हाल के वर्षों में भारत में संघवाद को लेकर नई बहस उभरकर सामने आई है। इसके प्रमुख कारण हैं:
परिसीमन
वित्तीय हस्तांतरण (Fiscal Transfers)
केंद्र–राज्य तनाव में वृद्धि
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) में गिरावट को लेकर चिंताएँ
इन घटनाओं ने भारत में एक मजबूत केंद्र सरकार और राज्यों की स्वायत्तता के बीच संतुलन को लेकर महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए हैं।
संघवाद (Federalism) क्या है?
संघवाद ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें लिखित संविधान के माध्यम से सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच शक्तियों का विभाजन किया जाता है।
भारत में शक्तियाँ संवैधानिक रूप से निम्न के बीच विभाजित हैं:
भारत सरकार
राज्य सरकारें
भारत ने एक मज़बूत केंद्र को क्यों अपनाया?
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद, भारत को विभाजन, अलगाववाद और राष्ट्रीय एकता के टूटने के भय का सामना करना पड़ा।
इसलिए संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय एकता और स्थिरता बनाए रखने के लिए अपेक्षाकृत मजबूत संघीय सरकार की व्यवस्था की।
संघवाद के समक्ष ऐतिहासिक चुनौतियाँ
योजना आयोग का दौर
पूर्व योजना आयोग ने प्रमुख वित्तीय शक्तियों को केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रीकृत कर दिया था।
राज्यों को वित्तीय आवंटन और विकास निधियों के लिए केंद्र पर अत्यधिक निर्भर रहना पड़ता था।
राष्ट्रपति शासन का दुरुपयोग
1960 और 1970 के दशकों में, अनुच्छेद 356 का अक्सर दुरुपयोग करके विपक्ष-शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त किया जाता था।
इससे लोकतांत्रिक संघवाद की भावना कमजोर हुई।
राज्यपाल पद का दुरुपयोग
राज्यपालों पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता था कि वे निष्पक्ष संवैधानिक प्राधिकार के रूप में कार्य करने के बजाय केंद्र सरकार के पक्ष में कार्य करते हैं।
इससे केंद्र और राज्यों के बीच बार-बार तनाव उत्पन्न हुआ।
एस. आर. बोम्मई निर्णय (S. R. Bommai Judgment)
निर्णय का महत्व
एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ के निर्णय ने यह घोषित किया कि:
संघवाद (Federalism) संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा है।
राष्ट्रपति शासन का मनमाना प्रयोग असंवैधानिक है।
इस निर्णय ने भारतीय संघवाद को महत्त्वपूर्ण रूप से मजबूत किया तथा अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर नियंत्रण लगाया।
संघवाद के समक्ष विद्यमान समकालीन चुनौतियाँ
परिसीमन : परिसीमन का अर्थ “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, ताकि समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि नवीनतम जनगणना के बाद उनकी संसदीय सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तरी राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं। जो कि प्रभावी रूप से उन राज्यों को दंडित करने जैसा होगा जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है।
राजकोषीय संघवाद विवाद : राजकोषीय संघवाद के अंतर्गत आर्थिक रूप से मजबूत राज्य, जैसे महाराष्ट्र तथा कई दक्षिणी राज्य, करों में अधिक योगदान देते हैं, लेकिन उन्हें केंद्र से तुलनात्मक रूप से कम वित्तीय हस्तांतरण प्राप्त होता है। इससे निम्न चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं:
संसाधनों के असमान वितरण को लेकर असंतोष
सुशासन के लिए प्रोत्साहनों की कमी
राज्यों के बीच बढ़ती विकासात्मक असमानताएँ
सहकारी संघवाद में गिरावट: राज्य सरकारें लगातार यह शिकायत कर रही हैं कि महत्त्वपूर्ण कानूनों को लागू करने से पहले उनसे पर्याप्त परामर्श नहीं किया जाता। केंद्र सरकार द्वारा अत्यधिक केंद्रीकृत नीति-निर्माण की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
कृषि कानूनों और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जैसे कानूनों ने भारत में सहकारी संघवाद के पतन को लेकर चल रही बहसों को और तेज़ कर दिया।
सहकारी बनाम संघर्षात्मक संघवाद
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism): सहकारी संघवाद एक ऐसी व्यवस्था को संदर्भित करता है जिसमें केंद्र और राज्य प्रभावी शासन के लिए संवाद, सहमति और सहयोग के माध्यम से एक साथ कार्य करते हैं।
संघर्षात्मक संघवाद (Combat Federalism): इसके विपरीत, “संघर्षात्मक संघवाद” केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव को दर्शाता है, जिसके परिणामस्वरूप विश्वास की कमी, शासन संबंधी संघर्ष और सहयोगात्मक निर्णय-निर्माण का कमजोर होना देखा जाता है।
जीएसटी परिषद : एक सकारात्मक उदाहरण
वर्ष 2018 की जीएसटी परिषद बैठक के दौरान केरल द्वारा जुआ संबंधी कराधान पर उठाई गई चिंताओं को एकतरफा निर्णय के बजाय सहमति निर्माण के माध्यम से सुलझाया गया।
इस घटना ने यह प्रदर्शित किया कि: समायोजन (Accommodation), संवाद (Dialogue), सहयोगात्मक निर्णय-प्रक्रिया भारतीय संघवाद को मजबूत करते हैं और लोकतांत्रिक परिपक्वता को दर्शाते हैं।
नेतृत्व और संघीय भावना
पी. वी. नरसिम्हा राव और शांता कुमार से जुड़ा उदाहरण सहकारी संघवाद और राजनैतिक परिपक्वता की भावना को उजागर करता है।
यह इस संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है कि:
सरकारें भले ही विभिन्न राजनीतिक दलों की हों,
लेकिन शासन का चरित्र राष्ट्रीय होना चाहिए और उसे व्यापक जनहित द्वारा निर्देशित होना चाहिए।
निष्कर्ष
भारतीय संघवाद मूलतः एक सहकारी मॉडल है, लेकिन वर्त्तमान में यह वित्तीय असंतुलन और राजनीतिक परामर्श की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
देश की एकता और लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए नेताओं को “संघर्षात्मक संघवाद” से आगे बढ़कर “फर्स्ट प्रिंसिपल्स” (First Principle) की ओर लौटना होगा, जहाँ राष्ट्रीय हित और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को संकीर्ण राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर रखा जाए।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: जनसांख्यिकीय असमानता (Demographic Divergence) भारतीय संघवाद को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? चर्चा कीजिए।
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