र में प्रतिसंतुलन:
- समावेशी मॉडल: चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव जैसी एकल-राज्य पहलों के विपरीत, भारत-भूमध्यसागरीय दृष्टिकोण बहुपक्षीय रूप से संचालित होता है, जो प्रत्येक भागीदार राष्ट्र को एक सहयोगात्मक भूमिका सौंपता है।
- इंडो-अटलांटिक क्षेत्र का उदय: यह रूपरेखा अंततः एक इंडो-अटलांटिक रणनीतिक क्षेत्र के रूप में औपचारिक रूप ले सकती है, जो स्थापित इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) संरचना के लिए एक महत्त्वपूर्ण पश्चिमी समकक्ष के रूप में कार्य करेगी।
निष्कर्ष:
G7 के साथ भारत का निरंतर जुड़ाव अब केवल प्रतीकात्मक नहीं रह गया है। यह एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में भारत के विकास को दर्शाता है, जो महाद्वीपीय व्यापारिक मार्गों को नया आकार देने, औद्योगिक देशों के साथ वैश्विक दक्षिण को जोड़ने और यूरोप तथा एशिया में जटिल भू-राजनीतिक गतिशीलता को संतुलित करने में सक्षम है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्र. G7 शिखर सम्मेलनों में भारत की निरंतर उपस्थिति, एक बाह्य पर्यवेक्षक से एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक अभिकर्ता के रूप में उसके संक्रमण को रेखांकित करती है। इस संदर्भ में भारत-भूमध्यसागरीय दृष्टिकोण के रणनीतिक महत्त्व की चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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