संदर्भ:
अमेरिका और चीन के राष्ट्रपतियों के मध्य हाल ही में हुई बैठक ने वैश्विक समीकरणों में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया है, जो अत्यधिक तनाव के दौर से हटकर अब उस स्थिति की ओर बढ़ रहा है जिसे “डेटेन्टे (Détente)” (तनाव-शिथिलता) कहा जा रहा है।
क्वाड (QUAD)
क्वाड (QUAD) के सदस्य
- भारत
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- जापान
- ऑस्ट्रेलिया
क्वाड (QUAD) का महत्त्व
- क्वाड, भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की प्रमुख लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ सहभागिता को मजबूत करता है।
- यह भारत को चीन के साथ संबंधों में अधिक कूटनीतिक और रणनीतिक बढ़त प्रदान करता है।
- क्वाड के माध्यम से निम्न क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिलता है:
- प्रौद्योगिकी
- निवेश
- आपूर्ति शृंखला
- समुद्री सुरक्षा
- रणनीतिक संवाद
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यह परिवर्तन भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि दोनों महाशक्तियाँ एक संभावित “G2” (ग्रेट टू) व्यवस्था की ओर बढ़ती दिखाई दे रही हैं, जिसमें वे संयुक्त रूप से वैश्विक मामलों पर प्रभुत्व स्थापित कर सकती हैं। इससे अन्य शक्तियों, विशेषकर भारत, के हितों की अनदेखी होने की आशंका है।
डेटेन्टे (Détente) और G2 की अवधारणा
- डिटेन्टे (Détente): यह फ्रांसीसी शब्द है, जिसका अर्थ है प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच शत्रुता में कमी या “तनाव का काम होना”।
- शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव में कमी का वर्णन करने के लिए ऐतिहासिक रूप से प्रयुक्त यह शब्द अब वर्तमान अमेरिका-चीन संबंधों पर लागू किया जा रहा है।
- G2 का जोखिम: यह आशंका बढ़ रही है कि अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक व्यवस्था को संचालित करने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसी स्थिति भारत के रणनीतिक और कूटनीतिक हितों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
चीन को लेकर भारत की रणनीतिक चिंताएँ
भारत के सामने कई प्रत्यक्ष चुनौतियाँ हैं, जिनके कारण अमेरिका-चीन संबंधों में बढ़ती निकटता भारत के लिए चिंता का विषय बन जाती है।
- सीमा विवाद (Border Disputes)
- भारत और चीन के बीच लंबे समय से सीमा विवाद चला आ रहा है।
- अमेरिका के विपरीत, चीन भारत का प्रत्यक्ष पड़ोसी है, जिससे सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ और अधिक गंभीर हो जाती हैं।
- आर्थिक निर्भरता
- चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर लगभग 110 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है।
- इसके अतिरिक्त, चीन की अर्थव्यवस्था अब भारत की अर्थव्यवस्था से पाँच गुना बड़ी हो चुकी है, जिससे शक्ति संतुलन में भारी असमानता उत्पन्न हो गई है।
- क्षेत्रीय प्रभाव
- चीन नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में आर्थिक सहायता और निवेश के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
- इससे क्षेत्र में चीन समर्थक और भारत-विरोधी वातावरण बनने की आशंका बढ़ती है।
- वैश्विक स्थिति
- चीन का प्रभाव संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में लगातार बढ़ रहा है।
- कई मामलों में यह भारत की वैश्विक भूमिका और हितों के लिए चुनौती उत्पन्न करता है।
पारंपरिक सहयोगियों की बदलती भूमिका
बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के कारण भारत अपने पारंपरिक साझेदारों पर निर्भरता का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है।
- रूस-चीन संतुलन का पतन: 1990 के दशक में भारत रूस को एक “सबसे अच्छे मित्र” के रूप में देखता था, जो यूरेशिया में चीन को संतुलित कर सकता था। हालाँकि, यूक्रेन युद्ध के बाद रूस तेजी से चीन का “जूनियर पार्टनर” बनता जा रहा है, वह उस पर अत्यधिक निर्भर हो गया है और अब चीन के विरुद्ध संतुलनकारी शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाने की क्षमता खो रहा है।
- अमेरिका के साथ जटिल संबंध: यद्यपि अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया था और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर भारी प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन पिछले 20 वर्षों में संबंधों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिसकी शुरुआत 2005 के परमाणु समझौते से हुई।
बदलते रणनीतिक समीकरण
- भारत की पूर्व रणनीतिक सोच: 1990 के दशक में भारत रूस को अपना सबसे निकट रणनीतिक साझेदार मानता था और यह विश्वास करता था कि रूस यूरेशियाई क्षेत्र में चीन के विरुद्ध संतुलनकारी भूमिका निभाएगा।
- वर्त्तमान रणनीतिक वास्तविकता: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद, रूस आर्थिक और रणनीतिक रूप से तेजी से चीन पर निर्भर होता जा रहा है।
- परिणामस्वरूप, रूस को अब अक्सर चीन का “जूनियर पार्टनर” कहा जाता है। इससे चीन की शक्ति को स्वतंत्र रूप से संतुलित करने की रूस की क्षमता कमज़ोर पड़ गई है।
भारत–अमेरिका संबंधों का विकास
- प्रारंभिक अविश्वास: ऐतिहासिक रूप से, शीत युद्ध काल के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका को पाकिस्तान के अधिक निकट माना जाता था।
- वर्ष 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे।
- संबंधों में सुधार: वर्ष 2005 के भारत–अमेरिका असैनिक परमाणु समझौते के बाद दोनों देशों के संबंधों में उल्लेखनीय सुधार आया। यह समझौता द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
- वर्तमान स्थिति
- अमेरिका भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक है।
- अमेरिका में भारत का एक मजबूत और प्रभावशाली प्रवासी समुदाय है।
- पश्चिमी देश भारत को महत्त्वपूर्ण पूँजी, प्रौद्योगिकी और बाजार तक पहुँच प्रदान करते हैं।
विदेश नीति में “फर्स्ट प्रिंसिपल्स” (First Principles) दृष्टिकोण
मुख्य विचार: भारत को साझेदारियों को निम्नलिखित आधारों पर प्राथमिकता देनी चाहिए:
- आर्थिक लाभ
- रणनीतिक महत्व
- प्रौद्योगिकी तक पहुँच
- व्यापार में अवसर
प्रमुख उदाहरण
- नीदरलैंड, अपनी अपेक्षाकृत छोटी जनसंख्या के बावजूद, कुछ क्षेत्रों में चीन और रूस दोनों से संयुक्त रूप से अधिक भारतीय वस्तुओं का आयात करता है, जो व्यावहारिक आर्थिक साझेदारियों के महत्त्व को दर्शाता है।
मुख्य संदेश
- अंतरराष्ट्रीय संबंधों में न तो कोई स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु; केवल स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की पुनर्व्याख्या
- रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ है भारत की वह क्षमता जिसके तहत वह किसी बाह्य दबाव के बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र रूप से विदेश नीति संबंधी निर्णय लेने में सक्षम हो।
सी. राजा मोहन का “फर्स्ट प्रिंसिपल” और रणनीतिक यथार्थवाद
विशेषज्ञ सी. राजा मोहन के अनुसार, भारत को पुराने भावनात्मक संबंधों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय हित आधारित नीति अपनानी चाहिए।
- व्यापारिक साझेदारों को प्राथमिकता देना: भारत को उन देशों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिनसे उसे वास्तव में आर्थिक लाभ मिलता है। उदाहरण के लिए, भारत रूस या चीन की तुलना में नीदरलैंड (जनसंख्या लगभग 1.9 करोड़) को अधिक निर्यात करता है, फिर भी राष्ट्रीय चर्चाओं में नीदरलैंड पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
- पश्चिम के साथ सहभागिता: चूँकि रूस कमजोर हो चुका है और चीन एक प्रत्यक्ष खतरा है, इसलिए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने और अपनी सैन्य क्षमता का आधुनिकीकरण करने के लिए पश्चिमी बाजार, पूँजी और प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहिए।
- रणनीतिक स्वायत्तता: पश्चिमी शक्तियों के साथ मित्रता या ‘क्वाड’ (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे समूहों में भागीदारी को स्वायत्तता खोने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि, ये भारत के लिए वैश्विक परिवर्तनों को समझने और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “पिछड़ने” से बचने के महत्त्वपूर्ण साधन हैं।
निष्कर्ष
- वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति का केंद्रीय विचार यह है कि देशों के न तो स्थायी मित्र होते हैं और न स्थायी शत्रु, बल्कि केवल स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं।
- यदि भारत को चीन की शक्ति का मुकाबला करना है, तो उसे अनुसंधान एवं विकास (R&D), उच्च शिक्षा और सैन्य आधुनिकीकरण जैसे क्षेत्रों में आंतरिक आत्म-सशक्तिकरण पर ध्यान देना होगा। साथ ही, भारत को पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों का व्यावहारिक उपयोग करते हुए आवश्यक पूँजी और प्रौद्योगिकी प्राप्त करनी होगी।
- भारत अब पुरानी विचारधाराओं या भावनाओं के आधार पर नहीं चल सकता; उसे एक “फर्स्ट प्रिंसिपल्स” आधारित दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें उन साझेदारों को प्राथमिकता दी जाए जो उसके राष्ट्रीय विकास में सबसे अधिक योगदान देते हैं।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: रूस और चीन के बदलते संबंध भारत की विदेश नीति में वैचारिक “रणनीतिक स्वायत्तता” से व्यावहारिक “भूराजनैतिक यथार्थवाद” की ओर परिवर्तन की आवश्यकता को दर्शाते हैं। भारत की व्यापारिक एवं रणनीतिक आवश्यकताओं के संदर्भ में समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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